Sunday, 30 December 2018

मेरा परिवार

मेरा परिवार.....

आधिकारिक रूप से मेरा परिवार
दस लोगों का है
जो रहते हैं एक छत के तले।
पर लगता है जैसे राशन कार्ड
अभी अधूरा है।

बहुत गुंजाईश है अभी
इसमें होने चाहिए
किसान, मजदूर, सैनिक,
मास्टर और स्कूली बच्चे।

तब कहीं जाकर बनता
एक माकूल परिवार
और एक मुकम्मल
राशन कार्ड।

तब हमारा परिवार
बॉर्डर पर भी होता
खेत में भी और
देश के निर्माण में भी।

बच्चों की अठखेलियों से
महकता और गुलज़ार होता
घर का आँगन और
देश के स्कूल्स में
बहती ज्ञान-सरिता।

चूँकि अधूरा है मेरा राशन कार्ड
फिर भी पूरा है मेरा परिवार।

अभिनव सरोवा
30 दिसंबर 2018
9314911782
6350169404

Saturday, 29 December 2018

शहीद के पिता- भाग नौ

शहीद के पिता- भाग नौ

बुझ गए चूल्हे
बिछ गई जाजम
हर कोई कोना पकड़कर बैठा है
बीच में बैठने की न हिम्मत है न लालसा।
सब ग़मज़दा
पलकें झुकीं, बरस रहीं
नाक बह रही
होठ फड़क रहे
बस तौलिया एकमात्र सहारा था।

किसी के पास सोचने का न वक्त था न हिम्मत
पर अब बहुतेरों को मालूम हुआ कि
रात को लड़कों ने खाना क्यों न खाया।

हमउम्र लड़के सब बैठे हैं बाड़ के पास
जैसे सबसे बुजुर्ग यही हैं
दरी भी तो बडेरो ने ही बिछाई
वो अपने यार के लिए दरी नहीं बिछा सकते।
अभी तो बहुत बातें करनी थीं उसके साथ।
नाचना था उसकी शादी में।
सुनने थे बॉर्डर के किस्से।

वहीं बैठे लोगों में
एक ने की हिम्मत
पास आकर बैठ गया
थोड़ी देर तक दी दिलासा
पर वो रो पड़े फूट-फूटकर।
आखिरकार कर हिम्मत दोएक से कहा-
जो हुआ सो हुआ
अब दाग तो देना ही है
जाओ लकड़ी काट आओ।

बस यही बाकी रह गया था
अपने यार के लिए लकड़ी भी हम ही काटें?
हमें ही जला दो
किन हाथों से काटेंगे लकड़ी?

उनका क्या,
उन्होंने तो इस उम्र तक
छोटी-बड़ी अनेक मौतें देखी थीं
पर ये
ये तो कच्ची उम्र के
भावुक और संवेदनशील युवा थे
रोक न पाए भावनाओं को
जो बह रही थी चुपके-चुपके आँसूओं संग
कल दोपहर से
अब नाले खुल गए।

हर गाँव में कुछ लोग होते हैं
ज्यादा हिम्मत वाले या सहनशील
उनका काम ही होता है
बेहोशी तोड़ना या
दाढ़े खोलना।
आज तक महिलाओं के
खोले थे
आज महिलाओं के साथ लड़कों के भी
पड़ रहे हैं खोलने।
एक को सँभालते
इतने में किसी और की आवाज हो जाती
भाई जी! इंनै आइयो।
अंदर महिलाओं को लगी थी ड्रिप
एक कंपाउडर भी बुलाया गया
पर लग रहा जैसे खुद बीमार है
फिर भी जैसे-तैसे संभाल रहे सबको।

पिता पछेवड़ी ओढ़े
पलकें झुकाए
बैठे हैं
जैसे पत्थर की मूरत।

पर लड़के भी इस कदर रो पड़ेंगे
किसी ने सोचा तक न था।

ये बेइंतहा मुहब्बत थी उनकी
देश और देश के रखवालों के प्रति।
कर हिम्मत या बावळबेढै में
तीन युवा चले खेत को
ले कुल्हाड़ी हाथ।

