Saturday, 24 December 2022

पेपर आउट प्रकरण

सुबह-सुबह स्कूल जाने के लिए बस स्टैंड पहुँचकर फ़ोन देखा तो पहली खबर मिली कि आरपीएससी ने वरिष्ठ अध्यापक भर्ती परीक्षा के ग्रुप-सी के फर्स्ट पेपर को निरस्त कर दिया है क्योंकि 9:00 बजे से शुरू होने वाला यह पेपर आउट हो गया था। अनेक परीक्षार्थी तब ठगे से रह गए होंगे जब वीक्षक ने बताया कि पेपर आउट हो गया है और आज की परीक्षा निरस्त घोषित कर दी गई है। क्या गुजरी होगी उन पर? अभी पुष्टि न होने की खबर ही आ रही थी। लेकिन थोड़ी ही देर बाद आरपीएससी की तरफ़ से आधिकारिक खबर भी आ गई। साथियो! यह वही आरपीएससी है जिसने लोगों को स्लिपर्स और हाफ बाजू की शर्ट पहनने पर मजबूर कर दिया था और झुमके, बाली, मंगलसूत्र निकालने पर मजबूर कर दिया था, यहाँ तक कि फुल बाजू को बड़ी बेदर्दी के साथ कटवा दिया था। जब ये नियम ही बना लिए थे तो अब सरदियों में पेपर करवाने की नौबत क्यों आ गई? और आज अपनी एक छोटी-सी ग़लती पर कितनी आसानी से कह दिया कि पेपर निरस्त किया जाता है. खामियाजा कौन भुगतेगा? सवाल खड़ा रहेगा जनाब! 

                 स्कूल के लिहाज से देखा जाए तो 24 दिसंबर वर्ष 2022 का यह दिन अंतिम कार्य दिवस था, भयंकर ठंड और घना कोहरा। इन सबके बावजूद परीक्षार्थी 8:30 बजे से पहले अपने-अपने परीक्षा केंद्रों पर पहुँच चुके थे। अंदाजा लगाइए कि कितनी असुविधा उन्हें हुई होगी लेकिन उनकी असुविधाओं का बनता है? और क्या बनता है खुद उनका? वैसे देखा जाए तो दोष भी किसे दे सकते हैं? पेपर आउट करने वाले कौन थे? अपने ही जैसे। आउट करवाने वाले जिन्होंने पैसे दिए, जिन्होंने पूरी बस किराए पर की, सब हममें से ही थे। मतलब यह हो गया कि हम मेहनत से कुछ करना ही नहीं चाहते सिर्फ शॉर्टकट चाहिए हमें! और कौन थे जो बस में बच्चों को पेपर सॉल्व करवा रहे थे? सुनने में आ रहा है कि कोई लेक्चरर थे। लानत है तेरी लेक्चरारी पर! क्या ज़रूरत थी ये सब करने की? लेकिन नहीं, हमें पैसा चाहिए बहुत सारा। ले ले। हमारा आर्थिक आग्रह इतना भयानक क्यों होता जा रहा है? हम अपनी आवश्यकताओं को ही सीमित क्यों नहीं रख सकते? हम आवश्यकताएँ सीमित रखेंगे तो जितना कमा रहे हैं उसमें काम चला सकेंगे। हम बेटे-पोतों के लिए धन जमा करके छोड़ जाना चाहते हैं। ‘सपूत तो क्यों धन संचै, पूत कपूत तो क्यों धन संचै’ घनघोर राष्ट्रवादियों और संस्कृति की नेजा उठाने वालों की नज़र में ये नीति वाक्य था, एक आदर्श वाक्य था जिसकी हमने मिलकर ऐसी-तैसी की है। चूँकि लोकतंत्र में जिम्मेदारी सरकार की होती है तो सरकार पर आरोप लगने ही हैं। क्यों हुआ का जवाब सरकार से पूछा जाएगा। पूछना भी चाहिए ही। लेकिन सरकार एक-एक आदमी तक हो जाएगी? जिन लोगों ने आउट किया है या जिन लोगों ने आउट करवाया है उन लोगों ने मेहनत क्यों नहीं की? वे किसी दूसरे गोले से आए थे?  

        माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और आरपीएससी जैसी स्वायत्तशासी संस्थाएँ अपनी प्रेस क्यों नहीं लगा लेतीं? जो सबसे बड़ा अधिकारी है, जिसका प्रमोशन होने वाला है उन अधिकारियों को इन सबकी जिम्मेदारी क्यों नहीं दे सकते? ऐसी भयानक वारदात के बाद देखने में आता है कि किसी कम ग्रेड पे वाले कार्मिक या कार्मिकों को सस्पेंड कर दिया जाता है, ये कब तक चलता रहेगा? मैं यहाँ किसी आदर्शवाद के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता कि लोगों ने अपनी ज़मीन गिरवी रखी है, अपने गहने गिरवी रखे। जिनके पास गिरवी रखने को गहने होते हैं वे गरीब नहीं हुआ करते। हाँ, ये कहा जा सकता है कि उन्होंने ब्याज पर उधार लिए होंगे। उन्हें खेत में काम करने से छूट दी होगी, घर में झाड़ू-पौंछा करने से मोहलत दी होगी। घरवालों ने कहा होगा कि नहीं बेटा, आप तैयारी कीजिए, काम का क्या है वो हम कर लेंगे. लेकिन चाहे वह किसी अमीर माँ-बाप का बेटा-बेटी हो या किसी गरीब माँ-बाप का बेटा-बेटी हो। उन सब माँ-बाप ने और उन सभी बच्चों ने सपने देखे होंगे कि उनका भविष्य भी उज्ज्वल हो, सरकार के खजाने में उनका भी सीर हो। होना भी चाहिए, सपने भी देखने चाहिए लेकिन सांविधानिक तरीक़े से। लेकिन नहीं कुछ अभिभावकों और कुछ अभ्यर्थियों को लगा कि हमारे होते किसी और का भविष्य उज्ज्वल कैसे हो सकता है! हमारे पास पैसे हैं और हम लोगों के सपनों को खरीद लेंगे। अब खरीद लो! ठीक तो होंगे ही तुम लोग!

                 मैं पुलिस प्रशासन को इस मामले में धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने मुस्तैदी दिखाई और बस को जब्त कर सभी सवारों को गिरफ़्त में कर लिया. सोशल मीडिया पर जिधर देखो एक ज़िले का नाम लेकर तरह-तरह की फब्तियाँ कसी जा रही हैं। व्यंग्यात्मक कॉमेंट्स किए जा रहे हैं, यह ठीक नहीं है. हम कुछ परिवारों और कुछ मुफ्तखोर बच्चों के इस व्यवहार के कारण सम्पूर्ण ज़िले को दोष नहीं दे सकते, देना भी नहीं चाहिए। हो सकता है कि पुलिस तक जो खबर आई वह भी उसी ज़िले से आई हो बेशक उसने ईर्ष्या या जलन के कारण से यह सूचना दी हो लेकिन दी तो थी। ये जो अभ्यर्थी थे उनमें महिलाएँ भी थीं और पुरुष भी। मतलब ईमानदारी का जेंडर से कोई संबंध नहीं है। इनके माँ-बाप को लग रहा है की दुनिया में हमारे ही बच्चे हैं बाकी तो यूँ ही घास-फूस हैं। *‘साडा कुत्ता कुत्ता तुहाडा कुत्ता टॉमी’* बड़े आए तीसमार खाँ. सोशल मीडिया के कुछ धुरंधर किसी जमाने में शिक्षा मंत्री पर आरोप लगाया करते थे आज उनके मुँह से चूँ नहीं निकल रही है हम इतनी जातिवादी क्यों हो गए हैं? बात-बात में जाति और धर्म देखने से बाज नहीं आएँगे।

             मेरे चाहने से होता तो क्या है फिर भी मैं चाहता हूँ कि पकड़े गए सभी लोगों(जिनमें अभ्यर्थी और पेपर आउट करवाने वाले शामिल थे) के नाम उजागर करके भविष्य की किसी भी परीक्षा में बैठने से प्रतिबंधित किया जाए और पेपर आउट करवाने वालों की प्रॉपर्टी जब्त की जाए, बैंक खाते की राशि सरकारी खाते में जमा की जाए और साथ में घरवालों को भी *‘आन मिलो सजना’* के दर्शन करवा दिए जाएँ तो सोने पे सुहागा। जिन लोगों को इन नालायकों की वजह से 29 जनवरी, 2023 को पेपर देना पड़ रहा है उन्हें भविष्य की कम से कम दो परीक्षाओं के लिए फीस से छूट दी जाए।  

             बाकि तो ईमानदारी हमें ही तय करनी पड़ेगी। हममें से कितने ऐसे हैं जिन्हें परीक्षा से पहले पेपर का ऑफर दिया जाए और हम कह दें कि मुझे मेरी मेहनत पर यकीन है, भाड़ में जा तू और भाड़ में झोंक तेरे पेपर को. ऊपर स्यूँ दगड़ मैं न्हाख देस्यूँ!

       अपनी स्थिति के भी हम खुद ही जिम्मेदार हैं।
जहाँ सरकार, सिस्टम और नकलचियों के प्रति भयंकर गुस्सा और आक्रोश होना चाहिए वहाँ हम जोक्स बना रहे हैं।
 

समस्त विचार अपने निजी हैं- अभिनव सरोवा।