Monday, 28 January 2019

सिंहासन वालो! ख़ुशी को आने दो

सिंहासन वालो! ख़ुशी को आने दो

कोई है?
जो बता सके
रास्ते खुशियों के
गाँव को।

यहाँ रखे हैं
हर एक के पास दो हाथ
काम की तलाश में।

कई दिनों से भूल गए
यहाँ के लोग
ख़ुशी क्या होती है,
कैसी होती है?

आहट भी तो
नहीं होती
कई-कई दिनों तक।

फिर पता चलता है कि
अमुक विभाग में
........ खुशियाँ निकली हैं।

अपना नाम लिखी
और फोटो छपी
कुम-कुम पत्री से
ख़ुशी को देते हैं
घर आने का निमंत्रण।

तब ख़ुशी रखती है कुछ शर्तें,
उसे स्वयंवर भी कह सकते हैं।
सभी अमीर-गरीब मनाने को उसे
जोर-आजमाइश करते हैं।

फिर एक दिन खुशियाँ आती हैं
बहुधा शाम के वक्त
कम ही नहीं
बहुत कम।
गलती उसकी नहीं
सत्ता की है
वो कम को ही मुक्त करती है।

तब कुछ घर चूल्हे जलाना भूल जाते हैं,
बाकि में जलते नहीं।

पर सवेरे लगता है लाँछन
ख़ुशी खड़ी है न्याय के दरबार में
हाथ बाँधे,
किसके घर जाए?

ये तय होने में लग जाते
महीने-साल।

हमें खुशी चाहिए
साफ-सुथरी
थोक में।

है कोई फ़रिश्ता?
जो सुने हमारी
और
भर दे खुशियों से
घर आपका-हमारा-सबका।

अब सत्तासीनों से गुजारिश है
खुशियों का गला न घोटें
उन्हें लॉगिन करने दीजिए।

आप हमें खुशी दीजिए
ये आपका कर्त्तव्य भी है और
वादा भी।

ख़ुशी-विहीन कतराने लगे हैं
मेल-जोल से
मिला-भिंटो भूल गए।

अब ख़ुशी को भी
चहकने दो
घर की बाखळ में।

घर-घर में थामने
हाथ ख़ुशी का
बैठे हैं हाथ कई
एकदम जवान, पुष्ट
जोश, जज्बे से भरपूर।

बहुत दिन हुए
घी के दीये जलाए
अब तो ख़ुशी को बता दो
गाँव का रास्ता।

अभिनव सरोवा
26 दिसंबर 2018

मेरा परिवार

मेरा परिवार.....

आधिकारिक रूप से मेरा परिवार
दस लोगों का है
जो रहते हैं एक छत के तले।
पर लगता है जैसे राशन कार्ड
अभी अधूरा है।

बहुत गुंजाईश है अभी
इसमें होने चाहिए
किसान, मजदूर, सैनिक,
मास्टर और स्कूली बच्चे।

तब कहीं जाकर बनता
एक माकूल परिवार
और एक मुकम्मल
राशन कार्ड।

तब हमारा परिवार
बॉर्डर पर भी होता
खेत में भी और
देश के निर्माण में भी।

बच्चों की अठखेलियों से
महकता और गुलज़ार होता
घर का आँगन और
देश के स्कूल्स में
बहती ज्ञान-सरिता।

चूँकि अधूरा है मेरा राशन कार्ड
फिर भी पूरा है मेरा परिवार।

अभिनव सरोवा
30 दिसंबर 2018
9314911782
6350169404

सीने में भारत धड़कता है

सीने में भारत धड़कता है...

माँ की गोद के बाद
पहला रिश्ता मिट्टी से जुड़ा
आज भी है
अनवरत
सतत।

इस पर जन्मे हर
जीव, घास, पेड़ में
देखा है सहोदर।

इसकी हर चीज से है
बेइंतहा मुहब्बत।

मिट्टी का ढेला
मिट्टी में मिल जाना है
तो गुरुर किस बात का?

