Tuesday, 31 March 2020

मैला आँचल

पुस्तक- मैला आँचल
लेखक- फणीश्वरनाथ रेणु
विधा- उपन्यास
रचनाकाल- 1954
कथानक- बिहार के पूर्णिया जिले का मेरीगंज गाँव।

वर्ष 1954 में लिखा गया यह उपन्यास अपने में एकाधिक विशेषताओं को समेटे हुए है। उपन्यास का कथानक आजादी के पूर्व से लेकर तुरंत बाद तक का है। रेणु ने तात्कालिक समाज में व्याप्त जाति प्रथा को बखूबी उकेरा है। गाँव में हर जाति के अपने अलग-अलग टोले बने हुए हैं जो राजपूत टोला, ब्राह्मण टोला, कायस्थ टोला के नाम से बसे हुए हैं। गाँव में व्याप्त अशिक्षा, कुरीति, अंधविश्वास, डायन प्रथा, नशाखोरी, विवाहेतर संबंध, राजनीतिक हलचल, पार्टीबाजी, परस्पर आरोप-प्रत्यारोप, जमीदार एवं तहसीलदार द्वारा किसानों का शोषण, अशिक्षा के चलते डॉक्टर पर अविश्वास (कुएं में हैजा फैलने वाली दवाई डालता है, इंजेक्शन से लोगों को कमजोर कर देता है आदि) इत्यादि पर पाठकों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया है। जिसमें वे पूर्णतया सफल भी रहे हैं। मठों में व्याप्त व्यभिचार, दासी रखने की प्रथा और महंत बनने हेतु किए जाने वाले प्रोपेगेंडा पर भी खुलकर अपनी बात कही है। गाँव के लोगों का सीधापन, मुसीबत के समय पारस्परिक सहयोग, उत्सव-पर्वों में जी भरकर मस्ती करना, महात्मा गाँधी की सेवा(महात्मा गाँधी को देश या भारत माता का प्रतीक माना जाता है) का प्रण, बालदेव द्वारा हिंसा से दूर रहने और हिंसा-बात न करने हेतु टोकना इत्यादि विषयवस्तु पाठक को आगे, और आगे बढ़ने हेतु लालायित करती हैं। इस उपन्यास की सबसे विशेष बात जो इसे हिंदी उपन्यास के अथाह भंडार से जुदा करती है वह है- इसकी आँचलिकता। बिहार के उस क्षेत्र विशेष की फसल, आचार-व्यवहार, नदियों तक की यात्रा करवाई है। लोगों द्वारा बोले जाने वाले शब्दों को हूबहू लिखकर एक तरफ पाठक को सोचने और सोचकर अर्थग्रहण करने हेतु विवश किया है वहीं कुछ अजीबोगरीब शब्दों द्वारा मन ही मन गुदगुदाने को भी विवश कर दिया है मसलन- वाईसचेयरमैन को भैंसचरमन साहब,  लखनऊ को नलखौ,  रामपुरिया को ड़मपुरिया, गाँधीजी को गन्निजी, बॉयकॉट को बैकाठ, आर्यवर्त को आरजाब्रत, मूवमेंट को मोमेंट, अस्पताल को इस्पताल, डॉक्टर को डागडर, रामायण को रमैन इत्यादि।
     उपन्यास में किसान-मजदूरों के शोषण, गरीबी, पीड़ा को भी बखूबी उकेरा गया है। विभिन्न पात्रों के माध्यम से अपने संदेश को पाठकों तक पहुँचाया गया है। डॉ. प्रशांत और कॉमरेड कालीचरण के माध्यम से किसान-मजदूरों की पीड़ा और शोषण को पाठक तक प्रेषित करने का प्रयास किया है। डॉक्टर के माध्यम से कहते हैं कि यह लोग किस कदर घुल-घुलकर मर रहे हैं, इन्हें घुल-घुलकर मरने के लिए मलेरिया से बचना भी एक क्रूरता ही होगी लेकिन डॉ प्रशांत अपना काम पूर्ण निष्ठा के साथ करते हैं और लोगों को बचा लेते हैं। इसी प्रकार कालीचरण के मुख से कहलाते हैं कि यह पूँजीपति और जमींदार खटमल और मच्छर की तरह शोषक हैं। इसीलिए अधिकांश मारवाड़ियों के नाम के साथ 'मल' लगता है और जमीदारों के बच्चे मिस्टर कहलाते हैं। मिस्टर ही 'मच्छर' हैं। आपसी संवाद इस उपन्यास की जान है। संवादों में स्थानीयता है, आँचलिकता है, गेयता है, मौलिकता है।