गाँव के पास ही एक खेड़े में
रोक दी ऊँटगाड़ी
आगे जाने की हिम्मत न हुई
और ऐसे मौके पर लकड़ी देने से
कोई मना भी तो नहीं करता।
उस दिन पूरे गाँव की सीमा
बन जाती है उसका खेत
जिसने खोया हो कोई अपना।

पर आज
आज तो देश ने खोया है
पूरा देश उसका है।
वो कुल्हाड़ी मार रहे खेजड़ी पर
पर लग रहा जैसे
अपने यार पर चला रहे।
मुँह पर लपेट रखा तौलिया
उनके आँसूओं को समेट रहा
और जैसे कह रहा-

आज से तू शहीद का 'यार' कहलाएगा।
आज से ये गाँव एक शहीद का गाँव कहलाएगा।

*बडेरा- बुजुर्ग
*पछेवड़ी- सफेद रंग की चद्दर जो किसान सिर पर बाँधता है।
*बावळबेढै- पागलपन

अभिनव सरोवा
29 दिसंबर 2018
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Thursday, 27 December 2018

बोलो! साथ दोगे

बोलो! साथ दोगे?

घर में झुर-झुर पचती नार,
चाय की थड़ी पर गिलास धोता छोटू,
चौराहे पर अख़बार बेचता,
गाड़ी का शीशा साफ करता,
बूट-पॉलिश का आग्रह करता मोची-बाल,
कक्षा की पिछली सीट पर बैठा 'ओए',
रोड़-डिवाइडर पर भानुमती का पिटारा खोले बैठा विक्षिप्त,
फ़टी कम्बल पर बैठा बिन नहाया अधेड़,
घर में बात-बात पर लड़की होने का एहसास करती बालिका,
बेटियों पर तरजीह पाता 'प्रिंस/लक्की',
टैक्सी-स्टैंड पर बच्चे की भूख के बदले दुआ देती माँ,
खेत में पसीना बहाता किसान,
घर और खेत के बीच झूलती उसकी घरायत,
दहेज़ का ग्रास बनती वधू,
गाड़ी माँगता दूल्हा,
झूठे दहेज-मुकदमे की भेंट चढ़ता परिवार,
जाति का दंश ढोता इंसान,
जिन्दा जलाई जाती लड़कियाँ,
पशु-रक्षा के नाम पर मरता एक तबका,
मृत्युभोज का भौंडा दिखावा,
लुळ-लुळ भरता मायरा,
दायजे का बखान,
थाली से नाली तक अनाज की शवयात्रा,
पेट में घुटने मोड़ते मजदूर के बच्चे,
उपचार-अभाव दम तोड़ते जच्चा-बच्चा,
मंच पर अपनी पीठ ठोकते नेता,
(सिर्फ) ताली बजाती रियाया,
तारीख लेती जनता,
'स्टेट्स' देखकर तय होते रिश्ते,
ऑनलाइन आवेदन करते बेरोजगार,
मास्टर की राह देखते विद्यार्थी,
डाक बनाता मास्टर,
बात-बात में मास्टर की हँसी उड़ाते लोग,
दूसरे के काम को कमतर आँकता कर्मी,
मेल का जवाब देता बाबू,
हेलमेट का फायदा बताता पुलिसकर्मी,
ऑफिस में नयन-चारा बनती महिला-कार्मिक,
भेड़-बकरी चराता ग्वाला,
खड्डे बचाता ड्राइवर,
स्कूल में खाना बनाती हेल्पर

है सबको इनकी खबर
कि कैसे माहौल में जीते हैं
पर आता है जब
मौका कुछ करने का
तब कदम खींच लेते हैं।

क्या जरूरत है इस दिखावे की?
जब कुछ नहीं हम करते हैं
तो आदर्शवाद के बोझ में
क्यों घुट-घुट के मरते हैं?

