Monday, 29 April 2019

मरज्याणा

मरज्याणा...

दायाँ स्तन मुँह
हाथ ब्लाउज के ऊपरी बटन पर
अब दाँतरी भी निकल आई
मसूड़ों में हो रही गुदगुदी
दबा देता जोर से।
माँ झटके से डाँटती और
थप्पड़ दिखाती
इतने में
गिलाफ से बह गया दूध
हो गई पकड़ ढीली
नजरें टकराई माँ से
आँखों में शरारत संग चुहल।
माँ भी मुस्करा दी
मरज्याणा.....❤️❤️

आँसू-आग

शीर्षक विहीन

ये समय नहीं
दुःखी होने,
आँसू बहाने,
विचलित होकर
पथ-भ्रष्ट होने का।

ये है
दुनिया से तुम्हारा
पहला परिचय।
जाहिर है
आगे भी ये मिलते रहेंगे।

माँज लो खुद को
संचित करो आँसू-आग
बनो विराट
ताकि वो पहुँच न सके
तुम तक
या बन जाओ सूक्ष्म
ताकि आओ न
नजर उन्हें।

लिख दो आसमाँ पर
नाम अपना।

फेंके हुए पत्थरों से
बना डालो बंकर
ताकि झाँक न सकें
भाषायी आतंकी।

दुःखी होने से
रोने से
जलेगी काया
रोयेगा मन
जबकि हम चाहते हैं
चहकता चेहरा
तो सीखना होगा
इन्हें अनदेखा करना।

बन जाओ बादल
छितराओ नभ में
पाकर माकूल माहौल
सींच दो प्रेम-रस से।

तुम्हारे दुःख,
बुझे चेहरे से
मिलेगी ख़ुशी
कुछ को ही
और दुःखी होंगे
अनगनित,
तो क्यों न
हम खुश रहकर
भर दें
अपनों की झोली।

खींच दें
लंबी रेखा
मुख-मंडल पर
मुस्कान की।

तो आओ! मिलकर मुस्कराएं

अभिनव सरोवा
23 जनवरी 2019

किसान का बेटा

किसान का बेटा...

मेरी दुनिया बड़ी छोटी-सी
कर्म भी मेरे छोटे
कुनबा ज्यों बढ़ता गया
कर्मस्थल भी छोटे होते गए।

कर्म ही नहीं मेरा सब कुछ छोटा
वस्त्र मेरे छोटे,
घर मेरा छोटा
दिमाग भी मेरा छोटा
ज्ञान तो निहायत ही संकुचित
अनुभव तो जैसे मुझे है ही नहीं।

फिर भी मेरे कर्म जब फलीभूत होते हैं
और इन्हें लग जाते हैं समय के पंख
तो चढ़ किसी बिचौलिये की
या
बैंक वाले बाबू की ईमानदारी की
या
नीति निर्माताओं की अनुभवहीनता की
या
इनके घड़ियाली आँसुओं की,
(जो पिघला देती हैं मेरा हृदय)
या किसी पूर्वनियोजित योजना के तहत
देकर अपनी पार्टी जीत का आश्वासन
मुझे न सिर्फ ठग लिया जाता है
बल्कि जो सिर्फ और सिर्फ मेरी होनी थी

कुछ 'आमदनी'

को ऊपर वर्णित में
सबसे छोटा बना दिया जाता है।

इस कुकृत्य से ही हमारा
अलहदा संसार आज तक
बसा हुआ है।

ये सोचते होंगे कि
इनकी औलाद भी इसी तरह
रह जाये छोटी
पर
ऐ रहनुमाओ! सुन लो, कान खोलकर।
मेरा बेटा अब मेरी तरह न छोटा रहेगा
और
न तुम जैसों के झाँसे में।
(दबी आवाज में ही सही पर उसके मुँह से बगावती स्वर तो फूटा, हमें इसी की तलाश थी)

अभिनव सरोवा
(हिंदी अध्यापक)

गुनाहगार

#गुनाहगार

गुनाहगार हैं हम
अपने ही वजूद के
अस्तित्व के
हर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के।

कदम रोक देते हैं
जहाँ जरूरत होती है हमारी
पहुँच नहीं पाते हैं।

देखते हैं जुल्म कहीं भी
तब उठते नहीं हैं हाथ।

भ्रष्टाचारियों और
जवाबदारों से
करने होते हैं सवाल
तब लड़खड़ा जाती है जीभ
मार जाता है लकवा।

वक्त आता है
आँख में आँख डालने का
तब चुरा लेते हैं या
झुक जाती हैं।

तर्क के इस दौर में
हम करते हैं यकीं
अन्धविश्वास, पाखंड
और चमत्कार पर।

जरूरत हो नवाचार की
हम लिपटे रहते
उसी पुराने ढर्रे से
जिसने बनाया हमें
मानसिक पंगु।