यहीं से लिया
यहीं धर देना है

बस इतनी तमन्ना है कि
जब फूटे ये ढेला
तब फैल जाए माँ (मिट्टी) पर
भारत के नक़्शे की भाँति।
आज तक
यही तो धड़का है सीने में।

अभिनव सरोवा
02 जनवरी 2019

Sunday, 27 January 2019

वो सुलगता है

वो सुलगता है दिनभर
तब जाकर जलता है
चूल्हा घर का।

वो बहाता है पसीना
तब लगता है
आटा उसके घर।

नमक का नमकीनपन
आया है उसके
कुर्त्ते पर जमी सफेदी से।

पानी ने सरलपन
चुराया है
इसके ही शील से।

सूरज भी तो उगता-छिपता है
उसके जगने-सोने के साथ।

तारे टिमटिमाते हैं
उसकी आँखों की तरह।

चाँद भी घटता-बढ़ता
उसके सुख-दुःख के साथ।

पत्ते झड़ते हैं
उसके गमों की तरह
आती हैं नई कोंपलें
उसकी मुस्कराहट के जैसे।

हवा भी लेती है गति
उसकी साँसों से।

आँधी चलती है जब
वो छोड़ता है
गहरी निःश्वास।

जब देखकर
लहलहाती फसल
वो होता है खुश
तब दौड़ती है एक लहर
खेत में,
उसके तन में, मन में
सारे जहाँ में।

अभिनव सरोवा
25 जनवरी 2019

Thursday, 24 January 2019

दहेज़ : एक सामाजिक ट्यूमर

#दहेज़ एक सामाजिक ट्यूमर...

जिस दम्पती ने पहले-पहल अपनी बेटी की शादी में कुछ बर्तन, कपड़े या सामान नई गृहस्थी बसाने हेतु सहायतार्थ दी थी, उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि वो एक दिन नायक से खलनायक बन जाएगा। उसे पता नहीं था कि उसके द्वारा दी जाने वाली ये मदद कालांतर में दहेज़ रूपी समस्या के रूप में दुनिया के सामने खड़ी हो जाएगी। वो कब एक भली सोच से विलग होकर दैत्य रूप धारण कर लेगी। कब ये कृत्य बेटियों और उसके परिजनों के लिए एक अभिशाप बन जाएगा। इसका उसे सपने में भी गुमान न रहा होगा। यदि आज वो जीवित होता तो खुद अपने हाथ से तेल छिड़ककर आग लगा लेता या किसी कोने में बैठकर अपने सिर के बाल नोच रहा होता।
    अच्छा दहेज़ न मिल पाने से पता नहीं कितने रिश्ते टूटते जा रहे हैं। माँ-बाप भी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण नाजों से पाली अपनी लाडली को किसी नशेड़ी या बेमेल वर को सौंपने पर विवश हो जाते हैं।
        शादी के बाद भी दहेज़ के नाम पर बहुओं को कितना कुछ सुनना पड़ता है ये सिर्फ वही जानती हैं। बात-बात में पीहर पक्ष की बुराई सुनना और अकेले में रोने के सिवाय कुछ कर पाना भी संभव नहीं हो पाता। ऐसे में कुछ लड़कियां तो आत्महत्या जैसा कदम भी उठा लेती हैं।
दहेज़ से परिवार की आर्थिक स्थिति तो बिगड़ती ही है, साथ ही उस लड़की के भाई-बहिन के जीवन पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

    सक्षम स्थिति वाले कुछ परिवार अच्छा दहेज़ देकर अपने ही उन भाइयों के लिए एक विकट स्थिति पैदा कर देते हैं जो उनकी बनिस्बत कमजोर स्थिति में होते हैं। फिर दूसरे या पहले भाई की बराबरी करने का दवाब उसके नाते-रिश्तेदारों द्वारा बनाया जाता है। ये बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण पहलू होता है।