फेंक डालें इस लबादे को
यथार्थ में उतर जाएँ
समझें इनके दुःख-दर्द को
संकट इनके हर जाएँ।

अब बोलो साथ दोगे.....?

अभिनव सरोवा
26 दिसंबर 2018

Wednesday, 26 December 2018

सिंहासन वालो! ख़ुशी को आने दो

सिंहासन वालो! ख़ुशी को आने दो

कोई है?
जो बता सके
रास्ते खुशियों के
गाँव को।

यहाँ रखे हैं
हर एक के पास दो हाथ
काम की तलाश में।

कई दिनों से भूल गए
यहाँ के लोग
ख़ुशी क्या होती है,
कैसी होती है?

आहट भी तो
नहीं होती
कई-कई दिनों तक।

फिर पता चलता है कि
अमुक विभाग में
........ खुशियाँ निकली हैं।

अपना नाम लिखी
और फोटो छपी
कुम-कुम पत्री से
ख़ुशी को देते हैं
घर आने का निमंत्रण।

तब ख़ुशी रखती है कुछ शर्तें,
उसे स्वयंवर भी कह सकते हैं।
सभी अमीर-गरीब मनाने को उसे
जोर-आजमाइश करते हैं।

फिर एक दिन खुशियाँ आती हैं
बहुधा शाम के वक्त
कम ही नहीं
बहुत कम।
गलती उसकी नहीं
सत्ता की है
वो कम को ही मुक्त करती है।

तब कुछ घर चूल्हे जलाना भूल जाते हैं,
बाकि में जलते नहीं।

पर सवेरे लगता है लाँछन
ख़ुशी खड़ी है न्याय के दरबार में
हाथ बाँधे,
किसके घर जाए?

ये तय होने में लग जाते
महीने-साल।

हमें खुशी चाहिए
साफ-सुथरी
थोक में।

है कोई फ़रिश्ता?
जो सुने हमारी
और
भर दे खुशियों से
घर आपका-हमारा-सबका।

अब सत्तासीनों से गुजारिश है
खुशियों का गला न घोटें
उन्हें लॉगिन करने दीजिए।

आप हमें खुशी दीजिए
ये आपका कर्त्तव्य भी है और
वादा भी।

ख़ुशी-विहीन कतराने लगे हैं
मेल-जोल से
मिला-भिंटो भूल गए।

अब ख़ुशी को भी
चहकने दो
घर की बाखळ में।

घर-घर में थामने
हाथ ख़ुशी का
बैठे हैं हाथ कई
एकदम जवान, पुष्ट
जोश, जज्बे से भरपूर।

बहुत दिन हुए
घी के दीये जलाए
अब तो ख़ुशी को बता दो
गाँव का रास्ता।

अभिनव सरोवा
26 दिसंबर 2018

Tuesday, 25 December 2018

दो मुट्ठी सर्दी

दो मुट्ठी सर्दी

यही कोई पाँच या छह साल की
उम्र होगी उसकी।
तन पर डाल रखी
पुरानी फ्रॉक, 
जो या तो बड़ी बहिन की है
या किसी से मिली हुई।

चैन की जगह
अब बटन आ गए।
जिनमें ऊपर वाला
खुल जाता बार-बार।

चंचल बालिका आज मूक है।
बार-बार दाढ़ भींचती है
जैसे खुद में
बल संचित कर रही हो।

माँ ने पूछा- क्या हुआ?
कल वो दादी कह रही थी-
सर्दी दो मुट्ठी होती है।
मैंने अपनी मुट्ठियाँ जोर से भींच लीं
ताकि मरे न कोई सर्दी से।

