Tuesday, 30 October 2018

शहीद के पिता (भाग दो)

शहीद के पिता (भाग दो)-

लड़खड़ाती और
भर्राई जिह्वा से
पुकार कर
खेजड़ी, बेरी और मतीरे को
वो जार-जार तड़पा
बिलकुल भी रोया नहीं।

कलेजा जो
रात तक धड़कता था
सीने में, अब गले में आ फँसा।

हाथ जेब तक जाता
फोन भी बाहर आता
बेटी के नम्बर
जो दर्ज थे 'उसके' बाद
दूसरे नम्बर पर।
सेव भी तो उसी ने किये थे

अँगूठा भी तो डायल
बटन तक जाता पर
क्या कहूँ?
कैसे कहूँ?
राजी-ख़ुशी के
समाचार भी किस
मुँह से पूछूँ?

कैसे कह पाउँगा
कि जो दूल्हन
तूने अपने राजा के लिए
देखी है,
उसकी कलाई
आज चूड़ी
पहनने से पहले ही
वीरान हो गई।

सहसा याद आया कि
मुझे न केवल खुद को
सम्भलना है
बल्कि पत्नी,
बेटी, बेटे और पूरे घर को
भी तो वो हिम्मत देनी है
जो खुद उसके पास
नहीं है।

कहाँ से लाऊँ?
हिम्मत भी कभी मिली है
बाजार में?

वो शब्द अभी भी
हथौड़े की तरह पड़ रहे थे
मन-मस्तिष्क पर।
अनुगूँज रह-रहकर
सुनाती थी
वही बात
बारम्बार
कि
आज से आप एक शहीद के पिता कहलाओगे।

अभिनव सरोवा
30 अक्टूबर 2018

Monday, 29 October 2018

शहीद के पिता

शहीद के पिता- (भाग पहला)

यही कोई ढलती रात का
समय रहा होगा
उसके सिरहाने रखा फोन
चीख पड़ा
हेल्लो......।
हेल्लो, मैं अमुक यूनिट से बोल रहा हूँ।
देश की हिफाजत में
कुरबान होना
हर किसी के भाग्य में नहीं होता
ये लोग मरते नहीं
शहीद होते हैं।
वतन की आबरू
के असली रखवाले यही हैं।
मुझे बड़े दुःख और गर्व के साथ कहना पड़ रहा है कि
आपका बेटा बहुत वीर था।
आखिरी साँस तक लड़ा।
आज से आप
एक शहीद के पिता कहलाओगे।
हेल्लो.....
आप मेरी आवाज सुन रहे हैं?
इधर से महज एक गहरी साँस
सुनाई दी।

धरा स्तब्ध
हवा मौन
आसमाँ भी रो पड़ा।
बादल से कुछ बिंदु झड़े और
सींच गए घुटनों को।

जिस हाथ में फोन था
जैसे किसी ने काट दिया
या
उखाड़ लिया कंधे से।

गमछा पड़ा था सिरहाने
पर जब हाथ ही नहीं
तो कैसे पोंछे आसमाँ
के दोनों बादलों को?

अनायास ही आँगन से
घड़े और लोटे की आपसी
बातें सुनकर हाथ उग आए
और नदी की बहती धार को
एक ही रगड़ में सूखा डाला।
बादलों के नीचे तान दी
काली चद्दर
कि कोई बूँद जमीं पर
न गिर सके

प्राची से रक्तिम लाली फूटी
जैसे अभी-अभी खून से नहाई है।

चाय का कप लेकर
जोड़ायत 'मुँह धो ल्यो'
के शाश्वत वचन सहित
हाजिर हुई और कप बढ़ा दिया।

उसे लगा कप में चाय नहीं
मेरा अपना खून है
जो निकाला है किसी ने
मेरा अपना कलेजा फाड़कर।
न उगलते बन रहा
न निगलते।
सोचा- जहर ले आती।

