पुस्तक- मैला आँचल
लेखक- फणीश्वरनाथ रेणु
विधा- उपन्यास
रचनाकाल- 1954
कथानक- बिहार के पूर्णिया जिले का मेरीगंज गाँव।
वर्ष 1954 में लिखा गया यह उपन्यास अपने में एकाधिक विशेषताओं को समेटे हुए है। उपन्यास का कथानक आजादी के पूर्व से लेकर तुरंत बाद तक का है। रेणु ने तात्कालिक समाज में व्याप्त जाति प्रथा को बखूबी उकेरा है। गाँव में हर जाति के अपने अलग-अलग टोले बने हुए हैं जो राजपूत टोला, ब्राह्मण टोला, कायस्थ टोला के नाम से बसे हुए हैं। गाँव में व्याप्त अशिक्षा, कुरीति, अंधविश्वास, डायन प्रथा, नशाखोरी, विवाहेतर संबंध, राजनीतिक हलचल, पार्टीबाजी, परस्पर आरोप-प्रत्यारोप, जमीदार एवं तहसीलदार द्वारा किसानों का शोषण, अशिक्षा के चलते डॉक्टर पर अविश्वास (कुएं में हैजा फैलने वाली दवाई डालता है, इंजेक्शन से लोगों को कमजोर कर देता है आदि) इत्यादि पर पाठकों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया है। जिसमें वे पूर्णतया सफल भी रहे हैं। मठों में व्याप्त व्यभिचार, दासी रखने की प्रथा और महंत बनने हेतु किए जाने वाले प्रोपेगेंडा पर भी खुलकर अपनी बात कही है। गाँव के लोगों का सीधापन, मुसीबत के समय पारस्परिक सहयोग, उत्सव-पर्वों में जी भरकर मस्ती करना, महात्मा गाँधी की सेवा(महात्मा गाँधी को देश या भारत माता का प्रतीक माना जाता है) का प्रण, बालदेव द्वारा हिंसा से दूर रहने और हिंसा-बात न करने हेतु टोकना इत्यादि विषयवस्तु पाठक को आगे, और आगे बढ़ने हेतु लालायित करती हैं। इस उपन्यास की सबसे विशेष बात जो इसे हिंदी उपन्यास के अथाह भंडार से जुदा करती है वह है- इसकी आँचलिकता। बिहार के उस क्षेत्र विशेष की फसल, आचार-व्यवहार, नदियों तक की यात्रा करवाई है। लोगों द्वारा बोले जाने वाले शब्दों को हूबहू लिखकर एक तरफ पाठक को सोचने और सोचकर अर्थग्रहण करने हेतु विवश किया है वहीं कुछ अजीबोगरीब शब्दों द्वारा मन ही मन गुदगुदाने को भी विवश कर दिया है मसलन- वाईसचेयरमैन को भैंसचरमन साहब, लखनऊ को नलखौ, रामपुरिया को ड़मपुरिया, गाँधीजी को गन्निजी, बॉयकॉट को बैकाठ, आर्यवर्त को आरजाब्रत, मूवमेंट को मोमेंट, अस्पताल को इस्पताल, डॉक्टर को डागडर, रामायण को रमैन इत्यादि।
उपन्यास में किसान-मजदूरों के शोषण, गरीबी, पीड़ा को भी बखूबी उकेरा गया है। विभिन्न पात्रों के माध्यम से अपने संदेश को पाठकों तक पहुँचाया गया है। डॉ. प्रशांत और कॉमरेड कालीचरण के माध्यम से किसान-मजदूरों की पीड़ा और शोषण को पाठक तक प्रेषित करने का प्रयास किया है। डॉक्टर के माध्यम से कहते हैं कि यह लोग किस कदर घुल-घुलकर मर रहे हैं, इन्हें घुल-घुलकर मरने के लिए मलेरिया से बचना भी एक क्रूरता ही होगी लेकिन डॉ प्रशांत अपना काम पूर्ण निष्ठा के साथ करते हैं और लोगों को बचा लेते हैं। इसी प्रकार कालीचरण के मुख से कहलाते हैं कि यह पूँजीपति और जमींदार खटमल और मच्छर की तरह शोषक हैं। इसीलिए अधिकांश मारवाड़ियों के नाम के साथ 'मल' लगता है और जमीदारों के बच्चे मिस्टर कहलाते हैं। मिस्टर ही 'मच्छर' हैं। आपसी संवाद इस उपन्यास की जान है। संवादों में स्थानीयता है, आँचलिकता है, गेयता है, मौलिकता है।