अभिनव सरोवा
25 दिसंबर 2018

Thursday, 20 December 2018

साहित्यिक कुकुरमुत्ता

साहित्यिक कुकुरमुत्ता-

मैं एक साहित्यिक कुकुरमुत्ता हूँ
उग आया हूँ नामी साहित्यकारों से अटी धरा पर
अब जो होगा देखा जाएगा
गर कुचले जाएँगे सिर उनके तो
हमारा भी हाजिर है सबसे पहले
इसे रौंदो पैरों के पंजों से या
कुचलो एड़ी से
या मसल डालो हथेली में लेकर
पर सनद रहे-
पैर हो जाएँगे चिपचिपे और हाथ
वो तो होंगे लसलसे
जो शायद आपको पसंद नहीं होंगे
तो उगने दो हमें
अपने बीच।

तुम लगाकर लाँछन कुकुरमुत्ते होने का
करोगे बहिष्कार।
पर क्यों?
कब तक?
कभी अपने गिरेबान में भी झाँको
तुम भी कभी कुकुरमुत्ते ही थे
मशरूम तो आज बने हो
क्या पता हम में से भी कोई
बन जाए मशरूम।
संभावना जिन्दा रहनी जरूरी है।

चूँकि पहले-पहल सभी
कुकुरमुत्ता ही उगते हैं।
आज तुम बनकर मशरूम
महकते हो किसी हवेली की रसोई में
या
सजते हो किसी अन्य मशरूम की थाली में।

पर हमें ये गवारा नहीं,
हम मशरूम नहीं
कुकुरमुत्ता ही भले हैं।
तुम्हारी मशरूमियत तुम्हें मुबारक
हमें कुकुरमुत्ता ही रहने दो।

हम हवेली के मशरूम नहीं बन सकते
हम झोंपड़ी के कुकुरमुत्ते ही ठीक हैं।

हमें नहीं करना-
'चौबारा रसोई और पाव चून' को सार्थक।

अभिनव सरोवा
18 दिसंबर 2018
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शहीद के पिता- भाग आठ

शहीद के पिता- भाग आठ

खाने की कर पूरी औपचारिकता
वो पसर गया खाट पर।

नींद अभी कोसों दूर थी
फिर भी जबरदस्ती किए जा रहा
सामने खड़ी गाय जैसे कर रही सवाल
आज रोटी क्यों नहीं खाई?
मैंने भी तो चारा खाया था,
तू ही हिम्मत हार गया
एक सैनिक का पिता होकर
अब बर्दाश्त करना सीख।
तुझे फिर से लड़ना है
जिंदगी से जद्दोजहद करनी है।

उसने बिनबोले फिर ली करवट
ताकि गाय नजर न आए।
जब कुछ जवाब न सूझे तो
नजर फेरना एक पुराना नुस्खा रहा है।
उसने भी इसे ही अपनाया।
फिर भी नींद कहाँ आने वाली थी
लगा सवाल कर रही है खाट भी

अचानक कान में कुछ फुसफुसाहट हुई
गौर से सुना तब पता चला कि
ये खाट ही है।
बोली- सुबह किसका फोन था?
क्या कह रहा था?
फिर तूने चाय भी नहीं पी?
सब ठीक तो है?

अब कैसे कहूँ तुझसे कि
तेरी दावण खींचने वाला
अब कभी नहीं आएगा।
बड़ा बेरहम निकला,
सारा बोझ मुझ पर डालकर
खुद सो गया चिर-निद्रा में।
नाम भी कमा लिया और
छोड़ गया मुझे बीच राह में।

छोड़ गहरी निःश्वास
बोला मन ही मन
ये खाट खटोला बनकर
उड़ क्यों नहीं जाती
और मुझे ले चलती उस जगह
जहाँ ली थी उसने अंतिम साँसें
खून भी तो गिरा होगा उस मिट्टी में
लाल हो गई होगी धरा।

मैं बटोर लूँ वो मिट्टी
ताकि रगड़ सकूँ कंधों पर
और पा सकूँ बोझ झेलने की ताकत।

उसे मल लूँ
पैरों पर जो
महसूस न करूँ थकान और
चलता रहूँ वीरान राहों पर।

उसे लगा सकूँ आँखों पर
ताकि गिरे न आँसू
गर गिर भी जाए तो
रम जाए उसी मिट्टी में
जिसमें मिला हो लहू उसका।