      इस उपन्यास को पढ़ते-पढ़ते कुंवर नारायण की एक कविता 'बात सीधी थी पर भाषा के चक्कर में ज़रा टेढ़ी फँस गई' अक्सर दिमाग में आती रही। उपन्यासकार पहले कोई कथानक चुनता है तदुपरांत उसे भाषा से अलंकृत पर दुनिया के समक्ष पेश करता है। भद्रलोक से चुना कथानक और उनकी सभ्य, श्लील भाषा पाठकों को आकर्षित करती हैं। लेकिन यह उपन्यास ग्रामीण पृष्ठभूमि के कथानक को समेटे हुए है। कोई भी पात्र राज्य या राष्ट्रीय स्तर का नहीं है। वे भाषा के गुलाम नहीं हैं। वे अपनी स्थानीय और रोजमर्रा में बोली जाने वाली बोली का उपयोग करते हैं वह कभी भी जय हिंद नहीं कहते, वे बिना किसी लाग लपेट के 'जै हिन्न' कहते हैं। भाषा-बोली का यही प्रयोग न केवल उपन्यासकार बल्कि पूर्णिया के लोगों को फिर से जुदा करता है।
प्रशांत जो कि अनाथ था अपनी प्रतिभा से डॉक्टर जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर पहुँचता है। अनेक रिसर्च करता है। अपने सद्व्यवहार से गाँव के लोगों से प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित करता है। इसी दरम्यान तहसीलदार की बेटी कमली और डॉक्टर एक-दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। विवाह से पूर्व शारीरिक संबंध बनते हैं। बात गाँवभर में फैल जाती है। गिरफ्तारी होती है। थानेदार द्वारा कॉमरेड दल से संबंध स्थापित करने की कोशिश की जाती है। कमली अपने माँ-बाप से कहती है कि उसे प्रशांत से कोई जुदा नहीं कर सकता। यह कच्ची उम्र का प्यार ही विद्रोह करना सिखाता है।
अंततः डॉक्टर निर्दोष साबित होते हैं। शादी से पूर्व बने संबंधों से कमली एक बच्चे को जन्म देती है। साथी डॉक्टर ममता 15 दिनों का अवकाश लेकर कमली और उसके बच्चे की सेवा के लिए आती है। आखिर में कमली और प्रशांत का विवाह होता है। इस उद्धरण को लिखने का सीधा तात्पर्य है रेणु प्रगतिशील विचारधारा के लेखक थे।  आजादी के तत्काल बाद के दकियानूसी समाज में भी वे प्रेम विवाह की सफल परिणति दिखाते हैं। देश के विभाजन से उत्पन्न दंगे पर हल्का प्रकाश डाला गया है क्योंकि मेरी गंज में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं था अतः वह दंगे से प्रभावित नहीं हुआ। गाँधीजी की हत्या से पूरा मेरीगंज शोक की आगोश में समा जाता है। बालदेव के माध्यम से गाँव के लोग गाँधी को जानने, मानने और समझने लगते हैं।
      सार रूप में कहा जा सकता है कि रेणु प्रेमचंद के समान प्रयोगधर्मी रचनाकार थे। उन्होंने अपने लेखन का विषय आम, गरीब जनता को बना दिया। इस उपन्यास में कोई एक पात्र मुख्य भूमिका में न होकर पूरा गाँव ही नायक की भूमिका अदा करता है। यही खूबी इस उपन्यास को अलहदा दर्जा देती है।

