शीर्षक विहीन
ये समय नहीं
दुःखी होने,
आँसू बहाने,
विचलित होकर
पथ-भ्रष्ट होने का।
ये है
दुनिया से तुम्हारा
पहला परिचय।
जाहिर है
आगे भी ये मिलते रहेंगे।
माँज लो खुद को
संचित करो आँसू-आग
बनो विराट
ताकि वो पहुँच न सके
तुम तक
या बन जाओ सूक्ष्म
ताकि आओ न
नजर उन्हें।
लिख दो आसमाँ पर
नाम अपना।
फेंके हुए पत्थरों से
बना डालो बंकर
ताकि झाँक न सकें
भाषायी आतंकी।
दुःखी होने से
रोने से
जलेगी काया
रोयेगा मन
जबकि हम चाहते हैं
चहकता चेहरा
तो सीखना होगा
इन्हें अनदेखा करना।
बन जाओ बादल
छितराओ नभ में
पाकर माकूल माहौल
सींच दो प्रेम-रस से।
तुम्हारे दुःख,
बुझे चेहरे से
मिलेगी ख़ुशी
कुछ को ही
और दुःखी होंगे
अनगनित,
तो क्यों न
हम खुश रहकर
भर दें
अपनों की झोली।
खींच दें
लंबी रेखा
मुख-मंडल पर
मुस्कान की।
तो आओ! मिलकर मुस्कराएं
अभिनव सरोवा
23 जनवरी 2019