उसे मल लूँ पेट पर
जिससे मिटा सकूँ
घरभर की भूख।

अंतिम साँस लेते
उसे किसी ने तो देखा होगा
कोई मानुष नहीं तो
झाड़ी, पत्थर या कोई पंछी तो
रहा होगा
वहीं इर्द-गिर्द उसके।

कितना तड़पा होगा
कितनी देर तड़पा होगा
बहुत पीड़ा हुई होगी उसे
किसे याद कर रहा था
हाथ मूँछों पर था या नहीं
कोई गिला तो नहीं था
कितने आदमी थे
जैसे अगणित सवाल उठ रहे मन में।

सोचते-सोचते न जाने किस पहर
घेर लिया नींद ने।
अचानक कल की ही तरह
भीतर से घड़े-लोटे की वार्ता सुन
खुल गई आँखें।

हो लघुशंका से निवृत्त
चाय पीई ही थी
कि रिश्ते में भाभी
कहलवाती थी जो
घर में हुई दाखिल
घूँघट में चेहरा छुपाए
गर्दन झुकाए
बिन बोले
जा पहुँची आँगन
और मार दहाड़े
गिर गई पैरों में
कि मेरी जीभ पापिन है
ये कट क्यों नहीं जाती
इसमें कीड़े पड़ें
मैं क्यों न मर गई उसकी जगह
इस बदजुबान ने कहा तो कैसे कहा कि
तेरा पूत मर जाए।

हाय! मेरी मति मारी गई थी
जो अपने ही बेटे के लिए
क्या-क्या बोल गई।

माँ बेचारी खड़ी मुँह ताक रही
ताईजी! क्या हुआ आपके बेटे को?

मैं क्या कहूँ, कैसे कहूँ
जिस दिन बाड़े में मैंने तुझसे कहा था कि तेरा पूत मर जाए।
हाय! मेरी मति मारी गई थी
जो अपने ही बेटे के लिए
मौत माँग ली।
हो सके मुझे माफ़ कर देना।
तुझे कैसे कहूँ
मैं कल रात से कितनी तड़पी हूँ।
रात भी जुग से लम्बी
काटे न कट रही थी।

कैसे मारा होगा हरामियों ने
मेरे चाँद के टुकड़े को?
हाय! हमें किसके सहारे छोड़ गया
अब कौन मुझे ताई बुलाएगा?

माँ अंदर खड़ी
समझने की कोशिश कर रही
कि क्या हुआ है?
कहीं फौजी को तो......?

नहीं, नहीं
ऐसा नहीं हो सकता।
उसकी आँखों के सामने घूम गया
वो दृश्य जब लड़ी थी
ताई और मैं।
और याद आया कि
कल से कुछ सही नहीं हो रहा
बेटा भी घर आ गया
बेटी को भी बुला लिया
रेडियो भी नहीं बजा।
कहीं फौजी को तो.....?

तब तक गाँव से कई लोग
घर का द्वार लाँघ चुके थे
महिलाएँ भी साथ थीं।
कुछ ने इसे संभाला
कुछ ने उसे
कुछ ने बहिन को और
बेटे को उसके साथियों ने।

सब पत्थर बने थे
अबोले थे सब
पूर्णतः निःशब्द
एकदम गूँगे
जैसे काट दी जीभ किसी ने।

तौलिया जो डाला जाता है गले में या
लपेटा जाता सर पर
आज मुँह में दबा है।
कहीं फफक न पड़ें।

सब बैठे हैं।
किसी की हिम्मत न हो रही
ये कहने कि
संभळ बावळा! आज से तू एक शहीद का पिता कहलाएगा।
अंदर महिलाओं की हालत न कही
जा सकती है न लिखी।
जैसे उजड़ गई दुनिया
सबकी छाती भीग रही।
आज पूरा गाँव उसका बाप और माँ
बना हुआ है।