हम गुनाहगार थे,
हैं और
ऐसा ही चलता रहा तो
आगे भी रहेंगे।

अभिनव सरोवा
24 जनवरी 2019

Sunday, 21 April 2019

घास- 2

#घास

स्थूल गिरि
उत्तुंग द्रुम
चढ़ भेंट
जलजले-भूकम्प की
जाते दरक
होते खंड-खंड
टूटते ग्रीवा से
मूल भी जाती उखड़
ऐसे में
निकलता जीवन
मिटा चिह्न विनाश के
झाँक रहा
चट्टानों की ओट औ
दरारों से।

11 अप्रैल 2019

Friday, 19 April 2019

क्या है कविता

कविता

कहने को आखिर
शब्दों का जाल है कविता
पर
शब्द जब
लुढ़ककर
व्यवस्था(?) के चरणों में
करने लगें दंडवत
पढ़ने लगें कसीदे
गढ़ने लगें इबारतें
तो हो जाते बाहर
कविता के मुकम्मल साँचें से।

तब शब्द कविता न गढ़ते
हम उसे कविता नहीं
चापलूसी हैं पढ़ते।
कविता का काम है आखिर
ओढ़कर कोमलता
धर निष्पक्षता
तान कर सीना
खड़ी हो जाए समक्ष
व्यवस्था के
और
करे आँख में उँगली
दिखाए हकीकत
बदल दे राह
जनमानस की।

तब बनती है
निखालिस कविता।

अभिनव सरोवा
19 अप्रैल 2019

कविता- माँ (पूजा)

माँ

ना रुलाना जिंदगी में कभी उसे
जिसने तुम्हें ये दुनिया दिखाने को
हजारों कष्ट सहे।

ना तोड़ना सपने कभी उसके
जिसने हरवक्त, हर सपना
सिर्फ तुम्हारे लिए देखा हो।

ठुकराकर उसकी ममता को
ना ढूंढना इश्क़ की गलियों में पराया प्यार।

जिसने खुद से बढ़कर तुम्हें प्यार दिया हो
ना छोड़ना कभी उसे
अपनी दो पल की खुशी की खातिर।
जिसने हर पल तुम्हारी खुशी की दुआ माँगी हो

ना तड़पाना उसे कभी भूखा रखकर।
जिसने कभी खुद भूख सहकर
तुम्हारे पेट की आग बुझाई हो।

ना छोड़ना उसके आँचल को कभी
जिसने तुम्हें हर नजर से बचाया हो।

ना भुलाना उसकी ममता को कभी
जिसने दुःख-सुख में सिर्फ तुम्हें पुकारा हो

ना छोड़ना उसे बेसहारा कभी
जिसने कभी उँगली पकड़कर तुम्हें सहारा दिया हो।

पूजा कुमारी मीना
रा. आ. उ. मा. वि. कचोटिया
तहसील- पीपलखूंट
जिला- प्रतापगढ़
राजस्थान (312605)

Thursday, 18 April 2019

मरना था मुझे

मरना था मुझे

मैं ठहरा आम आदमी
औरों की भाँति
मरना था मुझे भी
युद्धभूमि में।
आज ये भूमि
सीमा से खिसककर
उतर आई है
सड़क पर।

मरना था मुझे
जीवन युद्ध में
सड़क पर निर्भीक चलते हुए
रोजगार माँगते हुए
भाव फसल के पूछते हुए
भ्रष्टाचार से लड़ते हुए
जातिवाद
झूठ, पाखंड
आडंबर से लड़ते हुए
भूख और नशे से
करते दो-दो हाथ
मरना था मुझे।

हाथ में होनी थी
कलम, चॉक
माउस, फ़ाइल
पाने, हथौड़ी
थापी, कुदाल
छैनी या गैंती
पर थमा दिए
रंग-बिरंगे झंडे।

पेट जो है
झंडे से नहीं
रोटी से भरता है
जो छीन ली
सामने की थाली से...