काँपते हाथ मुँह के पास किए रहा
और नीचे रखने के बहाने
सींच दिया खाट का पाया।

इस दरम्यान वार्ता जारी रही
पर इकतरफा
एक वाचाल
एक मौन।

'मैं खेत जाऊँ'
हेल्लो के बाद के
आज के दूसरे बोल थे।

रास्ता पैरों के भारीपन के बोझ से
तड़प रहा था
पर मौन था, मूक था।
परिंदों की जुबाँ को जैसे
लकवा मार गया।
मोर अपनी शाख से
नदारद था।

ढाणी वाले काका का कुत्ता
भी तो आज लाचार है।
दोनों पैरों पर मुँह टिकाए
कान लटकाए
आँख झुकाए
बैठा है।
गर्दन उठाने की हिम्मत नहीं
सिर्फ पुतलियों को घुमाकर देख लिया।

काका बोले- चाय पिस्यां।
वापिस आते पीऊँगा।

अभी तो हर खेजड़ी से बात करनी है
जिसे छाँगा था उसने कभी
और हर उस झाड़ी (बेरी) से
जो लदी पड़ी है बैरों से
उसे भी तो समाचार देना है।
जमीं में दबे उस मतीरे को भी तो
खबर करनी है।

हर खेजड़ी से बाँथ भर-भरकर रोया
चारों सीमा घूमा
झोपड़ी में भी गया
पर बोला कुछ नहीं
पता नहीं जानबूझकर या
बोला गया नहीं।

फिर खेत के बीच में खड़ा होकर
लड़खड़ाती जीभ से
भर्राई आवाज में
इतना ही कह पाया-
झाड़ी के बैरों तुम झड़ जाओ
जमीं के मतीरों तुम सड़ना चाहो तो
सड़ जाओ।
तुम्हें खाने वाला अब कभी नहीं आएगा।

खेजडियो! तुम्हें गंडासी से छाँगने वाला
आज खुद किसी की गंडासी से
छाँग दिया गया।

अभिनव सरोवा
28 अक्टूबर 2018

Friday, 26 October 2018

राड़ और मुक्ति

राड़ और मुक्ति-

तेरी राड़ तुझसे है
खुद से बड़ा बैरी
इस ज़माने में नहीं।

जमाना तो है
तुझे ये एहसास दिलाने
कि कम न होने देंगे
तेरी पीड़ा, दुःख, संताप।

समझ सकते हैं-

खुद से लड़ना
आसां नहीं।
सब कुछ टूट जाता है
थोड़ा-सा पाने में।

आँख आँख न रहीं
अकाल की कंदराएँ हो गई
जहाँ न घास है
न पानी
और न जीवन की आस।

चेहरे की झुर्रियाँ भी तो
बालू के निर्जन धोरों की
लहरें बनी हैं।

पीठ झुककर
बदन को
कमान बनाए दे रही है।

गर लड़ना है खुद से तो
करना होगा कुछ हटकर
अपनी संतान को
सिर्फ संस्कार
दरांत, फावड़ा
जेई और गंडासी
ही मत दे।

उन्हें नए जमाने से
लड़ना है तो
कुछ और भी देना होगा।

इसलिए
अपना जखीरा बढ़ा
खरीद या चुरा
पर
चुराना तेरे लिए मुमकिन कहाँ

खैर
तू नए हथियार ले
और दे अपनी संतान को
कुछ नाम सुझा रहा हूँ
बाकि खुद सोच लेना-
पहला कलम
दूसरा वैज्ञानिक चिंतन
और तीसरा तर्क।

निश्चिन्त न हो
इसकी बाड़बंदी भी करनी है
बचाना है इसे
ज़माने से और
मिटाना है इससे ज़माने की
विसंगतियों को।