    इसका एक पहलू और भी घातक है जिसके परिणाम बड़े ही भयंकर रूप में सामने आ रहे हैं। लड़की की सरकारी सेवा में लग जाने के बाद उसे या उसके परिजनों को उसकी रैंक या ग्रेड से कम रैंक वाला लड़का किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं होता। कई बार तो स्थिति यहाँ तक बन जाती है कि पूर्व में हो चुकी सगाई भी नौकरी लगने के बाद किसी न किसी आरोप के साथ छोड़ दी जाती है। अधिकाधिक धन का लोभ देकर रिश्ता किया जाता है। अपार धन, सामान, नकदी, गाड़ी, प्लाट इत्यादि दिए और लिए जाते हैं। लेने वाले माँ-बाप उसी धन के एहसान तले दबकर रह जाते हैं और दूल्हे की हालत तो लिखने लायक क्या होगी, बेचारा!

ऐसा ही हाल कुछ लड़के वालों का होता है। नौकरी लगने से पूर्व उनके माता-पिता गाँव में प्याज, आइसक्रीम बेचने वालों को भी घर बुला-बुलाकर चाय पिलाते हैं और मनुहार करते हैं। नौकरी लगा नहीं कि भाव रातोंरात बढ़ जाते हैं। इतना उतार-चढ़ाव तो मुंबई के स्टॉक-एक्सचेंज में भी नहीं आता। अब तो वही लड़के ये भी कहते हैं कि मास्टरनी से कम नहीं चलेगी। कुछ को तो मैं भी जानता हूँ। उनको जानना मेरे जीवन की विडम्बना ही है।
  उधर दहेज की लिस्ट तैयार करने में माँ-बाप के साथ-साथ दुल्हन का भी भरपूर योगदान रहता है। कमरे और घर की साइज का ऑनलाइन आकलन करने के बाद फ्रीज, टीवी, सोफा का माप तय किया जाता है। वो इस तरफ खड़े माँ-बाप और भाई तक के लिए प्रतिमाह किश्त भरने की व्यवस्था करने के बाद ही डोली में बैठती है।

इस माहौल में भी कुछ विवाह ऐसे भी देखने को मिल जाते हैं जो दहेज़ के साथ-साथ तड़क-भड़क से भी विहीन होते हैं। ऐसी खबरें जब अख़बार या सोशल मीडिया में प्रकाशित होती हैं तो मन प्रसन्न हो जाता है। आज सोशल मीडिया के माध्यम से एक मुहीम चलाकर युवाओं को जागरूक किया जा सकता है।
         हम कह सकते हैं कि आज भी दहेज़ जैसी कुप्रथा को अमीर लोग पाल रहे हैं और गरीब लोग इसमें पिसते जा रहे हैं। जरुरत है एक सुधार की, एक मिसाल पेश करने की।

एक किस्सा- एक व्यक्ति के पास एक ऊँटनी थी। वह लोगों से कहता था कि यदि मेरी ऊँटनी मन में कर लेती तो 100 क्विंटल वजन ले जाती, पर मरने को मर गई कभी मन में नहीं की।

बस यही हमारे साथ है। हम चाहें तो स्थापित चीजों को बदल सकते हैं बस मन में नहीं करते। तो अब मन में करना पक्का।

अभिनव सरोवा
20 जनवरी 2019

तरकस का तीर

तू बन जा तीर...

तू भिड़, मार टक्कर
काट दे जीभ बड़बोलों की
फोड़ दे आँख बुरी नजर वालों की
नोच ले चेहरे से मुखोटे
तोड़ दे रीढ़ महँगाई की
मरोड़ दे हाथ
शोषणकारी व्यवस्था और
उसके पोषकों के
रोक दे कदम लाशों से गुजरने वालों के।

डर मत कि तू अकेला है
तूने सुना है कभी
बीज अकेला होकर भी न उगा हो
अँधेरे ने कभी सवेरा न होने दिया हो
ख़ुशी या गम में न छलकी हो आँखें।