कल तक वो गाँव के नाम से जाना जाता था
आज से गाँव उसके नाम से जाना जाएगा।

आज से ये गाँव शहीद का गाँव कहलाएगा।

अभिनव सरोवा
19 दिसंबर 2018

Wednesday, 19 December 2018

शहीद के पिता- भाग सात

शहीद के पिता- भाग सात

इधर खाना खाया जा रहा था
या कहें कि
हलक से नीचे धकेला जा रहा था

उधर गाँवभर में
जारी थीं कुछ मौन और
वेदनापूर्ण हलचलें
पड़ोसियों की खिड़कियों में जमी आँखें
छप्पर से उठते धुँए को
देख रही थीं
आसमाँ में घुलते।

घरभर में पसरी थी
शमसान-सी वीरानी,
कहीं जीवन का निशान
नजर न आ रहा।

बातों-बातों में
साढ़े पाँच वाली बस ने
दी गाँव में दस्तक।
चाय पीकर अलग हुई ही थी कि
दिखी भतीजे संग बेटी
आँगन में खड़ी।
उसके चेहरे पर भी
चिंता की लकीरें
साफ़ पढ़ी जा सकती थी।

माँ! पापाजी को क्या हुआ?
भाई कह रहा था कि
तबियत खराब है।
अभी कहाँ  हैं?

कुछ भी तो नहीं
अभी तो बैठक में चाय देकर आई हूँ।
तू बैठ, मैं चाय बनाती हूँ।

क्यों रे! तुझे किसने कहा कि
ताऊजी की तबियत खराब है?
अब तक भतीजा भी
लाँघ चुका था चौखट।
शायद यही सवाल वह खुद से
पहले ही कर चुका था।

वो चाय के साथ
कई सवाल लिए प्रविष्ट हुई बैठक में
तबियत इतनी भी ख़राब नहीं
कि इसे भी बुला लिया।

कुछ नहीं बस जी ख़राब था और
तू भी नहीं थी तो
इसे लिवाने भेज दिया,
वह धीरे से बोला।

अब आप बच्चे नहीं रहे
इसका भी घर है।
वहाँ भी बहुत काम है और
वैसे भी पाँचवाँ चल रहा है।
कल को तुम्हें खाँसी हो जाए तो
'फौजी' को भी बुला लोगे।

हाय! तुम्हें कैसे कहूँ कि
तुम्हारे 'फौजी' शब्द ने मेरा कलेजा
बेंध दिया
कोई तीर हो गया
आर-पार
जो रह-रहकर
कुरेद रहा है
हिया मेरा।

फौजी का नाम सुनते ही
बहिन शिकायती लहजे में बोली
भैया का फोन
चार दिन पहले आया था।
आज आने दो
बताती हूँ उन्हें
इतने दिन क्यों नहीं किया।

बाई! मेरी बात हुए भी
तीन दिन हो गए।
क्यों जी, आपके पास आया क्या?

हाँ, परसों आया था
वो कहीं बाहर जाने की बोल रहा था
वहाँ टावर नहीं मिलता।
वापिस आते ही कर लेगा।
ये बात सुनने में जितनी सरल थी
कहने में उतनी ही कठिन।
बहते दरिया को रोकना पड़ता है
सुलगते चूल्हे को बुझाना पड़ता है
उड़ते बादल को करना होता है
अनदेखा।

खैर, कह तो दिया पर
वापिस कौन आएगा
कब आएगा
क्यों आएगा
कहाँ आएगा
किस वेश में आएगा?
ये सिर्फ वही जानता था।
वो सो गया
करवट बदलकर।

इधर माँ-बेटी भी
अपनी क़यामत से बेखबर
लग गई बातें।

उसे कुछ अलसाया देख
वह बोली- पापाजी चाय बनाऊँ?
मना करने की हिम्मत न हुई।
लगा आज आखिरी चाय बना रही है।

चाय बनाते-बनाते सहसा
बोली- माँ आज रेडियो क्यों नहीं बजा?