तो देख
इस बारूद को बचा
नशे की चिंगारी से
और अन्धविश्वास की
'शॉर्ट सर्किट' से। 

फिर तू खुद से भले ही
जीते न जीते
पर न लड़ने का मलाल तो
न रहेगा।

अभिनव सरोवा
26 अक्टूबर 2018

Wednesday, 24 October 2018

श्रम देवी

श्रम देवी-

हर सुबह
निपटाकर
घरेलू काम
वो चल देती है
दुनिया के सबसे विराट
(किंतु बर्बर भी)
ब्यूटी पार्लर में।
जहाँ सूरज उसके
माथे पर सजने को
बैठा है तैयार।

वो फगत माथे ही नहीं
बल्कि पूरे चेहरे की
पारदर्शी बिंदुओं को
बना देता है रंगीन, चमकीला।
लाली और काजल विहीन
उसके मुखावरण पर
देख अगणित श्रमकण,
तारे भी तो
धुन रहे हैं
सिर अपना।

तारागण की नाराजगी भी तो
जायज है,
सही है दलील उनकी भी
कि सूरज अकेला
थोड़े ही है?
हम भी चेहरे के नूर को
बनाते हैं प्रकाशमान।

इधर हवा भी तो आतुर है
उसे कंघी भी करनी है और
सँवारने हैं रुखसार भी।
पर.....
कुछ सोचकर
शायद यही कि
रूठ न जाए, सूख न जाए
माथे की तरल बिंदिया
देती विराम गति को अपनी।

उधर रूप का धनी
चाँद भी तो
अपने ज्ञान से दे रहा है
ब्यूटी टिप्स
वो शायद क्षितिज पर
आइना थामे या
उसकी ओट लिए
बैठा है उसके पीछे।

इन सबसे बेखबर
ये श्रमदेवी
कर रही अपना सिंगार
वो मन की लाली को
छिटका रही 
न केवल चेहरे
अपितु प्रकृत्ति पर
और साथ ही हर उस आँख में
जो देख रही रूप उसका।

तारों और सूरज की बिंदिया से
उसे क्या वास्ता!
वो अपने निर्मल हृदय-सागर से
खींच रही श्रम-कण
और छिड़क रही
भाल-जगत्-क्यारी में।

लोग भले ही दें
ताव अपनी मूँछों पर
तुम देखो
मेरी मूँछों का बाँकपन।

ऐ सूरज!
ऐ चाँद!
ऐ हवा!
ओ तारो!
मेरी आवाज सुन सको तो
सुनो कान खोलकर
ये सिंगार मेरे अपने नहीं
भावी पीढ़ी की
खुशहाली के लिए हैं।

मेरी पीढ़ी मुझ पर नाज़ करेगी
मैं पूरी कायनात को
सर्वसुलभ पार्लर न बना दूँ तो कहना।

(प्रयास अभी भी अपूर्ण है)

अभिनव सरोवा
24 अक्टूबर 2018

Friday, 19 October 2018

चोर निजरां

चोर निजरां-

मैं रोजिनां पोसाळा जाणै सारू
करूँ बस री जातरा
जिण अड्डे माथै हूँ चढूँ बस मांय
बो जिले रो आखरी अड्डो है।

अठै तांई आतां-आतां बस काठी भरीजै
करणी पड़ै खड़ी जातरा, घणकरी बरियाँ।

इण बिचाळै देखूँ कै बस री
सगळी सिट्यां माथै बैठ्या हैं लोग-लुगाई।

आँ मांय आदमी कम अर
म्हे 'मास्टर' घणा हां।
(होय सकै है कै सगड़द्या नै दोहरी लागै पण इलाज?)

म्हे सगळा जणा, आप-आपरै फोन रो
पोस्टमार्टम करण सारू, घणी खाताही करां।

जिको मिनख पैल्यां
गाँव-गुवाड़ी तांई पूग जाया करतो,
मोटो मिनख होंवतो।

पण अबार तो ट्रम्प बी आपणी
गोझी मांय है।

आखि दुनिया री खोज-खबर सारू
आपां भाज्यां फिरां।

नित नुवाँ आदेश अर डेडलाइन पढ़'र
आखै दिन कांई-कांई करणो है,
की योजनावां बणाय लेवां
मांय नीं मांय।

कीं लोग good morning रा
संदेशड़ा भेजता दिसज्यावै
इयाँ लागै जियाँ म्हां लोगाँ रा
सन्देश बाँच'र दिन उगसी।

कीं बापड़ा लोगां री good morning
रो पडुत्तर बस मांय आर देवें।

ओ काम मन स्यूं करै तो आच्छी बात
पण.......