*वैसे कोई पेशेवर समीक्षक नहीं हूँ। बस पढ़े हुए में से जो आधा-अधूरा याद रह जाता है या थोड़ा-बहुत समझ आ जाता है। उसी के आधार पर लिख देता हूँ। हाँ, आपके सुझाव का जरूर इंतजार रहेगा। शुक्रिया

अभिनव
31 मार्च 2020

Monday, 23 March 2020

हम भेड़ें

हम भेड़ें--

हम भेड़ें हैं
न छोड़ेंगी
भेड़-प्रवृत्ति
अछूता है
विवेक हमारा।
हम करती
अंधानुकरण
बहक जातीं
बिन बात भी।

रखती अपना सिर
दूसरी की दुम तले
न सोचती
न गुनती
बस चलती जातीं
एक क पीछे
बनाकर झुण्ड।

हम भेड़ें हैं
हमें बस ड्राइवर चाहिए
रूप कोई भी चलेगा-
गड़रिया हो या
कुत्ता या हो
हमारे ही बीच का
कोई (पट्ठा) मेढ़ा।

गड़रिया
जो हाँक सके
मर्जी से अपनी
भले झोंक दे
तपते मरुस्थल में
या
चढ़ा दे उत्तुंग गिरि।
बस गड़रिया चाहिए
भले ही
ओढ़ी गई ऊन
चूसी गई हड्डी
या पीया गया खून
हमारा ही क्यों न हो
बस एक गड़रिया चाहिए
जो कर सके
सुरक्षा(?) हमारी।

कुत्ता भी चलेगा
जो रखे अनुशासित(?)
पूरे झुण्ड को
दिखाकर दाँत
गुर्राकर या
भौंककर।
भले ही
स्याह रात में सोए
काली चद्दर तानकर
या
पाकर आहट खतरे की
भौंके झुण्ड के बीच से।
आखिर मिलेगी शहीदी हमें ही
और विजय उसको।

या

कोई बीच का हमारे ही
चलेगा (पट्ठा) मेढ़ा भी
हम करेंगी अंधानुकरण
रहेंगी पिछलग्गू उसकी।
वो चरेगा घास हरी-भरी
हम खा लेंगी
जूठन उसकी।
फिर भी रहेंगी खुश
कि है तो हमारे ही बीच(?) का।

और इस तरह
हम न छोड़ेंगी
भेड़ प्रवृत्ति
क्योंकि
हम भेड़ें थे
भेड़ें हैं
और
बने रहेंगे
भेड़ें ही।

अभिनव सरोवा

राष्ट्रीय राजमार्ग की भेड़ें

राष्ट्रीय राजमार्ग की भेड़ें-----

जनाब! ये राष्ट्रीय राजमार्ग की भेड़ें हैं,
आपके भोंपू से न हटेंगी।

ये ऊन से ढंककर रखती हैं
चाम अपनी
ये आपके भोंपू से नहीं
अपने मालिक की छड़ी से चलती है।

और इधर वाली भेड़ों ने भी
डाल रखा है लबादा
फगत पीठ पर ही नहीं
विवेक पर भी।

एक के पीछे एक ये
गिरती चली जाती हैं गड्ढे में
असल भेड़ें चलती हैं
रस्सी में उठती लहर की भाँति।

पर ये वाली भेड़ें
दौड़ती हैं आगे वाली भेड़
को पार करने
ताकि पहले गिर सकें।

ये राष्ट्रीय राजमार्ग की भेड़ें हैं
आपके भोंपू से न हटेंगी

न हटता देख आप पटकेंगे
स्टेयरिंग व्हील पर हथेली का गुद्दा
विंडो खोल कुछ गरिया भी देंगे

फिर कुछ बुदबुदाकर
निकलेंगे किनारे से
आँख निकालते उस लट्ठधर से
आँख चुराकर।

पर

यहाँ स्थिति उलट है
भेड़ों के स्वामी द्वारा
आपकी बुदबुदाहट को
द्रोह माना जायेगा( श्रेणी खुद तय कर लें)

और तब

तब आप किनारे से न निकल पाएँगे।

ये नेशनल हाईवे की भेड़ें हैं

अभिनव सरोवा (हिंदी अध्यापक)

हम भेड़ें

हम भेड़ें--

हम भेड़ें हैं
न छोड़ेंगी
भेड़-प्रवृत्ति
अछूता है
विवेक हमारा।
हम करती
अंधानुकरण
बहक जातीं
बिन बात भी।

रखती अपना सिर
दूसरी की दुम तले
न सोचती
न गुनती
बस चलती जातीं
एक क पीछे
बनाकर झुण्ड।

हम भेड़ें हैं
हमें बस ड्राइवर चाहिए
रूप कोई भी चलेगा-
गड़रिया हो या
कुत्ता या हो
हमारे ही बीच का
कोई (पट्ठा) मेढ़ा।

