Saturday, 28 July 2018

चारपाई और सपना

चारपाई और सपना-

काठ की स्थूल आकृत्ति ने
खराद पर कसकर, झेलकर पीड़ा
पाया आकार सुंदर पायों का
अब हो गए हैं सुघड़।

बढ़ई ने चार लकड़ियों में
पिरोकर इसे खाका तैयार कर दिया।

बूढ़े दादाजी या ताऊजी ने
कतली को नचाकर
ता ता थैया, ता ता थैया
सूत लिया तैयार कर।

माईं, दावण, ताना-बाना
डालकर पापाजी ने बना दिया माचा,
हाँ! इस दरम्यान हर कड़ी पर रही
उनकी नजर पैनी
कहीं टूट न जाये कड़ी
ये शंका मन में उनके
रही हर बार।

जब वो बनकर हो गया तैयार
वे दिखाते
बड़ी खुशी से
तारीफ की लालसा भी
इसी में समाहित रहती
लोगों ने बैठ-बैठकर काफी सराहा इसे
ऊपर-नीचे, घूम-घूमकर चारों ओर
देखते इसकी बुनावट।

ज्ञात नहीं कितने लोगों ने इस पर
चैन की साँस ली है
नींद भी ली और कमर भी सीधी की है

हमारा सपना भी कुछ इसी तरह
होकर पूरा लोगों को दे आराम
और पापा कहें कि-
इसे मैंने बुना है और उनका गर्व
समेटने में न आए।

सड़क की भेड़

भाई जी! ये सड़क की भेड्या हीं
थारलै पुम्पाट'ऊँ कोणी हटीं

आँ चामड़ी ऊन'ऊँ ढँक राख्यी है
अ थारलै पुम्पाट'ऊँ नीं
धणी री कामड़ी'ऊँ चालीं हीं

अर विजी भेड्या बी
ओढ़ राख्यो है गुदड़
फगत मंगरा पर'ई नीं
बिबेक पर बी

अ एक कै लारै एक
पड़ती जा'री हीं खाड मायं
बियाँ असली भेड्या री चाल
जेवड़ी री लहर जिसी हुवै

पण अ भेड्या
ताकड़ मचा राख्यी है
विजी भेड़'न पाछी नाह्ख री
कै आपां सस्यूं पैली 'डूबां'

अ सड़क की भेड्या हीं
थारलै पुम्पाट'ऊँ कोणी हटीं

न हटती देख थे पटकस्यो हथेळी
गाडी'रै भूणिये पर
का खोल खिड़की
कीं गाळती बी देस्यो।

अर कीं बड़बड़ा'र निकल स्यो
सड़क की कांठळ-कांठळ
आंख्या चुराता-चुराता
बीं लट्ठधर स्यूं

पण

पण अठे थे थाकल पड़ग्या
भेड्या रो धणी थारी बड़बड़ाट नै
द्रोह मान लेसी (श्रेणी खुद सोचो)

अर जदै
थे कांठळ-कांठळ
निकळ कोणी पावोला

क्यों'कै अ नेशनल हाईवे की
भेड्या हीं।

अभिनव सरोवा (स्वरचित हिंदी कविता की राजस्थानी में अनुदित रचना)

आगली साल

आगली साल--

लेव लाग्योड़ी भींत रै
मंगर टिकाया
रोट्यां पोंवती जोड़ायत रो
पसीनो चुंवतो मुँह
अर
माटी री परात मायं
आटे मायं
इकसार चालते हाथ नै
निरखतो, बुझयोडै मन स्यूं कह्यो
क मिर्च्याळी बाटकी देई।

बाजरै री रोटी पर घाल
बिना लसण री मिर्च
बो सोच्यो कै
अबकै सावणी पछै
एक रसोई अर
एक न्हाणघर जरूर बणास्यूं।
फेर
मन ई मन सोच्यो कै
जोड़ायत तो आज दिन तांई
बाड़'र सहारे बैठ'र
पाणी ढोळ लियो
पण
अबार छोरी बी तो
दस्यूं मायं हुगी
अब एक न्हाणघर हुणो चाहिजै

आखै चौमासै पछै जदै
धान मंडी मै बेच'र
घरै आयो
तदै जोड़ायत बिंगो मुंडो देख'र
खुद ई चला रै बोली
इबगै न्हाणघर बणाल्यो
रसोई आगली साल बणास्यां
बो फेर नीची नजराँ करकै
रोटी जिमतो मन ई मन कह्यो के
'ओज्यूँ आगली साल'...?

अभिनव सरोवा