Thursday, 22 November 2018

शहीद के पिता-भाग चार

शहीद के पिता- भाग चार

वो कहर ढाते शब्द
अभी भी कलेजे को तार-तार किए जा रहे
आज से आप एक शहीद के पिता कहलाओगे।

आज खुद से कितना खफा है
फोन की घंटी भी
बंद करना न सीख पाया।
कहीं रो न पड़े ये भी।

मोबाइल जो कल तक
एकदम हल्का था
आज नमक की बोरी
बन गया।
उसे डर था कि
कहीं बोरी फट न पड़े और
मल न जाए
भीतर रिसते घाव।

मन बार-बार करता
बता दूँ 'उसकी' माँ को
कि नजर लग गई
तेरे दूध को।

करने को काबू
कड़े जतन करता
पर
छलनी में भी भला
पानी ठहरा है कभी?

वो बार-बार घुस जाता गुसलखाने
करने छलनी खाली।

वो बोली-
के बात है?
के टेंशन है?
तबियत तो ठीक है?

आज जी कुछ ठीक नहीं
तू पास बैठ, बात कर
शायद कुछ देर के लिए ही सही
पर भूल सकूँ वो साझा गम
जिसे अपनाए हुए हूँ
अब तक अकेला।

बस सोचकर ही रह गया
कह न सका
पहली दो पंक्तियों से ज्यादा।
बाकि बातें मन में रही
और मिल गई उसी कथन में....
आज से आप एक शहीद के पिता कहलाओगे।

आप आराम करो
मैं गोबर पाथकर आती हूँ।
उसे लगा जैसे कुछ
छुपाया जा रहा है
पर हिम्मत न कर सकी
उसका मुँह देखकर
ज्यादा जानने की।

वह कनखियों से देख रहा
गाँव के लोग अभी भी
झुण्ड बनाए हैं।
घर से उनका फासला
कम हुआ जा रहा।

तभी 11 वाली बस ने
अपने आने की खबर दी।
उसने देखा
कुछ जीवन्त उदासियाँ
हो रही हैं
घर के बाहर से भीतर।

बीच में 'उसका' छोटा भाई
और दोस्त उसके
सब बतिया रहे
फिर भी मौन थे।
चेहरे से
भाव से
जज्बात से
चाल से और
बॉडी लैंग्वेज से भी।

जैसे घुटने टूट गए इनके
बस घसीट रहे थे
उस डोर के सहारे
जो निकल गई
हाथ से
काट दी किसी ने
या
छीन ली किसी ने।

बेटा, जो आज तक मिलता आया था
पहले माँ से
आज बाहर ही
पिता के पास बैठ गया
और नजरों से दागा एक सवाल-
माँ को......?

और सामने से गर्दन हिली
एक अड़वे पर रखी
फूटी हाँड़ी की तरह।

उसका मन हुआ कि कह दे-
आज से तू एक शहीद का भाई कहलाएगा।

अभिनव सरोवा
17 नवम्बर 2018

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