गड़रिया
जो हाँक सके
मर्जी से अपनी
भले झोंक दी
तपते मरुस्थल में
या
चढ़ा दे उत्तुंग गिरि पर
बस गड़रिया चाहिए
भले ही
ओढ़ी गई ऊन
चूसी गई हड्डी
या पीया गया खून
हमारा ही क्यों न हो
बस एक गड़रिया चाहिए
जो कर सके
सुरक्षा(?) हमारी।

कुत्ता भी चलेगा
जो रखे अनुशासित(?)
पूरे झुण्ड को
दिखाकर दाँत
गुर्राकर या
भौंककर।
भले ही
स्याह रात में सोए
काली चद्दर तानकर
या
पाकर आहट खतरे की
भौंके झुण्ड के बीच से।
आखिर मिलेगी शहीदी हमें ही
और विजय उसको।

या

कोई बीच का हमारे ही
चलेगा (पट्ठा) मेढ़ा भी
हम करेंगी अंधानुकरण
रहेंगी पिछलग्गू उसकी।
वो चरेगा घास हरी-भरी
हम खा लेंगी
जूठन उसकी।
फिर भी रहेंगी खुश
कि है तो हमारे ही बीच(?) का।

और इस तरह
हम न छोड़ेंगी
भेड़ प्रवृत्ति
क्योंकि
हम भेड़ें थीं
भेड़ें हैं
और
बनी रहेंगी भेड़ें ही।

अभिनव सरोवा
13 अप्रैल 2019

Friday, 20 March 2020

वर्ण

#वर्ण

किशोरों की कक्षा में
पढ़ाते हुए वर्ण-विचार
देखा बगल की सीट पर
एक किशोर/किशोरी के
चेहरे पर
आ जा रहे थे
अगणित वर्ण
पढ़ाना मेरा
हुआ वहीं निष्फल।