तीर तो चलता ही अकेला है
बना प्रत्यंचा साहस को
हिम्मत को कमान
फिर देख
कैसे बढ़ते हैं
तेरे तरकस के तीर।

तू बन
उस तरकस का तीर
जो साधे निशाना
समाज की विसंगतियों पर

जंग आखिर तुझे ही जीतनी है
ये दुनिया तुझे ही बदलनी है।

अभिनव सरोवा
24 जनवरी 2019

Tuesday, 22 January 2019

शिक्षक

(1)

पारस काल्पनिक
बनाता लोहे को सोना,
शिक्षक असली पारस
बना दे मिट्टी को सोना।

(2)

देखना है
शिक्षक के अंदर का शिक्षक
तो
मिलो उस कक्षा के बच्चों से
जिसका है वो कक्षाध्यापक।

अभिनव सरोवा
21 जनवरी 2019

शिक्षक मिट्टी है

शिक्षक वह मिट्टी है
जो करता है पहचान
बीज की,
देता है खाद
सहलाता हैं जड़ें
खींचकर खनिज
करता है पोषण
ताकि उसी बीज से
बने वृक्ष
जो दे सके छाया
जवानी में
सूखने पर जल सके चूल्हे में
सेंक सके रोटी
उबाल सके चावल।

बस हमें बनकर मिट्टी
करनी है पहचान
ऐसे ही बीज की
तभी शिक्षक होना
फलीभूत होगा।

अभिनव सरोवा
21 जनवरी 2019

Sunday, 20 January 2019

रार अभी भी है

रार अभी भी है...

रार थी उसकी
व्यवस्था से
छद्म हितेषियों से
अपने ही पेट से
न सूखते पसीने से
रोज पड़ते अकाल से
तपती धूप से
आवारा पशुओं से
लालची बँटाईदारों से
सामाजिक विद्रूपताओं और
विसंगतियों से।

रार अभी भी है
बढ़ गए दुश्मन
उग आए रक्तबीज-से
ठन गई उसकी
धर्म-ध्वज-वाहक-पूत से
राजनीतिक साँकळ खाते बंधुओं से
फैलती नशे की आदत से
बढ़ती बेरोजगारी से
बेटी के दहेज़ से
बाजार की महँगाई से
ईर्ष्यालु रिश्तों से
गिरते स्वास्थ्य से
मंडी के दलालों से।

पर उसने हिम्मत न छोड़ी
लड़ रहा है अभी भी
हारा नहीं है
थका नहीं है
वो किसान है
वो मजदूर है।

अभिनव सरोवा
20 जनवरी 2019

क्योंकि हम शिक्षक हैं

हम नहीं पहनते दस्ताने
न लगाते मास्क
न घिन्न आती है हमें
बिन नहाए बच्चों से
न गुरेज है अनपढ़ माँ-बाप से।

हम मिल लेते हैं
कभी भी
कहीं भी
किसी से भी
जो है अपने बच्चे को लेकर
संवेदनशील।

हम सबसे मिलते हैं
बिना अपॉइंटमेंट के।

हम बनाते हैं
शिक्षक
डॉक्टर
इंजीनियर
पुलिस
बाबू।

लोग मजाक उड़ाते हैं
फिर भी हँसकर
सह लेते हैं
कंजूस का तमगा।

इश्क है हमें अपने पेशे से,
गर्व है कि हम शिक्षक हैं।

अभिनव सरोवा
19 जनवरी 2019

शहीद- भाग ग्यारह

शहीद- भाग ग्यारह

जिन्दा लाशें बिखरी थीं इधर-उधर
कुछ बाड़ के पास
कुछ दरी पर
कुछ भीतर आँगन में
कुछ बाहर गली में
कुछ अभी भी थीं
अपने-अपने घरों में।

तभी एक लाश
पूछती है दूसरी से
क्या समाचार हैं,
दिल्ली पहुँचे या नहीं?
हिल गई गर्दन
उचक गये कंधे
जाहिर कर दी अनभिज्ञता।