उसके मन में आया कि कह दूँ
रेडियो का तार सुदूर पूर्वोत्तर से जुड़ा है
अब कट गया वो तार
उधड़ गया उसका प्लास्टिक-खोल
नंगा हो गया वो तार
हो गया शॉर्ट
और
और तू अब उस तार की
अभागिन भगिनी कहलाएगी।

अभिनव सरोवा
04 दिसंबर 2018

Saturday, 1 December 2018

शहीद के पिता- भाग छह

शहीद के पिता- भाग छह

वह घसीट रहा खुद को
बनकर लूला, लंगड़ा, गूँगा
(क्षमा सहित)
समधी के घर
तभी बाड़ के पास से
चलती दिखी
सूखे उपलों भरी तगारी
जिसे अक्सर वह
देखा करता था
लगभग इसी समय
तत्काल हुआ
देह में रक्त-संचरण
जैसे लंबी मूर्च्छा टूटी हो
संभालना खुद को बेशक
दुश्वार था फिर भी
कर कलेजा फौलाद का
उठा खाट से और
बोला आँख से
कि उसने सुबह से कुछ नहीं खाया है
कहने को तो लड़के ही थे
पर संवेदना उनकी भी चरम पर थी
वही कहा आँखों से
जो वह चाहता था।

अरे भैया! तू आज कैसे आ गया?
तू तो 15 दिन बाद आने वाला था।

बस ऐसे ही माँ
रूम पार्टनर घर गया
और तू जानती ही है कि
मुझसे अकेले खाना बनाना
कितना कठिन लगता है।

अच्छा ठीक है,
मैं रोटी बनाती हूँ।

उसी दरम्यान कड़की
बनावटी बिजली-
तू बात ही करती रहना
रोटी बना
मुझे भूख लगी है।
गोबर पाथने में
पूरा दिन लगा देती है।

अब इन्हें क्या हुआ?
अभी तो मुँह लटकाए बैठे थे
अब भूख लगी है, हूँह....।

इसी उधेड़बुन में वह
पहुँच गई आँगन में
उनका मुँह तो नहीं देख पाई
पर बेटे के उतरे मुँह पर
उसने कुछ स्याह छाया देखी।

किया खुद से सवाल
कुछ बात तो है
फिर
जगी नारी सुलभ भावनाएँ-
सिर्फ वो ही नहीं
बेटा भी तो भूखा है।

कुछ ही देर में--
भैया, तेरे पापाजी को रोटी पकड़ा दे,
की आवाज पर वो अंदर गया तो
उसने उसके दोस्तों को भी
अंदर भेज दिया
बोला- इसे खाना खिला देना।

तभी बेटा थाली ले आया।
जा तू भी खा ले
कहकर भेज दिया वापिस
वो नितान्त अकेला
ताकता रहा थाली।
थाली आज रण-थली बनी हुई थी।
उसे नजर आ रहे थे
चारों तरफ बिखरे
माँस के लोथड़े,
कटे-फटे अंग।
अंगों से रिस रहा था खून
थाली में
कभी इधर कभी उधर

खाना खाली पेट से नहीं
खाली मन से खाया जाता है
पर यहाँ मन तो पहले से
भरा ही नहीं था,
छलक रहा था।

वह उठा और देखा चारों तरफ
फिर करके तसल्ली और हिम्मत
उठा
और खिला दिया गाय को।
वहीं उसके सामने रखी बाल्टी से
धो मुँह
उपस्थित हुआ आँगन में।

देखा- वो बड़े प्यार से उन्हें खाना
खिलाकर परोस रही थी
खुद के लिए।
तब रख लिया पत्थर
कलेजे ही नहीं
जीभ पर भी।

नहीं तो उगल ही देने वाला था कि
आज से तू एक शहीद की माँ कहलाएगी।

अभिनव सरोवा
01 दिसंबर 2018