वीडियो देखें न देखें लेकिन एक मिनट का समय निकालकर यहाँ से व्याख्या तो पढ़ ही सकते हैं।
https://youtu.be/3R0sA9lG7_0
साथियो! इस वीडियो में हम कक्षा 10 की हिंदी की पाठ्यपुस्तक क्षितिज के पहले पाठ #सूरदास के चौथे पद पर चर्चा कर रहे हैं। यह पद सूरदास के विख्यात ग्रन्थ #सूरसागर के #भ्रमरगीत प्रसंग से लिया गया है। इसमें गोपियाँ उद्धव को कहती हैं कि हे उद्धव! यह तो मन के मानने की बात है। इसे जो पसंद आए उसके गुण-अवगुण नहीं देखता। कृष्ण जैसे भी हैं, इस मन ने उन्हीं को पसंद किया है। जैसे विष का कीड़ा दाख और छुहारे जैसे मेवों को छोड़कर विष ही खाता है। चकोर नामक पक्षी को कोई कपूर खिलाने का कितने भी प्रयास क्यों न करे लेकिन वो झुलसा देने वाले अंगारे ही खाता है। एक भ्रमर जो काठ(काष्ठ) को फोड़कर अपना घर बनाता है लेकिन वही भ्रमर कमल के नाजुक/कोमल पत्तों में क़ैद हो जाने के बाद उन्हें काटकर बाहर नहीं निकलता। जो भ्रमर काठ में छेद कर सकता है उसके लिए कमल की पत्तियों को भेदना कोई मुश्किल काम नहीं है लेकिन उसे कमल से प्रेम है इसलिए वह उसे कोई क्षति/नुकसान नहीं पहुँचाता है और रातभर उसमें क़ैद रह जाता है। गोपियाँ अपनी बात की पुष्टि के लिए आगे कहती है कि दीये पर मर-मिटने वाला पतंगा जानता है कि उसकी लौ में जलने से उसकी मृत्यु ही होनी है फिर भी वह दीये की लौ में खुद को भस्म करने से परहेज नहीं करता है और प्रेम के वशीभूत होकर खुद को क़ुरबान कर देता है। हे उद्धव! जिसका जैसा मन होगा, उसे वही पसंद होगा। तुम ये बात क्यों नहीं समझते हो? इसलिए कृष्ण जैसे भी हैं, हमें पसंद हैं। सूरदास के इस पद की भाषा ब्रज और शैली भावपूर्ण है। इस पद में उदाहरण अलंकार प्रयुक्त हुआ है। व्याख्या का ये वीडियो पसंद आए तो बच्चों संग साझा कीजिए और चैनल को सब्सक्राइब कीजिए। सादर....