घर भर गया लाशों से
रखने की जगह न थी
फिर भी हर आने वाली लाश
तलाश ही लेती जगह अपनी।

बढ़ती-जलती लाशों के बीच में
मोबाइल फिर चीख पड़ा
खबर आई कि
अभी दिल्ली पहुँचे हैं।
सात घंटे और लगेंगे
दोपहर दो बजे तक
पहुँच जाएँगे।

किसी ने डाल दिया घी
जैसे धधकती आग में
उठने लगी लपटें
जल रहा हिया सभी का।

आई कुछ लाशें
एक लाश थी उनमें
टुकड़े-टुकड़े
उसके सीने से उठती लपटें
साफ देखी जा सकती थीं।
कुछ ने कहा- बुआ है
कुछ ने कहा- बाई।
उठती लपटों पर साफ लिखा था
मैंने तेरी शादी के लिए
ड्रेस बना रखी थीं।
मुझे नाचना था
तेरे संग
तेरी माँ संग
तेरे फूफा संग
अब........?????

मुझे करना था आरता
उतारनी थी नजर तेरी
पहनानी थी बहू को साड़ी
जीमना था साथ उसके
देनी थी आशीष
दूधों नहाओ, पूतों फलों की
पर अब.......????

मुझे करना था शगुन
दूध पिलाई का।
कूटनी थी सौंठ
पीसना था धनिया
जमानी थी अजवाइन
धोने थे पोतड़े
खूब लाड लडाने थे
पर अब......????

हाय रे! भतीज.....
तू कहाँ चला गया,
अब मुझे बुआ कौन कहेगा?
कोई मेरे फौजी को बुला दो रे
हाय रे! मेरे भतीज.....😢

अभिनव सरोवा
20 जनवरी 2019

Saturday, 19 January 2019

क्योंकि हम शिक्षक हैं

हम नहीं पहनते दस्ताने
न लगाते मास्क
न घिन्न आती है हमें
बिन नहाए बच्चों से
न गुरेज है अनपढ़ माँ-बाप से।

हम मिल लेते हैं
कभी भी
कहीं भी
किसी से भी
जो है अपने बच्चे को लेकर
संवेदनशील।

हम सबसे मिलते हैं
बिना अपॉइंटमेंट के।

हम बनाते हैं
शिक्षक
डॉक्टर
इंजीनियर
पुलिस
बाबू।

लोग मजाक उड़ाते हैं
फिर भी हँसकर
सह लेते हैं
कंजूस का तमगा।

इश्क है हमें अपने पेशे से,
गर्व है कि हम शिक्षक हैं।

अभिनव सरोवा
19 जनवरी 2019

नकारात्मकता बनाम सकारात्मकता

नकारात्मकता बनाम सकारात्मकता...

छाया का महत्त्व तब है जब झुलसा देने वाली धूप और गर्मी हो, घर का महत्त्व भी वही जान सकता है जो कभी बेघर रहा हो या तपती दोपहर में किसी वीरान मरुस्थल में पर्णरहित रूँख को आसरा बनाया हो या सर्द रात में खुले आसमान तले अपने जीवन का कुछ अंश बिताया हो। दुःख की उपस्थिति ही सुख की महत्ता दर्शाती है। अमीरी का मोल गरीबी से और गरीबी से दूर भागने की लालसा अमीरी को देखकर ही जगती है।

उसी प्रकार सकारात्मकता या उसके साम्य विचारों का महत्त्व नकारात्मकता या ही ऐसे विचारों के कारण बढ़ जाता है। किसी कार्य के प्रति सकारात्मक होना लाजिमी है किंतु किसी नकारात्मक विचार वाले व्यक्ति की उपस्थिति सकारात्मक विचार वाले व्यक्ति के जेहन में एक झुंझुलाहट जरूर पैदा कर देती है पर साथ ही उसे आत्मबल के साथ-साथ फिर से कुछ अच्छा और नया करने की प्रेरणा भी देता है तथा बूस्ट करने वाला रिचार्ज भी।

