नामवर सिंह की पुस्तक #दूसरी_परंपरा_की_खोज के दूसरे लेख '#ब्राह्मण_समाज_में_ज्यों_अछूत' से कुछ पंक्तियाँ। इस लेख में बताया गया है कि हजारी बाबा को काशी से बहुत प्यार था। वे वहीं रहना चाहते थे लेकिन उनके विचारों को काशी का दकियानूसी ब्राह्मण समाज पचा पाने में अक्षम था। इस कारण उनका भयंकर विरोध हुआ। इसी के चलते वे रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा बुलाये जाने पर शांतिनिकेतन चले गए। उसी दौरान काशी विश्वविद्यालय से हिंदी विभागाध्यक्ष पद के लिए बुलावा आया लेकिन नहीं गए। क्योंकि बुलावे के साथ-साथ कुछ और पत्र भी गए जिनमें स्पष्ट तौर पर धमकियाँ और गालियाँ लिखी हुई थीं। इस संदर्भ में वे डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन' को एक पत्र लिखते हैं जिसमें अपने दुःख का जिक्र किया है। वे धमकी और गाली देने वालों की घृणास्पद बातों का जिक्र करते हैं। लिखते हैं कि मन बहुत दुःखी होता है लेकिन अंततः आपकी बात याद आती है और इन सबसे छुटकारा पा लेता हूँ। बात कुछ इस प्रकार थी-
हम विषपायी जनम के, सहे अबोल कुबोल।
मानत नेकु न अनख हम, जानत अपुनो मोल।।
फिर दो साल बाद काशी से पुनः बुलावा आता है और 1950 में वे चले जाते हैं। फिर भी आरोप लगते रहे। खासकर उनकी विद्वता और राजनीतिक आश्रय को लेकर। इस क्रम में फिर काशी छोड़नी पड़ी। 7 साल के लिए चंडीगढ़ प्रवास पर रहे। फिर काशी और फिर लखनऊ गए। ये सिलसिला चलता रहा। इसी चलायमान जीवन में, दुःख की घड़ी में वे खुद को तुलसी के समान मानते हैं। उन्हें भी काशी कभी स्वीकार नहीं कर पाई थी। विशेषकर काशी के पाखंडी पंडे। अब कुछ पंक्तियाँ-
1. बड़े तेज को बर्दाश्त नहीं कर सकने से लोग गाली-गलौज पर उतर आते हैं।
2. भला जिस जगह (पद) को पाकर आदमी मनुष्यता के स्तर पर ही न रह सके उस जगह को लेकर क्या करना।
3. दरिद्रता का अभिशाप यह है कि पैसे की चिंता करनी पड़ती है पर दरिद्रता का एक वरदान यह भी है, पैसा हमें ज्यादा प्रलुब्ध नहीं कर सकता है।
4. गरीब का सबसे भयंकर शत्रु उसका पेट होता है। गरीब का दूसरा दुश्मन उसका सिर होता है जो झुकना नहीं चाहता। जो झुकना चाहता है वह भी शत्रु ही है।
5. भारतीय काव्यालोचन शास्त्र का इतना गंभीर और स्वतंत्र विचारक हिंदी में तो दूसरा हुआ ही नहीं, अन्यान्य भारतीय भाषाओं में भी हुआ है या नहीं, ठीक नहीं कह सकते। शायद नहीं हुआ। (हजारी बाबा पर शुक्ल के विरोधी होने के आरोप अकसर लगते रहे हैं। इसी के प्रतिक्रियास्वरूप 'हिंदी साहित्य की भूमिका' में आए इस प्रसंग को शुक्ल के प्रति हजारी बाबा की श्रद्धास्वरूप प्रस्तुत किया है।)
6. काशी का यह शुक्ल-पक्ष वस्तुतः आचार्य शुक्ल का कृष्ण पक्ष था : घोर दकियानूसी हथियारों को छिपाने के लिए आचार्य शुक्ल के उज्ज्वल नाम की नकाब!
7. जब मैकदा छुटा तो फिर अब क्या जगह की कैद।
मसजिद हो मदरसा हो कोई और खानकाह हो।।
8. कुटज क्या केवल जी रहा है? वह दूसरे के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता, अपनी उन्नति के लिए अफसरों का जूता नहीं चाटता, आत्मोन्नति के हेतु नीलम नहीं धारण करता, अँगूठियों की लड़ी नहीं पहनता, दाँत नहीं निपोरता, बगलें नहीं झाँकता। (यहाँ कुटज के रूप में हजारी बाबा को अभिहित किया जा सकता है)
9. मनुष्य की पहचान संघर्ष भूमि में होती है, पूजा की वेदी पर नहीं।
10. मैं अच्छा आस्तिक कभी नहीं रहा हूँ। परंतु बुरा नास्तिक भी नहीं रह हूँ। बुरा आस्तिक दंभी होता है और बुरा नास्तिक अहंकारी। मैं तो सुमनजी, (शिवमंगल सिंह सुमन) एक अद्भुत मिश्रण हूँ। मुझमें थोड़ा दम्भ है, पर अहंकार कम है। कभी-कभी सोचता हूँ कि अहंकारी होता तो अच्छा था। अहंकारी अच्छा, दंभी नहीं।
11. अगर पीड़ा है तो आशा है। जीवन में न जाने कितने रूपों में पीड़ा में छिपी हुई आशा को देखा है।
12. परिस्थितियाँ मनुष्य को कष्ट पहुँचा सकती हैं, धक्का दे सकती हैं, पर रगड़कर नष्ट नहीं कर सकतीं। मनुष्य पतिस्थितियों से बड़ा है, बशर्ते वह 'मनुष्य' हो, किसी तरह जीवित रहकर मरने की तैयारी करते रहने वाला भुनगा नहीं- मनुष्य।
अभिनव
27 अप्रैल 2020