अभिनव
20 मार्च 2020

Wednesday, 18 March 2020

शिक्षा, शिक्षा और शिक्षा

शिक्षा, शिक्षा और शिक्षा

     सबसे पहली बात शिक्षा एक अमूर्त अवधारणा है। इसका कोई भौतिक स्वरूप नहीं है। यह कंप्यूटर या मोबाइल के सॉफ्टवेयर की तरह एक प्रोग्राम माना जा सकता है। इसे छुआ नहीं जा सकता बस महसूस किया जा सकता है। जो कि इसे रखने वाला भी कर सकता है और देखने वाला भी। शिक्षा व्यक्ति के मन, बुद्धि और आत्मा के विकास का दूसरा नाम है। इसे बालक व्यक्तित्व विकास का अनिवार्य अंग माना जा सकता है। ये बालक की अंतर्निहित शक्तियों के प्रकटीकरण का आधार है। विभिन्न शिक्षाविदों और मनोवैज्ञानिकों ने शिक्षा की अपनी अलग-अलग परिभाषाओं में इन्हीं बिंदुओं को रेखांकित किया है।
       चलिए लगे हाथ एक औपचारिकता और कर लेते हैं। वह है शिक्षा की उत्पत्ति। तो जनाब, शिक्षा की उत्पत्ति न किसी धातु से हुई है, न ठोस से, न गैस से और न ही द्रव से। यह पल-प्रतिपल उत्पन्न होती है और हर बीते पल से वर्तमान पल और अधिक शिक्षित होता है। शिक्षा वास्तव में सीखने और सीखकर व्यवहार में परिवर्तन का नाम है। पढ़-लिख कर व्यवहार में परिवर्तन नहीं आया तो इसे हम सिर्फ डिग्री हासिल करना कहें तो ज्यादा सही है। शिक्षा और व्यवहार में परिवर्तन का सकारात्मक संबंध है। शिक्षित व्यक्ति का विनयी, विनम्र होना अत्यंत आवश्यक है। शायद इसी कारण 'विद्या ददाति विनयम' की अवधारणा का जन्म हुआ था। हाँ, हमें अपने आत्मसम्मान को भी विस्मृत नहीं करना है। हम अपने आत्मसम्मान की रक्षा न कर सकें तो हमारा शिक्षित होना भी न होने जैसा ही है। यह विषयी की मानसिक परिपक्वता का सूचक भी है। शिक्षित व्यक्ति के विचारों में एक स्थायित्व होता है। उसे हर चीज एवं बात को तर्क की कसौटी पर कसना जरूरी होता है तथा उसीके अनुरूप अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करवाना भी।
       शिक्षा हमें किसी वस्तु, परिस्थिति या समस्या को समझने एवं उससे निपटने में मदद करती है। किसी भी परिस्थिति में समायोजन हौसला देती है। पढ़-लिखकर हम किसी विषय पर तर्क न कर पाएँ तो हमारी शिक्षा पर प्रश्नचिह्न लगता है। तब हम पढ़े-लिखे की बजाय लिखे-पढ़े की श्रेणी में शामिल हो जाते हैं। ऐसे में हम अनायास ही शिक्षितों के समूह से हटकर साक्षरों के समूह में शामिल हो जाते हैं। शिक्षा से हम मानवीय मूल्यों को प्राप्त करते हैं एवं अपने जीवन में उतारते हैं। हमारा मन इससे पोषित होता है, मानसिक शांति एवं संतुष्टि प्राप्त करने का माध्यम भी यही है।
      यह सामाजिक व्यवहार को दिशा प्रदान करती है तथा हमारे लिए आवश्यक जिम्मेदारी भी तय करती है। एक शिक्षित एवं सामाजिक जिम्मेदार व्यक्ति से समाज लाभांवित होना चाहता है। तब वह अपनी शिक्षा, प्राप्त मूल्य एवं अनुभवों से समाज को नई दिशा प्रदान करता है एवं बुलंदी के शिखर की तरफ लेकर जाता है।
