Thursday, 25 July 2019

मंदबुद्धि बनाम बंदबुद्धि

मंदबुद्धि बनाम बंदबुद्धि-

मंदबुद्धि होना उतना खतरनाक नहीं
जितना बंदबुद्धि होना।

एक प्रकृत्ति प्रदत्त
दूजी स्व-अर्जित।

एक निरीह
दूजी शातिर।

एक दया की पात्र
दूजी घृणा की।

एक को देखे प्यार उमड़े
दूजी से जुगुप्सा।

क्योंकि मंदबुद्धि होना खतरनाक नहीं
बंदबुद्धि होने से।

एक अतिरिक्त प्यार/स्नेह की आकाँक्षी
दूजी मानवता भक्षिणी।

एक रिश्तों की रक्षिणी
दूजी इनकी कलंकिणी।

एक बेवजह फिरती है
दूजी रिमोट से चलती है।

एक अनायास है देखती
दूजी वसनों को बेधती।

एक मृदुल
दूजी कर्कश।

कभी-कभी दोनों पत्थर भी फेंकती हैं
पर
पर...

एक तब जब माहौल प्रतिकूल लगे
दूजी तब जब माहौल अनुकूल लगे।

संख्या में एक वाली कम है
दूजी वाली भरकम है।

खतरा मंद से नहीं
बंद से माकूल है।

देश को बंद की नहीं
मंद की दरकार है।

#अभिनव_सरोवा

18.08.2018

Sunday, 21 July 2019

मित्रता दिवस

उसके जन्म से पूर्व ही दादाजी का खेत में बस जाना, बीमारी के कारण पापाजी का चिड़चिड़ा स्वभाव, बड़ा होने के नाते घर की कुछ जिम्मेदारियां और बुआजी का घनघोर अनुशासन ( कक्षा 3 और 4 उनके पास रहकर ही पढ़ी थीं) यही वो तथाकथित कारण हैं जिनकी वजह से वह सहज ही किसी से आत्मीय रूप से जुड़ नहीं पाया। इन्हीं कारणों से भयंकर चिड़चिड़ा हो गया और रिश्ते निभाने की जिस कला में माहिर होना चाहिए था बनिस्पत उसके अपरिपक्व ही रह गया। अड़ाई का तूम्बा बन गया। चरित्र निर्माण (जैसा भी है) की दृष्टि से ये वो काल था जब आदमी अंतर्मुखी या बहिर्मुखी बन सकता था। 1981 से लेकर 1984 तक का समय मम्मी के अंक में व्यतीत हो गया पर जनवरी 1984 में अनुज के जन्म के साथ ही मम्मी के अंक का स्थान दादा की गोद ने ले लिया अकस्मात ही ले लिया और उनके निधन तक बना रहा। वैसे निधन शब्द किसी राष्ट्रीय चरित्र के लिए प्रयुक्त होता है पर उसके लिए उसके दादा से बड़ा कोई राष्ट्रीय चरित्र नहीं है। वो जहाँ भी जाते वहाँ उसे भी साथ लेकर जाते। यहाँ तक कि एक माँ का फर्ज निभाते रहे। शायद यही वजह है कि खुद को हमउम्र के साथ उतना सहज महसूस नहीं कर पाया जितना बुजुर्गों के साथ करता है।

   उसे ठीक से याद नहीं पर 88 के आसपास दादाजी का देहान्त और वह निहायत अकेला। इसी दौरान उसकी बुआजी अपने साथ चूरू ले गई। अकादमिक शिक्षा की बात करें तो पहली बार दाखिला चूरू में ही लिया था। बुआजी का अनुशासन खतरनाक किस्म का था। हेलमेल कम होता गया। वहाँ से आने के बाद खेतों से होकर स्कूल और स्कूल से उसी रास्ते घर। न किसी के दर्शन होते और न किसी को दर्शन देते। घर आए, कलेवा किया और बकरियाँ चराने जोहड़ी में। साथ में होती कॉपी-किताब। कई बार किसी के खेत में घुस जाने के कारण मार भी खानी पड़ी। ये वो घटनाएँ हैं जिन्होंने उसे एकाकी बना दिया और हालात  आज भी वैसे ही हैं। आज आनन-पुस्तिका(फेसबुक) पर उसके मित्रों की संख्या 2000 से ज्यादा है पर कहते हैं न कि वो मेरा लंगोटिया यार है, वो शब्द उसके लिए बना ही नहीं। भाषा के निर्माता और पोषक इस मामले में उसके साथ अन्याय कर बैठे। लंगोटिया यार के नाम पर वह पिछले 36 सालों पर नजर मारता है तो एक भी नहीं मिलता।  आज उसके आभासी मित्रों की संख्या संतोषजनक है। लड़कपन में जब दोस्तों के साथ घूमने का वक्त था उस समय वह या तो स्कूल जाता या छुट्टियों में किसी चेजे पर। आनन-पुस्तिका के कई ऐसे मित्र हैं जिनसे जुड़ने के बाद लग रहा है जैसे लड़कपन की वह कमी भी पूरी हो गई है।

चूँकि आज मित्रता-दिवस बताया जा रहा है तो ऐसे मौके पर उसे मित्र मानने वालों/ न मानने वालों का हार्दिक शुक्रिया और बधाइयाँ...💐