Wednesday, 27 December 2017

मेरी संक्षिप्त जीवन यात्रा

मेरी संक्षिप्त जीवन यात्रा--

होश संभालने से पहले ही पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ सिर पर आ पड़ा। पापाजी गठिया के रोगी हैं। खेत मे रहते थे। पानी कुएँ से खींचकर भरना पड़ता था। 5 साल की उम्र में मम्मी द्वारा खिंचे गए कनस्तर को पकड़कर कुएँ की जगत पर रखता। फिर मम्मी आकर मटके में भरती। आते-जाते लोग उनको कहते कि तू कभी छोहरे को मारेगी। पर कोई उपाय नहीं था। ये सिलसिला अनवरत जारी रहा। आज भी उस बात को याद करके मम्मी रो पड़ती है। 1989-90 में बुआ जी के पास चला गया। वहाँ अनिता दीदी ने भविष्य की नींव में सीमेंट-ईंट डालनी शुरू कर दी थी। 10 वीं कक्षा की परीक्षा 1997 में देकर लगातार 30 दिन तक मजदूरी की और दोनों भाइयों की आगे की पढ़ाई का खर्चा जमा किया। उसके बाद हर छुट्टी मजदूरी करने में बीती। 2002 में स्नातक की परीक्षा देते ही परिणाम का इंतजार किये बिना ही अलवर के भिवाड़ी शहर में निजी कंपनी में काम करने चला गया। वहां से दिल्ली गया जहाँ सब्जी की मदर डेयरी पर काम किया। वहीं से जान पहचान बढ़ी और नासिक में जिंदल पॉली फ़िल्म में काम करने चला गया। 2006 में शादी हो गई। 2007 में  b ed में प्रवेश हेतु एग्जाम दिया। सफल भी रहा। फीस नहीं थी तो पत्नी ने अपने पीहर वालों से बोलकर ये व्यवस्था की। जिस दिन b ed में चयन हुआ उसी दिन बेटी का जन्म भी हुआ। बिना एक भी दिन अनुपस्थित रहते हुए b ed किया और निजी स्कूल्स में काम किया। 4 स्कूल्स बदले। सितम्बर 2011 में एक बेटे का बाप भी बन गया अब जिम्मेदारियाँ बढ़ती जा रही थी। हालात ने दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया था पर इसी घड़ी में छोटा भाई अभिषेक मसीहा बनकर उभरा जो उस समय hp के धर्मशाला में किसी निजी कम्पनी में काम कर रहा था। अभिषेक को कभी मजदूरी पर नहीं जाने दिया शायद वह भी इस बात को समझता था। जुलाई 2011 में छोटे भाई की मदद से निजी स्कूल छोड़कर सीकर तैयारी के लिए चल गया। परीक्षा दी पर विफल रहा। पेपर भी बढ़िया गया था। होली का रंग आँसुओं में बदल गया। ये फरवरी 2012 की बात है। अप्रैल 12 में फिर से भर्ती निकली और मनोज कुमार मिश्रा जी के पास फिर से सीकर चला गया। मनोज जी के मार्गदर्शन और हौसलाअफजाई ने मनोबल को कम नहीं होने दिया। 2 जून 2012 को पेपर दिया। पेपर में सफल होने की पूरी उम्मीद थी पर फरवरी 2012 ने ज्यादा खुश नहीं होने दिया। अगस्त 2012 में परिणाम घोषित हुआ और सफल घोषित हुआ। सितम्बर 2012 में जॉइन किया। साथ-साथ हिंदी से परास्नातक भी किया। 2015 में व्याख्याता की भर्ती आई। इसी दौरान हमारे विद्यालय के प्रधानाध्यापक का तबादला हो गया। चार्ज मुझे मिला। नोडल विद्यालय के hm के कर्त्तव्य का निर्वहन करते हुए तैयारी भी जारी रखी। कुछ मित्र सोशल मीडिया पर मिले जिनमें उत्तम जी, सुखपाल जी, दीपक जी, मूलाराम जी, dk, सुरेंद्र सियाग, दिनेश जारवाल, अंजनी सारस्वत, मिर्धा जी, करण पन्नू, राजेन्द्र जी, मदन जी, ममता जी, अर्चना जी, आकांक्षा जी, अनु जी सहित और भी बहुत से साथी शामिल हैं। उन सबकी मदद से परिणाम पक्ष में रहा। बिना कोई छुट्टी लिए रात-दिन एक करके पढ़ाई की। मम्मी-पापाजी और छोटे भाई के सपनों पर खरा उतरने का ख्याल रात की नींद उड़ा रहा था। रात को ये सोचकर सोना पड़ता था कि सुबह फिर से उठना है। दिन में समय न मिलने को इस प्रकार एडजस्ट किया गया। 29 सितम्बर 2016 को रिज़ल्ट आने के बाद अब जाकर 28 जून 2017 को नौकरी जॉइन की है।

अभिनव सरोवा (हिंदी वाले मास्साब)

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