       वर्तमान में हमारी शिक्षा प्रणाली मूल्यों पर कम और नौकरी पर ज्यादा बल देती दिख रही है। हमारी शिक्षा प्रणाली, इसे दूसरे शब्दों में परिणाम प्रणाली भी कह सकते हैं बालक में मानवीय गुणों पर अच्छे अंकों या ग्रेड को तरजीह देती है। इससे बच्चों की सहजता, स्वच्छन्दता, नादानियाँ, किलकारियाँ, निश्छल हँसी और जिज्ञासाएँ इतिहास की बातें बनती जा रही है। इससे बच्चों में उम्र के मुताबिक समझ नहीं आ पाती। इसका एक अन्य कारण अनुशासन के नाम पर बच्चों को शिक्षा सहगामी क्रियाओं से वंचित रखना भी है। इससे वह दब्बू किस्म का बन जाता है जबकि उसे मुखर होना चाहिए था। इसी कड़ी में आज का बालक भविष्य का नागरिक बनकर अपने साथ होने वाले जोर-जुल्म, ज्यादतियों एवं अन्याय को अपनी नियति मानकर सहन करता चला जाता है। एक शिक्षित व्यक्ति से हम उम्मीद करते हैं कि वह किसी अव्यवस्था, विद्रूपता, अंधविश्वास या किसी कुरीति का विरोध करें या अपनी तरफ से तर्क सहित आपत्ति दर्ज करवाए। लेकिन देखने में आता है कि ऐसी परिस्थिति में गाँधी के तीनों बंदर हममें अपना घर कर लेते हैं और हम उन्हीं के अनुरूप व्यवहार करते हैं। न हमें कुछ गलत लगता है, न हम सुनते हैं और न ही उनके खिलाफ बोलते ही हैं।
         मेरा निजी विचार है कि हमारे विद्यालयों में शिक्षक एवं विद्यार्थियों की मध्य संवाद की बहुत कमी है। उनमें औपचारिक एवं अनौपचारिक संवाद होना अत्यंत आवश्यक है।  देखने में आता है कि न केवल विद्यालय बल्कि महाविद्यालयों में भी परस्पर सवांद की बहुत कमी है। छात्रों और शिक्षकों में देश-दुनिया के समसामयिक विषयों पर संवाद रूपी स्वतंत्र बहस का आयोजन होना चाहिए। यह आयोजन शिक्षकों एवं वरिष्ठ छात्रों की देखरेख में होना चाहिए। इसमें खुला सत्र भी रखा जाना चाहिए। जिससे हर विद्यार्थी को अभिव्यक्ति का अवसर मिल सके। अंतर्मुखी बच्चों को मुखर बनाने हेतु विषय किया एक या दो दिन पूर्व दिया जाना चाहिए। ऐसे छात्रों के लिए दो या दो से अधिक शिक्षकों या छात्रों का एक परामर्श समूह भी होना आवश्यक है। जो समय समय पर ऐसे बच्चों की मॉनिटरिंग करे और उन्हें अभिव्यक्ति के अवसर और उसके तरीके से अवगत करवाता रहे। इसे प्रशिक्षण क्लास के रूप में लिया जाना चाहिए। विद्यालय में इसके लिए अतिथि शिक्षक की क्लास करवाई जा सकती है जो एक महीने में कम से कम दो होनी चाहिए। जिसमें देश-दुनिया के समसामयिक मुद्दों, राजनीतिक परिदृश्य, वैज्ञानिक खोज, भाषा, पर्यावरण, भ्रष्टाचार और सामाजिक कुरीतियों पर चर्चा करवाई जा सकती है। सभी बच्चों को बोलने का समान अवसर दिया जाना आवश्यक है। ऐसे संवाद आजकल विश्वविद्यालयों में ही जिंदा हैं। हमें इस कार्यक्रम को वृहद् आकार देना है और इसे हर विद्यालय तक पहुँचाना है। यदि ऐसा होता है तो शिक्षक का उत्तरदायित्व बढ़ जाएगा। उसे संवाद को सुचारू और संजीदा बनाये रखने के लिए खुद की जानकारी बढ़ानी पड़ेगी जो उसके कक्षा-कक्ष शिक्षण में भी झलकेगी। इस प्रकार एक ही साथ एकाधिक शिक्षण उद्देश्य पूरे होते नजर आएंगे।

