Thursday, 20 December 2018

शहीद के पिता- भाग आठ

शहीद के पिता- भाग आठ

खाने की कर पूरी औपचारिकता
वो पसर गया खाट पर।

नींद अभी कोसों दूर थी
फिर भी जबरदस्ती किए जा रहा
सामने खड़ी गाय जैसे कर रही सवाल
आज रोटी क्यों नहीं खाई?
मैंने भी तो चारा खाया था,
तू ही हिम्मत हार गया
एक सैनिक का पिता होकर
अब बर्दाश्त करना सीख।
तुझे फिर से लड़ना है
जिंदगी से जद्दोजहद करनी है।

उसने बिनबोले फिर ली करवट
ताकि गाय नजर न आए।
जब कुछ जवाब न सूझे तो
नजर फेरना एक पुराना नुस्खा रहा है।
उसने भी इसे ही अपनाया।
फिर भी नींद कहाँ आने वाली थी
लगा सवाल कर रही है खाट भी

अचानक कान में कुछ फुसफुसाहट हुई
गौर से सुना तब पता चला कि
ये खाट ही है।
बोली- सुबह किसका फोन था?
क्या कह रहा था?
फिर तूने चाय भी नहीं पी?
सब ठीक तो है?

अब कैसे कहूँ तुझसे कि
तेरी दावण खींचने वाला
अब कभी नहीं आएगा।
बड़ा बेरहम निकला,
सारा बोझ मुझ पर डालकर
खुद सो गया चिर-निद्रा में।
नाम भी कमा लिया और
छोड़ गया मुझे बीच राह में।

छोड़ गहरी निःश्वास
बोला मन ही मन
ये खाट खटोला बनकर
उड़ क्यों नहीं जाती
और मुझे ले चलती उस जगह
जहाँ ली थी उसने अंतिम साँसें
खून भी तो गिरा होगा उस मिट्टी में
लाल हो गई होगी धरा।

मैं बटोर लूँ वो मिट्टी
ताकि रगड़ सकूँ कंधों पर
और पा सकूँ बोझ झेलने की ताकत।

उसे मल लूँ
पैरों पर जो
महसूस न करूँ थकान और
चलता रहूँ वीरान राहों पर।

उसे लगा सकूँ आँखों पर
ताकि गिरे न आँसू
गर गिर भी जाए तो
रम जाए उसी मिट्टी में
जिसमें मिला हो लहू उसका।

उसे मल लूँ पेट पर
जिससे मिटा सकूँ
घरभर की भूख।

अंतिम साँस लेते
उसे किसी ने तो देखा होगा
कोई मानुष नहीं तो
झाड़ी, पत्थर या कोई पंछी तो
रहा होगा
वहीं इर्द-गिर्द उसके।

कितना तड़पा होगा
कितनी देर तड़पा होगा
बहुत पीड़ा हुई होगी उसे
किसे याद कर रहा था
हाथ मूँछों पर था या नहीं
कोई गिला तो नहीं था
कितने आदमी थे
जैसे अगणित सवाल उठ रहे मन में।

सोचते-सोचते न जाने किस पहर
घेर लिया नींद ने।
अचानक कल की ही तरह
भीतर से घड़े-लोटे की वार्ता सुन
खुल गई आँखें।

हो लघुशंका से निवृत्त
चाय पीई ही थी
कि रिश्ते में भाभी
कहलवाती थी जो
घर में हुई दाखिल
घूँघट में चेहरा छुपाए
गर्दन झुकाए
बिन बोले
जा पहुँची आँगन
और मार दहाड़े
गिर गई पैरों में
कि मेरी जीभ पापिन है
ये कट क्यों नहीं जाती
इसमें कीड़े पड़ें
मैं क्यों न मर गई उसकी जगह
इस बदजुबान ने कहा तो कैसे कहा कि
तेरा पूत मर जाए।

हाय! मेरी मति मारी गई थी
जो अपने ही बेटे के लिए
क्या-क्या बोल गई।

माँ बेचारी खड़ी मुँह ताक रही
ताईजी! क्या हुआ आपके बेटे को?

मैं क्या कहूँ, कैसे कहूँ
जिस दिन बाड़े में मैंने तुझसे कहा था कि तेरा पूत मर जाए।
हाय! मेरी मति मारी गई थी
जो अपने ही बेटे के लिए
मौत माँग ली।
हो सके मुझे माफ़ कर देना।
तुझे कैसे कहूँ
मैं कल रात से कितनी तड़पी हूँ।
रात भी जुग से लम्बी
काटे न कट रही थी।

कैसे मारा होगा हरामियों ने
मेरे चाँद के टुकड़े को?
हाय! हमें किसके सहारे छोड़ गया
अब कौन मुझे ताई बुलाएगा?

माँ अंदर खड़ी
समझने की कोशिश कर रही
कि क्या हुआ है?
कहीं फौजी को तो......?

नहीं, नहीं
ऐसा नहीं हो सकता।
उसकी आँखों के सामने घूम गया
वो दृश्य जब लड़ी थी
ताई और मैं।
और याद आया कि
कल से कुछ सही नहीं हो रहा
बेटा भी घर आ गया
बेटी को भी बुला लिया
रेडियो भी नहीं बजा।
कहीं फौजी को तो.....?

तब तक गाँव से कई लोग
घर का द्वार लाँघ चुके थे
महिलाएँ भी साथ थीं।
कुछ ने इसे संभाला
कुछ ने उसे
कुछ ने बहिन को और
बेटे को उसके साथियों ने।

सब पत्थर बने थे
अबोले थे सब
पूर्णतः निःशब्द
एकदम गूँगे
जैसे काट दी जीभ किसी ने।

तौलिया जो डाला जाता है गले में या
लपेटा जाता सर पर
आज मुँह में दबा है।
कहीं फफक न पड़ें।

सब बैठे हैं।
किसी की हिम्मत न हो रही
ये कहने कि
संभळ बावळा! आज से तू एक शहीद का पिता कहलाएगा।
अंदर महिलाओं की हालत न कही
जा सकती है न लिखी।
जैसे उजड़ गई दुनिया
सबकी छाती भीग रही।
आज पूरा गाँव उसका बाप और माँ
बना हुआ है।

कल तक वो गाँव के नाम से जाना जाता था
आज से गाँव उसके नाम से जाना जाएगा।

आज से ये गाँव शहीद का गाँव कहलाएगा।

अभिनव सरोवा
19 दिसंबर 2018

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