अभिनव सरोवा
18 अप्रैल 2019

Tuesday, 16 April 2019

दुश्मन देश के

अशिक्षा
बेरोजगारी
भ्रष्टाचार
पाखंड
अंधविश्वास
तंत्र-मंत्र
नशा और
व्यभिचार
हैं असली दुश्मन
मुल्क के।
पर हुकूमत
रही बरगला
सियासी नारों से।

हैं ये दोस्त
सत्ताशीनों के
इससे चलती
उनकी दुकान
किसान-मजदूर
युवा और नारी
लुटते हैं रोज
बीच बाजार।
रखकर अंधेरे में
जनसमूह को
वो करते राज
फिर-फिर
बदल-बदल।
बताकर खतरा
झूठे दुश्मन का
फेंका जाता
असली दुश्मनों में
असली दुश्मनों द्वारा।
देश की दुश्मन
मजहबी दुर्भाव
बेरोजगारी
अशिक्षा
भ्रष्टाचार और
गंदी सियासत है।

अभिनव सरोवा
08 अप्रैल 2019

फिदा हैं वो

उन्हें प्यार है
उखड़े खरुंट से
लगाव है
सड़ती मवाद से
चाहत है
गिजगीजी दुनिया की
वो फिदा हैं
अपनों के
जैसे-तैसे
(कु)कृत्यों पर।

अभिनव सरोवा
16 अप्रैल 2019

बटोर पसीना

सोने से कम न था
जो खड़ा भी था
और पड़ा भी था
खेत में उसके।
सींचा था पूरे सीजन
लहू और पसीने से
वो होता रहा खुश
होंगे कुछ सपने पूरे
चुकेगा कर्ज
ब्याहेगा बेटा या बेटी।

या भेजेगा किसी शहर में
करवाएगा तैयारी
पता नहीं मिल जाए
सरकारी खजाने में सीर
बड़े सपने न देखे
न देखना आया।

आज देख उत्तर से
धूल का पहाड़
रह गया दंग
उड़ गया रंग
चेहरे से उसके
कैसे चुकेगा कर्ज?
कैसे होगा ब्याह?
कैसे भेजूँगा शहर?

सोना तो बिखर गया
मिल गया मिट्टी में
उड़ गए सपने
धूल संग।
वो हो गया तार-तार
दे घुटनों में सिर
रोया जार-जार।

रात कट गई खाट पर
बदलते हुए पहलू
तन घर में
मन खेत में
सोने की उजड़ी क्यारी में
रात भई बेहद काली
बालियाँ, जो बुलाती थीं
कल तक
दे-दे झाले
इठलाती थीं
नाजुक कटि से
टूट गई रीढ़ उनकी
जिस्म हुआ बेजान
फली हो गई खाली
होती थीं जैसे
जेब उसकी।

मान नियति वह
जुट गया वह
करने इकट्ठा
मिट्टी में मिला
पसीने के कतरा।

बावला था
पसीना बटोरा नहीं
बहाया जाता है!

अभिनव सरोवा
16 अप्रैल 2019

Saturday, 13 April 2019

हम भेड़ें

हम भेड़ें--

हम भेड़ें हैं
न छोड़ेंगी
भेड़-प्रवृत्ति
अछूता है
विवेक हमारा।
हम करती
अंधानुकरण
बहक जातीं
बिन बात भी।

रखती अपना सिर
दूसरी की दुम तले
न सोचती
न गुनती
बस चलती जातीं
एक के पीछे
बनाकर झुण्ड।

हम भेड़ें हैं
हमें बस ड्राइवर चाहिए
रूप कोई भी चलेगा-
गड़रिया हो या कुत्ता
या हो
हमारे ही बीच का
कोई (पट्ठा) मेढ़ा।

गड़रिया
जो हाँक सके
मर्जी से अपनी
भले झोंक दी
तपते मरुस्थल में
या
चढ़ा दे उत्तुंग गिरि पर
बस गड़रिया चाहिए
भले ही
ओढ़ी गई ऊन
चूसी गई हड्डी
या पीया गया खून
हमारा ही क्यों न हो
बस एक गड़रिया चाहिए
जो कर सके
सुरक्षा(?) हमारी।

कुत्ता भी चलेगा
जो रखे अनुशासित(?)
पूरे झुण्ड को
दिखाकर दाँत
गुर्राकर या
भौंककर।
भले ही
स्याह रात में सोए
काली चद्दर तानकर
या
पाकर आहट खतरे की
भौंके झुण्ड के बीच से।
आखिर मिलेगी शहीदी हमें ही
और विजय उसको।

या

कोई बीच का हमारे ही
चलेगा (पट्ठा) मेढ़ा भी
हम करेंगी अंधानुकरण
रहेंगी पिछलग्गू उसकी।
वो चरेगा घास हरी-भरी
हम खा लेंगी
जूठन उसकी।
फिर भी रहेंगी खुश
कि है तो हमारे ही बीच(?) का।

और इस तरह
हम न छोड़ेंगी
भेड़ प्रवृत्ति
क्योंकि
हम भेड़ें थीं
भेड़ें हैं
और
बनी रहेंगी भेड़ें ही।

अभिनव सरोवा
13 अप्रैल 2019