हकीकत में एक शिक्षक के नैतिक, सामाजिक, व्यावसायिक उत्तरदायित्व बहुत ज्यादा हैं। उस पर शिक्षण के साथ-साथ अन्य राजकीय कार्यों का भी दवाब रहता है। जैसा कि ऊपर कहा गया है शिक्षा स्वतःस्फूर्त और अर्जित होती है। लेकिन उसे समुचित मार्गदर्शन और देखरेख के द्वारा एक दिशा दी जा सकती है। ये काम एक शिक्षक कर सकता है। इस मार्गदर्शन और देखरेख में कुशलता लाने हेतु उसे चाहिए कि वह बालक की पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों से परिचित हो। यदि वो ऐसा करते हैं तो उनकी कार्यकुशलता तो बढ़ेगी ही साथ ही आने वाले परिणाम भी उत्साहवर्द्धक होंगे।
      इन सबके साथ-साथ स्कूल में भी कुछ कार्य हैं जो किए जाने चाहिए। अकसर बच्चों को इनसे महरूम ही रखा जाता है। ज्यादा भी नहीं तो कम से कम दो काम तो अवश्य किए जाने चाहिए। पहला- पुस्तकालय का प्रयोग कागजों से बाहर निकलकर धरातल भी किया जाना समय, बच्चे, हमारे व्यवसाय की माँग है। देश दुनिया के साहित्य से रूबरू होना बच्चे का अधिकार भी है तो हमारा उससे परिचित करवाना हमारा कर्तव्य भी। बालक को अपने देश के साथ-साथ विदेशों के इतिहास, भूगोल, वैज्ञानिक खोज, राजनीति, न्याय पद्धति, सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक स्थिति, वेशभूषा, खानपान, उत्सव-पर्व, आज़ादी के संघर्ष, महापुरुषों, महान नारियों इत्यादि से परिचित होना चाहिए। ये कार्य कक्षा-कक्ष शिक्षण से इतर पुस्तकालय की मदद से किया जा सकता है। लिहाजा हमें ये करना चाहिए। जिस विद्यालय के बच्चे खाली कालांश में पुस्तकालय या वाचनालय में पाए जाते हैं, उसके बच्चे अन्य विद्यालयों के बच्चों से मुखर और प्रतिभावान, जानकारियों से भरे हुए और आत्मविश्वास से लबरेज मिलेंगे।
दूसरा- शिक्षा के उद्देश्यों की बात करें तो उनमें एक शब्द आता है- बालक का सर्वांगीण विकास। इसमें बालक के शारीरिक विकास को भी शामिल किया जाता है। शारीरिक विकास और मजबूती बहुत कुछ शारीरिक श्रम और अभ्यास पर निर्भर करते हैं। इस कड़ी में विद्यालय की समय-सारणी में तय किए गए खेलकूद के कालांश को धरातल पर अमलीजामा पहनाने की आवश्यकता है। इस कड़ी में विद्यालय में उपलब्ध खेल सामग्री और सुविधाओं को मद्देनजर रखते हुए खेलों का चयन किया जा सकता है। यदि खेल सामग्री का टोटा है या खेल मैदान की कमी है तो आउटडोर की बजाय इंडोर खेलों को चुना जाना चाहिए। मसलन- कबड्डी, खो-खो, दौड़, लंबी कूद, ऊँची कूद इत्यादि। खेल सामग्री और मैदान की उपलब्धता की स्थिति में क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी जैसे खेल भी खिलवाए जा सकते हैं। मानसिक अभिव्यक्ति को बढ़ाने में भी खेल बहुत आवश्यक और मददगार साबित हो सकते हैं। इनमें स्थानीय और प्रतिष्ठित खेलों को शामिल किया जाना चाहिए। स्थानीय खेलों में चरभर और प्रतिष्ठित खेलों में शतरंज, ब्लॉक भरना, पहेली, अंत्याक्षरी इत्यादि को शामिल किया जाना चाहिए। ये काम स्कूल प्रशासक होने की दृष्टि से प्रधानाध्यापक और प्रधानाचार्य पर निर्भर करता है।
     हमारा काम बच्चों के विकास के साथ-साथ उन्हें सही मार्गदर्शन भी करना होता है। इस कड़ी में बच्चों की रुचियों की पहचान करके उन्हें भविष्य में उसी दिशा में बढ़ने की सलाह और सहयोग देने की जरूरत है। कई दफा देखा जाता है कि अभिभावकगण बच्चों पर अपनी रुचि थोपते हैं। ऐसे में एक शिक्षक को उनसे मिलकर बात भी करनी चाहिए। बेशक उसे स्कूल समय के अलावा भी समय देना पड़े तो दें। क्योंकि हम केवल स्कूल समय मे ही नहीं बल्कि इसके अलावा भी एक शिक्षक ही होते हैं।
       एक शिक्षक के लिए खुद के बच्चों की सफलता से भी खुशी और गर्व का पल वो होता है जब उसके द्वारा पढ़ाए गए बच्चे विभिन्न स्थानों पर अपनी काबिलियत के जलवे बिखेरते हैं। सरकारी नौकरी ही सब कुछ नहीं है इससे अलग भी वे अपनी योग्यता का लोहा मनवा सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो ये पल एक शिक्षक के लिए बहुत ही गर्व भरे और सुकून देने वाले होते हैं। मेरे निजी रूप से मानना है कि यदि हमारा कक्षा-कक्ष शिक्षण के अलावा बच्चों से संपर्क हो और उन्हें गाइड करते हैं तो स्कूल से निकलकर वे बच्चे अपनी सफलता की इबारत गढ़ेंगे और संभव है कि अर्जित उपलब्धि की सूचनार्थ पहला फोन आपको ही आए। यकीन मानिए उस समय आँखें नम होंगी पर उन आँसुओं की नमकीनपने में कभी न खत्म होने वाली मिठास होगी।
माना कि कुछ मामलों में हमारे हाथ बँधे होते हैं। हम वही कर सकते हैं जो सरकार या विभाग ने हमारे पाठ्यक्रम में तय कर दिया है। लेकिन यकीन मानिए हम इसी शिक्षा प्रणाली में रहते हुए भी बेहतर कर सकते हैं। जरूरत है लीक से हटकर सोचने और उसे क्रियान्वित करने की। लीक से हटाकर सोचना हर अध्यापक के लिए अलग-अलग हो सकता है। उसे अपनी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की लैंगिक, सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियों का अध्ययन करने के उपरांत उसी हिसाब से सोचना और क्रियान्वित करना होगा। स्कूली पाठ्यक्रम के अलावा भी वही जानकारी बाहर भी बिखरी पड़ी है जो हमें बच्चों को देनी होती है। इसलिए हमें अपनी जानकारी को बच्चों संग शेयर करना होगा। अपने सीखने-सिखाने के तरीके बदलने होंगे। बच्चों को ऐसे ढंग से पढ़ाना होगा जो रुचिपूर्ण लगे, शिक्षण से जोड़े। ये सब हम अपनी काबिलियत, अनुभव और योग्यता से कर सकते हैं। जिसके लिए न अतिरिक्त संसाधन की जरूरत है न प्रणाली बदलने की। बस जरूरत है इच्छाशक्ति की और वो मेरे साथियों में भरपूर है।

अभिनव सरोवा, शिक्षक
9314911782