   नकारात्मक विचार वाले व्यक्ति का होना उतना ही आवश्यक है जितना आग में धुँआ। उठता धुँआ हमें मजबूर कर देता है कि फूँक मारें और आग जलाएँ। वो आग जो सृष्टि का पोषण करे न कि संहार। अब जरुरत है कि आग को बुझने न दें और निरंतर गति से ईंधन डालते रहें। बेशक ऐसा समय भी आएगा जब ईंधन भीगा हो और वातावरण भी नम। ऐसे में भी हम चूल्हा भी जलाते हैं और भोजन बनाकर उदरपूर्ति भी करते हैं।

शिक्षा या विद्यादान जैसे प्रकरण में भी ईंधन भीग सकता है, वातावरण नम या तर हो सकता है। चूँकि ऐसे में जब हम भोजन बनाकर खा सकते हैं शिक्षा की राह में आने वाली तमाम मुसीबतों, भौतिक-मानवीय संसाधनों की न्यूनता (जिसकी पूर्ति करना हमारे वश में भी नहीं है) या अन्य कार्यों की अधिकता का रोना लेकर क्यों बैठे रहें? हम भीगे चूल्हे एवं भीगे ईंधन को अपनी काबिलियत और कर्त्तव्य के संयोग रूपी ईंधन से क्यों न रोशन करें।

एक शिक्षक के रूप में काम करते हुए ज्यादा तो नहीं पर छह साल पूरे हो गए हैं। इस दौरान शिक्षकों से संपर्क ज्यादा बना। इसे मज़बूरी समझो या संयोग। इनमें सिरफरे, नवाचारी, पेशे को जूनून की हद तक चाहने वाले या कहें कि प्रेयसी की भाँति इश्क करने वाले भी मिले पर बहुतांश में वो भी मिले जो अपने नकारात्मक रवैये के कारण कोई छाप न छोड़ पाए।
मेरे निजी विचार में एक शिक्षक को तो कतई नकारात्मक विचार वाला नहीं होना चाहिए। हम आज भी पुराने ढर्रे को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। आने वाले नवाचारों का दिल से स्वागत करने और  उन्हें apply करने में तंगी दिखाते हैं। हर नवाचार गले का साँप नजर आता है; जैसे हाथ बढ़ाया और इसने डसा।

जरूरत तो इस बात की है कि हम खुद नवाचार क्रिएट करें और हो ये रहा है कि हम किसी साथी या सरकार द्वारा प्रस्तुत नवाचार में खामियाँ खोजने लगते हैं।
   बालक की आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक और लैंगिक स्थिति का अवलोकन किए बगैर उसके आई. क्यू. का निर्धारण करने लगते हैं और उसे निकृष्ट साबित करने की जी तोड़ कोशिश करते हैं। हम आई. क्यू. को लिए बैठे हैं और शिक्षा मनोविज्ञान ई.क्यू. तक पहुँच गया है। जब वह प्रोत्साहन के दो शब्द सुनने को बेताब होता है या हमारे द्वारा प्रोत्साहन के रूप में कहे गए दो शब्द उसकी दशा और दिशा बदल देने की कुव्वत रखते हों उसी दरम्यान उन दो प्रेरक शब्दों की बजाय हतोत्साहित करने वाले दर्जनों शब्द प्रयुक्त कर लेते हैं।

आखिर क्यों?

दोष क्या है उस बालक/बालिका का?

