मेरी दुनिया बड़ी छोटी-सी
कर्म भी मेरे छोटे
कुनबा ज्यों बढ़ता गया
कर्मस्थल भी छोटे होते गए।
कर्म ही नहीं मेरा सब कुछ छोटा
वस्त्र मेरे छोटे,
घर मेरा छोटा
दिमाग भी मेरा छोटा
ज्ञान तो निहायत ही संकुचित
अनुभव तो जैसे मुझे है ही नहीं।
फिर भी मेरे कर्म जब फलीभूत होते हैं
और इन्हें लग जाते हैं समय के पंख
तो चढ़ किसी बिचौलिये की
या
बैंक वाले बाबू की ईमानदारी की
या
नीति निर्माताओं की अनुभवहीनता की
या
इनके घड़ियाली आँसुओं की,
(जो पिघला देती हैं मेरा हृदय)
या किसी पूर्वनियोजित योजना के तहत
देकर अपनी पार्टी जीत का आश्वासन
मुझे न सिर्फ ठग लिया जाता है
बल्कि जो सिर्फ और सिर्फ मेरी होनी थी
कुछ 'आमदनी'
को ऊपर वर्णित में
सबसे छोटा बना दिया जाता है।
इस कुकृत्य से ही हमारा
अलहदा संसार आज तक
बसा हुआ है।
ये सोचते होंगे कि
इनकी औलाद भी इसी तरह
रह जाये छोटी
पर
ऐ रहनुमाओ! सुन लो, कान खोलकर।
मेरा बेटा अब मेरी तरह न छोटा रहेगा
और
न तुम जैसों के झाँसे में।
(दबी आवाज में ही सही पर उसके मुँह से बगावती स्वर तो फूटा, हमें इसी की तलाश थी)
अभिनव सरोवा (हिंदी अध्यापक)
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