कहने को तो बच्चों का भविष्य खुद उसी के हाथ में होता है और एक हद तक बात में दम भी है। पर कहीं न कहीं बालक के भविष्य निर्माण में खुद बालक के साथ-साथ उसके अभिभावक और अध्यापक की भी बहुत बड़ी भूमिका होती है। जबकि मैं खुद अध्यापक हूँ तो इस मुआमले में मेरी भी जिम्मेदारी कुछ खास बन जाती है। माता-पिता अपने बच्चों में वो जज्बा पैदा कर पाने के कई बार खुद को असमर्थ पाते हैं जिसे एक अध्यापक पूरा कर देता है। इस जज्बे को जगाने के मूल में जो अनिवार्य तत्त्व होता है वो है उसका व्यवहार। खुद अपने व्यवहार से वह बच्चों का आदर्श बन सकता है। बशर्ते इसमें दिखावे का पुट नहीं हो।
जहाँ तक मेरा निजी विचार है आजकल के बच्चे अपने माता-पिता की बजाय अपने शिक्षक की बात को ज्यादा अहमियत देते हैं। ऐसी स्थिति में अधिकांश अभिभावक अपनी दृष्टि का स्टीयरिंग शिक्षक की ओर घुमा देते हैं।
अब अध्यापक के लिए लाजिमी ही जाता है कि बच्चों को सिर्फ किताबी ही नहीं बल्कि सामाजिक ज्ञान से भी रूबरू करवाया जाए। इसके लिए हमें चाहिए कि खुद स्वाध्याय करें और ज्ञान गंगा में गहरी डुबकी लगाई जाए। जब हम खुद पूर्ण रूप से तैयार होकर कक्षा-कक्ष में जाते हैं तो हमारा आत्मविश्वास कुछ अलग ही होगा और बच्चे भी कुछ ज्यादा सीख पायेंगे।
अध्यापक बन्द ताले की वो चाबी है जो हर ताले को खोलने की कुव्वत रखता है। आजकल फेसबुक और व्हाट्सअप जैसे सोशल मीडिया साधन भी काफी हद तक हमारे सहायक सिद्ध हो रहे हैं। ये मेरे जैसों के लिए जहाँ प्रचार का माध्यम है वहीं हमारे ही कुछ साथी इसका उपयोग अपने ज्ञानवर्धन के लिए करते हैं।
फेसबुक पर माणिक जी, दीपक चंदवानी जी, मनीष वर्मा जी, डॉ. ममता जी, मेहताब जी, अंजनी सारस्वत जी, डीके, जयकिशोर जी, करण पन्नू जी, नवरत्न जी, मनोज जी झालावाड़, सुखपाल जी, उत्तम जी, मूलाराम जी, पंकज जी, अरविन्द जी, अनु जी, महेश रॉयल जी, मुकेश रॉयल जी, बाबूलाल जी, दिनेश झारवाल जी, करण मीना जी जैसे अनगिनत साथी मिले जो मेरे लिए सिर्फ प्रेरक ही नहीं वरन सहयोगी भी बने हैं।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि इनका अपेक्षित सहयोग मुझे भविष्य में भी मिलता रहेगा। कोरे कागज जो अभिभावकों ने हमें सौंपे हैं उनमें रंग भरने के लिए कलि-कूँची हमेशा तैयार रखते हैं। आवश्यक नहीं कि सिर्फ सिलेबस ही पढ़ाया जाये इसके इत्तर भी हमें अपने अनुभव साझा करने होंगे।
अभिनव सरोवा (अध्यापक)
कानाबाती- 9314911782
जहाँ तक मेरा निजी विचार है आजकल के बच्चे अपने माता-पिता की बजाय अपने शिक्षक की बात को ज्यादा अहमियत देते हैं। ऐसी स्थिति में अधिकांश अभिभावक अपनी दृष्टि का स्टीयरिंग शिक्षक की ओर घुमा देते हैं।
अब अध्यापक के लिए लाजिमी ही जाता है कि बच्चों को सिर्फ किताबी ही नहीं बल्कि सामाजिक ज्ञान से भी रूबरू करवाया जाए। इसके लिए हमें चाहिए कि खुद स्वाध्याय करें और ज्ञान गंगा में गहरी डुबकी लगाई जाए। जब हम खुद पूर्ण रूप से तैयार होकर कक्षा-कक्ष में जाते हैं तो हमारा आत्मविश्वास कुछ अलग ही होगा और बच्चे भी कुछ ज्यादा सीख पायेंगे।
अध्यापक बन्द ताले की वो चाबी है जो हर ताले को खोलने की कुव्वत रखता है। आजकल फेसबुक और व्हाट्सअप जैसे सोशल मीडिया साधन भी काफी हद तक हमारे सहायक सिद्ध हो रहे हैं। ये मेरे जैसों के लिए जहाँ प्रचार का माध्यम है वहीं हमारे ही कुछ साथी इसका उपयोग अपने ज्ञानवर्धन के लिए करते हैं।
फेसबुक पर माणिक जी, दीपक चंदवानी जी, मनीष वर्मा जी, डॉ. ममता जी, मेहताब जी, अंजनी सारस्वत जी, डीके, जयकिशोर जी, करण पन्नू जी, नवरत्न जी, मनोज जी झालावाड़, सुखपाल जी, उत्तम जी, मूलाराम जी, पंकज जी, अरविन्द जी, अनु जी, महेश रॉयल जी, मुकेश रॉयल जी, बाबूलाल जी, दिनेश झारवाल जी, करण मीना जी जैसे अनगिनत साथी मिले जो मेरे लिए सिर्फ प्रेरक ही नहीं वरन सहयोगी भी बने हैं।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि इनका अपेक्षित सहयोग मुझे भविष्य में भी मिलता रहेगा। कोरे कागज जो अभिभावकों ने हमें सौंपे हैं उनमें रंग भरने के लिए कलि-कूँची हमेशा तैयार रखते हैं। आवश्यक नहीं कि सिर्फ सिलेबस ही पढ़ाया जाये इसके इत्तर भी हमें अपने अनुभव साझा करने होंगे।
अभिनव सरोवा (अध्यापक)
कानाबाती- 9314911782
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