इण रै लारै एक बीजी जुगत है-

बस मांय खड़ी डोकरी बीरबानी, बडेरो मिनख
टाबर की माँ, का पेट हाळी स्यूं बचण'री।

आ बचनै री खातर जतन करण हाळा मांय
लोग-लुगायां बी है अर म्हे मास्टर बी।

Friday, 12 October 2018

लेवल मशीन

आज झांझरकै म्हारी गळी मांय
मोटर-गाड्यां रा पूँपाट सुण'र
आँख्या खुलगी
दरूजो खोल'र देख्यो
दो-एक ट्रैक्टर अर
सीमट-बजरी मिलावण री मशीन
अर कीं मिनख दिख्या।

पोसाळा जाणै री उतावळ मांय
बात आई-गई हुगी
घरै स्यूं पोसाळा भीर होती बरियाँ
म्हाने गळी रै नुक्कड़ पर कीं
बिरबान्यां अर मोट्यार मिल्या।

बात ओज्यूं बी आई-गई हुगी
पण आथण च्यार बज्या
घरै पुग्यो तो देखूँ कै
म्हारले दरूजे साम्हीं
सीसी रोड़ बणनै लागरी है।

बां मिनखां स्यूं एक मजूर
जिको एक मशीन साम्ह राख्यी ही
बो रोड़ नै लेवल करै हो
डील गंजी मांय घाल राख्यो हो।

बींके डील पर पसीनै का धारा
इयाँ चालै हां
जियाँ पाणी की बोतल
फ्रीज स्यूं काढ़'र
पून मांय धर दीन्हीं हुवै।

म्हे सोच्यो कै
एक मशीन ऐड़ी बी
हुणी चाहिजै
जिकी मिनखां नै बी
'लेवल' कर दे!

फेर याद आई कै
इयाँ बी कदै हुया
करै है काँई...?

अभिनव सरोवा
12 अक्टूबर 2018

डकार

डकार

फगत एक डकार सागै सौं कीं


मळयामेट करणै री


धमकी देण हाळां स्यूं


एक माड़ो-सो सुवाल है-

कै थारी ईं कळ्या नै


मजूर-किसानां री जूझ


कै


गाँव-गुवाड़ री


अगुणी अर दिखणादी कलोन्यां 


खातर मन मै समाइजेड़ी घिरणा


कै 


बजारां मायनै ई-मित्रां'रा


धक्का खातै


आँगळ्यां लट्कायां 


निकम्मे हाथां रो निकम्मोपण 


मेटण सारू 

कदै काम मै ल्यो हो.....?