इस उपन्यास को पढ़ते-पढ़ते कुंवर नारायण की एक कविता 'बात सीधी थी पर भाषा के चक्कर में ज़रा टेढ़ी फँस गई' अक्सर दिमाग में आती रही। उपन्यासकार पहले कोई कथानक चुनता है तदुपरांत उसे भाषा से अलंकृत पर दुनिया के समक्ष पेश करता है। भद्रलोक से चुना कथानक और उनकी सभ्य, श्लील भाषा पाठकों को आकर्षित करती हैं। लेकिन यह उपन्यास ग्रामीण पृष्ठभूमि के कथानक को समेटे हुए है। कोई भी पात्र राज्य या राष्ट्रीय स्तर का नहीं है। वे भाषा के गुलाम नहीं हैं। वे अपनी स्थानीय और रोजमर्रा में बोली जाने वाली बोली का उपयोग करते हैं वह कभी भी जय हिंद नहीं कहते, वे बिना किसी लाग लपेट के 'जै हिन्न' कहते हैं। भाषा-बोली का यही प्रयोग न केवल उपन्यासकार बल्कि पूर्णिया के लोगों को फिर से जुदा करता है।
प्रशांत जो कि अनाथ था अपनी प्रतिभा से डॉक्टर जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर पहुँचता है। अनेक रिसर्च करता है। अपने सद्व्यवहार से गाँव के लोगों से प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित करता है। इसी दरम्यान तहसीलदार की बेटी कमली और डॉक्टर एक-दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। विवाह से पूर्व शारीरिक संबंध बनते हैं। बात गाँवभर में फैल जाती है। गिरफ्तारी होती है। थानेदार द्वारा कॉमरेड दल से संबंध स्थापित करने की कोशिश की जाती है। कमली अपने माँ-बाप से कहती है कि उसे प्रशांत से कोई जुदा नहीं कर सकता। यह कच्ची उम्र का प्यार ही विद्रोह करना सिखाता है।
अंततः डॉक्टर निर्दोष साबित होते हैं। शादी से पूर्व बने संबंधों से कमली एक बच्चे को जन्म देती है। साथी डॉक्टर ममता 15 दिनों का अवकाश लेकर कमली और उसके बच्चे की सेवा के लिए आती है। आखिर में कमली और प्रशांत का विवाह होता है। इस उद्धरण को लिखने का सीधा तात्पर्य है रेणु प्रगतिशील विचारधारा के लेखक थे। आजादी के तत्काल बाद के दकियानूसी समाज में भी वे प्रेम विवाह की सफल परिणति दिखाते हैं। देश के विभाजन से उत्पन्न दंगे पर हल्का प्रकाश डाला गया है क्योंकि मेरी गंज में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं था अतः वह दंगे से प्रभावित नहीं हुआ। गाँधीजी की हत्या से पूरा मेरीगंज शोक की आगोश में समा जाता है। बालदेव के माध्यम से गाँव के लोग गाँधी को जानने, मानने और समझने लगते हैं।
सार रूप में कहा जा सकता है कि रेणु प्रेमचंद के समान प्रयोगधर्मी रचनाकार थे। उन्होंने अपने लेखन का विषय आम, गरीब जनता को बना दिया। इस उपन्यास में कोई एक पात्र मुख्य भूमिका में न होकर पूरा गाँव ही नायक की भूमिका अदा करता है। यही खूबी इस उपन्यास को अलहदा दर्जा देती है।
*वैसे कोई पेशेवर समीक्षक नहीं हूँ। बस पढ़े हुए में से जो आधा-अधूरा याद रह जाता है या थोड़ा-बहुत समझ आ जाता है। उसी के आधार पर लिख देता हूँ। हाँ, आपके सुझाव का जरूर इंतजार रहेगा। शुक्रिया
अभिनव
31 मार्च 2020