वो जिस जगह बैठकर
टूटे जूतों की मरम्मत किया करता है
इत्तेफाक से वहीं पर
एक अमीर घर
के
गुसलखाने का शैम्पू मिश्रित पानी
सड़क पर बेलगाम बहा करता है।
इस वजह से सड़क की
सिलाई भी कुछ उधड़ गई है।
और जब शुरू हुई उधड़ना तो
उधड़ती ही चली जा रही है।
कल तक जो खड्डा नाक की
इतिश्री करने का पूरा आकार रखता था
वही आज विस्तार पा रहा है।
धुआँ उगलते वाहनों ने
उसे बहुत जल्द जवां कर दिया।
धीरे-धीरे इनका कुनबा बढ़ता चला जाता है
फिर जैसे किसी सामंत को 'जै राम जी की'
किये बिना आगे बढ़ना
मुनासिब नहीं वैसे ही
अब साधनों का भी झुककर
सलाम ठोके बिना आगे बढ़ना किसी
वारदात से कम नहीं।
और तब युवा और बुजुर्ग साधन
रखकर अपना और गली का ध्यान
धीरे से गुजर जाते हैं
वो पास ही, घर से लाई फ़टी कंबल की
छाया में देखता है कि
किस तरह
एक टूटी सड़क माकूल गति
नहीं दे पाती है।
खुद ही खुद से सवाल दाग देता है-
फिर समाज में फैली ऊँच-नीच
कैसे इसे गति दे सकती है?
अभिनव सरोवा (हिंदी अध्यापक)
No comments:
Post a Comment