अभिनव सरोवा

12 अक्टूबर 2018

Wednesday, 10 October 2018

वो बीस बरस

तारीखों को दरकिनार कर चालू वर्ष से 2018 से बीते 20 वर्षों की बात करें तो काफी बदलाव आए हैं। ये बदलाव सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, शैक्षिक, पारिवारिक, व्यापारिक, व्यावसायिक, तकनीकी सहित हर क्षेत्र में हुए हैं। अपने निजी जीवन की बात करूँ तो ठीक 20 वर्ष पहले का अर्थात 1998 याद आता है। मुझे भली प्रकार याद है कि मई 1998 में जिस दिन मैं 11 वीं कक्षा पास करके 12 वीं में दाखिल हुआ था, उसी दिन भारत परमाणु शक्ति से संपन्न देशों की फेहरिस्त में शामिल हुआ था। वो 11 मई का दिन था जिस दिन मेरा परीक्षा परिणाम आया था। इस दिन पड़ोसी गाँव शोभा का बास में रणवीर मास्टर जी के घर चेजे पर काम कर रहा था। दोपहर की छुट्टी में अनुमति लेकर अलसीसर स्थित JK स्कूल गया और अंकतालिका लेकर सीधे चेजे पर पहुँचा था। दूसरे दिन जैसलमेर के पोकरण में किए गए परमाणु परीक्षण का समाचार मोटे-मोटे अक्षरों में छपे थे। यूँ तो सफ़ेद पृष्ठभूमि में काले अक्षर थे पर पता नहीं क्यों हर भारतीय को वो अक्षर पीले रंग के नजर आ रहे थे। पता नहीं इसके मूल में देश के प्रति प्यार था या सुबह के सूरज की करामात? मैं पहले विकल्प के साथ हूँ।  डॉ. कलाम इसी दिन से देश-दुनिया की नज़रों में आ गए थे। ये अलग बात है कि देश और दुनिया का उनके प्रति नजरिया अलग-अलग हो। आप उस दिन से करोड़ों युवाओं के रोल मॉडल बनकर उभरे और ताउम्र रहे भी। एक पत्रिका (शायद क्रिकेट सम्राट रही होगी) में उनकी फोटो छपी थी जिसे हमारे एक कमरे वाले बँगले की आतंरिक दीवार पर गेंहूँ के आटे से चिपकाई थी।

शिक्षा का स्तर भी काफी सुधरा है। निजी स्कूल तूम्बे की बेल की तरह उग आई थी। इन बीते 20 वर्षों में बच्चों के प्राप्तांकों के प्रतिशत में दुगुना उछाल आया है। काश! इसी गति से सेंसेक्स भी उछाल मारता( वैसे मुझे इसकी समझ नहीं है)। महंगाई इस मामले में कदम-ताल मिलाकर आगे बढ़ रही है।

1998 में उन्हीं रणवीर मास्टरजी के कुएँ पर रबी की फसल हिस्सेदारी में बोई थी। स्कूल से सीधे खेत ही पहुँचना पड़ता था। उस ज़माने में बिजली रात-दिन के साप्ताहिक क्रम में आती थी। ठिठुरन भरी रात में सिंचाई करके सुबह स्कूल जाना होता था। ये आजकल की तरह मेमोरी कार्ड और पैन ड्राइव का नहीं बल्कि वीसीआर और वीसीपी तथा ब्लैक & व्हाइट टीवी का जमाना था। वीसीआर से पहली बार फिल्म देखी। मिथुन चक्रवर्ती और धर्मेन्द्र अभिनीत गुलामी देखी। फिल्म का गीत- जिहाले-मस्ती मकुम-ब-रंजिश, बहाले-हिजरा बेचारा दिल है, आज भी जुबान पर है। ये अलग बात है कि तब इसके बोल वो नहीं थे जो आज लिखे हैं। अभिनेत्री का नाम न तब पता था न अब है, को बस की छत पर यात्रा करते देखना घनघोर आश्चर्य का कारण बन गया। स्कूल में जाकर बात भी की। आज 20 वर्षों बाद प्रतापगढ़ में युवतियों और महिलाओं को बस की छत पर यात्रा करते देखा तो गुलामी फिर से याद हो आई। ये न केवल याद आ गई बल्कि ऊपर वर्णित बदलाव भी संदेह के घेरे में खुद जाकर खड़े हो गए। अदालत हमारी होती तो इन बदलावों के कान पकड़कर पूछता कि प्रतापगढ़ से तुम्हारी क्या दुश्मनी है। ख़ैर......?

सामाजिक रूप से भी काफी बदलाव (बदलाव क्या उठापटक) देखने को मिले। मेरे गाँव में छुआछूत जैसी बीमारी मेरी आँखों के सामने मौत के मुँह में समा गई। शादी-ब्याह के मामले एक तरफ शादी की उम्र बढ़ी है तो दूसरी तरफ ये घरवालों की बजाय युवाओं की सहमति के बाद ही तय होने लगे हैं। कहीं ये रिश्ता प्रगाढ़ हुआ है तो कुछ ऐसे भी उदाहरण देखने में आये हैं जिनकी वजह से पुराने पारिवारिक रिश्ते तक खटाई में पड़ गए। कुछ मिसाल दहेज मुक्त विवाह की मिलती हैं तो कुछ युवाओं की उच्च पदों पर जाने के बाद बोलियाँ भी लगी हैं। इसी क्रम में युवतियों ने भी पद पाने के बाद पूर्व में तय रिश्तों को तोड़ा है। रातोंरात उनका "स्तर" हाई लेवल का हो जाता है। बिजली की लाइन जरूर हाई टेंशन सुनी थी पर स्तर.....?

मृत्युभोज जैसी कुरीति जहाँ कब्र में पाँव लटकाए बैठी हैं वहीं दशोठण (छुछुक) जैसी नई कुरीति रूपी नागिन धनिकों के पैर तले पूँछ दबाए पड़ी है, जो हर अमीर-गरीब को डस रही है। लिंग के आधार पर संतान में भेदभाव कम हुआ है जिससे लू में शीतलता का अनुभव होता है।

कड़वाहट के मामले में सास-बहू का जो रिश्ता भयंकर बदनाम था, आज 'नाक' के चक्कर में "झेलने" वाली स्थिति में पहुँच गया है।

आर्थिक रूप से लोगों की आमदनी बढ़ी है तो खर्चे भी उससे होड़ लगाए बैठे हैं। एक तरफ रोजगार बढे हैं पर जनसंख्या के मुकाबले ये कम ही हैं। तकनीकी, संचार और यातायात सेवाओं के विस्तार और आधुनिकीकरण से व्यापार की दशा और दिशा ही बदल गई है। नई आने वाली हर वस्तु ग्राहक को मानसिक रूप से बंदी बनाने के बाद ही बाजार में आती है। ये टीवी पर पहले पहुँचती हैं। टीवी के भी अपने नफे-नुकसान हैं। एक तरफ देश-दुनिया की जानकारी, शिक्षा से संबद्ध कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं तो दूसरी तरफ सास- बहू, ननद-भौजाई को 'झेलने' वाली प्रवृत्ति का विकास एकता कपूर वाले धारावाहिकों से हुआ है। आज तो एकता (निर्माता) भी बाढ़ के कुसंस्कृत पानी की भाँति रिश्तों की मौत का तरल दूत बनकर बह रहे/रही हैं।
आज हम अपने डाक्यूमेंट्स को ऑनलाइन वॉलेट में सेव रखते हैं पर वो दिन भी याद है जब हम रोजगार पंजीयन कार्यालय में सालाना कार्ड बनवाते थे। आज की पीढ़ी इस सरकारी सेवा से महरूम है (बेचारे, हम या ये; समझ नहीं आ रहा)।

ये वो संक्रमण काल था जब लोग गाँवों को छोड़कर शहरों की तरह भागे थे। जैसे गाँव में आग लग गई है और ये पाटे उतर गया है। कुछ तो इतनी खुन्नस खाकर आये थे कि कभी गाँव में झाँककर भी नहीं देखेंगे, पर भला हो इस महंगाई और शहरी बड़प्पन का, जो टूटे शीशे में भी मुँह दिखा दिया। हर आदमी अपने से आगे वाले को रौंदकर आगे निकल जाना चाहता था, चाहे भी क्यों नहीं, पीछे वाला इसे कुचल देता तो....!

खानपान, वेशभूषा में भारी फेरबदल हुए हैं। कुछ दिल को सुकून देने वाले हैं तो कुछ झुंझलाहट बढ़ाने वाले( कुछ की तो बीपी भी बढ़ जाती होगी)।
मसलन 30 इंच की कमर वाला लौंडा 32 या 34 इंच कमर वाली पेंट सिलवाता है और खुद को उसके अंदर भी डालता है। उसके बाद की भयावह स्थिति न लिखने लायक है न कहने, सुनने लायक।

एक तरफ पुरुषों के बदले महिलाओं की घटती संख्या भी हमारी वैज्ञानिकता पर सवाल खड़े करती है तो दूसरी तरफ पुरुष वर्चस्व वाले क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी अभिमान करने के लिए पर्याप्त कारण है।

युवाओं में शराब के साथ-साथ अन्य नशीले पदार्थों के सेवन के मामले भी बढे हैं। इनमें पीड़ादायक ये है कि लड़कियाँ भी पीछे नहीं रहीं। सभी नहीं हैं पर कुछ हैं। कुछ जीव बालों की कटिंग ऐसे करवाते हैं जैसे एक साइड में कोई ट्रैक्टर वाला कराऊ (गोवड़ी) लगा गया हो।

2002 या 03 में पहली बार मोबाइल देखा और घर जाकर बुआजी को बताया तो उन्होंने यकीं नहीं किया। कुछ दिनों बाद पता चला कि ऐसी एक मशीन आई तो है जिससे बात की जा सकती है पर बात करने के ही नहीं सुनने के भी पैसे लगते थे और आज.....?
आज व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धा के कारण एक तरफ सेवा प्रदात्ता पर सेवा की गुणवत्ता बनाये रखने का दवाब है वहीं दूसरी तरफ ग्राहक के पास दूसरा विकल्प। कोई भी व्यापारी अपनी ग्राहक को अपने दामन से छिटकने नहीं देना चाहता वहीं ग्राहक के लिए दूसरा कार्ड लिए खड़ा है।

रसोई के बर्तन बदल गए। मिट्टी और सिल्वर के बर्तनों की जगह स्टील ने ले ली है। यहाँ तक कि चिमटा भी स्टील का आ गया है। शुक्र है ये अब आया है 1936 से पहले आया होता तो प्रेमचंद का हमीद इसे खरीद भी नहीं पाता और दादी के हाथ जलते ही रह जाते।

ओढ़ने-बिछाने का बिस्तर बदल गए। गुदड़े और उपराँत(हंसराज) का स्थान गद्दे, रजाई या कोरियाई कम्बल ने ले ली है। यहाँ तक कि इन बिस्तरों पर सोने-उठने का और बर्तनों में खाने और इन्हें माँजने का समय भी बदल गया है।

नहीं बदला है तो जिहाले-मस्ती मकुम-ब-रंजिश... गाना, बस की छत, गुलामी फिल्म, प्रतापगढ़ की महिलाएँ और यहाँ के हालात.....!

खैर, समय सदा एक-सा नहीं रहता, हमारा प्रतापगढ़ भी बदलेगा।

अभिनव सरोवा

09 अक्टूबर 2018

Monday, 8 October 2018

स्वघोषित खुदा

खुद को खुदा घोषित कर
काले काँच की ओट,
सफ़ेद परदे और हरे मेट पर पैर
और
तशरीफ़ तले दुग्ध-धवल तौलिया
डालकर ध्यानमग्न बैठने वाले
अब बाहर निकलेंगे।

एक टाँग पर साँस रोककर
बैठे की बगुले जो
अब दुहाई देंगे
मछलियों को उनकी रक्षा की।

कल तक उखड़ जाया करते थे हत्थे से
पड़ते ही मनुज पर नजर,
आज पैर पकड़ना और
हाथ जोड़ना भी
न होगा दुष्कर और
और न अक्षम्य?

कुछ साल पहले लगाई थीं
जिन घोड़ों की खुलेआम बोलियाँ
आज वही घोड़े पकड़ने की
कसमें खाई जाएँगी।

इशारा करेंगे, दिखाएंगे
इंद्रधनुषी सपने पर
तुम्हें न नजर आएँगे।
वो फिर अपनी तर्जनी से दिखाएंगे
करके इशारा,
फिर भी नजर नहीं आएँगे
और हम हाँ में हाँ मिलाएंगे।

मतलब साफ है-
दिन वही आएँगे
गर हाँ में हाँ मिलाएंगे।