उसके पापा गरीब हैं तो उसमें उसका नहीं बल्कि व्यवस्था का दोष है। वो कम मेहनत करता हो तो हम कह भी सकते हैं। वो दिनरात खेत में काम करता है और बावजूद उसके वह अपने बच्चों को नई ड्रेस, जूते या स्वेटर नहीं लाकर दे सकता तो ये उसका नहीं अपितु हम व्यवस्था के भागीदारों का दोष है। लड़का खुद छुट्टी के बाद पशु चराने जाता है या रात को खेत में पानी पिलाता है या आवारा पशुओं की रखवाली करता है तो ये उसकी विवशता है।

वो समाज में नीची, अस्पृश्य या कमतर समझी जाने वाली जाति से है  तो उसमें उस बालक का कोई दोष नहीं है। जन्म पर उसका कोई हक या अधिकार नहीं है। ये जो जन्मसिद्ध अधिकार हैं न, ये सब जन्म के बाद की बातें हैं। हम कब तक जाति का लाँछन लगाकर उसे कहते रहेंगे कि तेरा कुछ नहीं हो सकता या अपने साथी शिक्षकों के बीच ठट्ठे लगाते समय कहेंगे कि इसका कुछ नहीं हो सकता।

कब तक उसकी कद-काठी, नैन-नक्श, रंग को भद्दा मजाक बनाएँगे। किसी पहाड़ी इलाके में जन्मने से उसका कद नाटा है या नाक चपटी है या रंग साँवला है तो उसमें इसका दोष है? उसके पर्यावरण को ऐसे कद-काठी, नैन-नक्श और रंग की जरूरत होगी।

कब तक लड़कियों पर लड़कों को तरजीह देते रहेंगे? वो लड़की है, हमारे प्रिंस की तरह नहीं हैं। उसे घर का काम भी करना है और खेत से थक-हारकर लौटे पापाजी को चाय भी पिलानी है। उसे घरवालों की उस इच्छा का ख्याल भी रखना है कि ससुराल से ये उलाहना न दिलवा देना कि माँ-बाप ने कुछ सिखाया भी था या नहीं। कुछ निजी समस्याएँ भी होती हैं। उसके बाद समय मिले तब जाकर थोड़ा-बहुत पढ़ पाती है।

इसके बाद कुछ बच भी जाता है तो गत कक्षा के प्राप्तांकों को कसौटी बनाकर अपनी विचारधारा तय कर लेते हैं।

आखिर ये कब तक चलेगा और क्यों?

आखिर हम इतने लकीर के फ़क़ीर क्यों हैं कि विभाग द्वारा किसी विशेष कार्य के लिए तय समय पर उँगली उठाते हैं पर भोजनावकाश के बाद घंटी लगाना अक्सर भूल जाते हैं या याद आने और भी याद नहीं करते!

माना कि नकारात्मकता का अपना महत्त्व है और उसी से सकारात्मक पहलू या नजरिये की सार्थकता। पर मेरे निजी विचार में एक शिक्षक को तो नकारात्मकता से परहेज ही करना चाहिए। हमारा नकारात्मक होना कक्षा ही नहीं बल्कि स्कूल के कई बच्चों को प्रभावित करता है।
हमारी दिली कामना है कि ये कुछ और बहुत के बीच की खाई जल्द से जल्द पाट दी जाए ताकि हम संपूर्णता की ओर अग्रसर हों। नकारात्मकता का अंशमात्र भी हममें न हो।

अभिनव सरोवा
13 जनवरी 2019

Monday, 14 January 2019

मैं रोज मरता हूँ

रोज मरता हूँ मैं...

दुनिया की भागमभाग में
सुबह से शाम तक
जितने भाव-विचार
मरते हैं मन में
बहते जल की तरह
खिसकते हैं हाथ से
निकल जाते सरलता से
उँगलियों के बीच से।

कगार के पेड़ की जड़ से
टूटती है मिट्टी
खोकर वजूद अपना
बह जाती पानी संग
पता नहीं कितने भाव
टूटकर गिरते हैं रोज
बहते दरिया में
मिट्टी की तरह।

जलता है मन
मोमबत्ती की तरह
ढुलकते हैं ख़यालात
गर्म मोम के जैसे,
उड़ जाते सपने
धुँए के जैसे और
खो जाते नीरव नभ में।

पल-पल झड़ता
अगरबत्ती की तरह
इसी तरह झड़ जाऊँगा एक दिन।

तब बुझेगी मोमबत्ती
ढहेगा कगार का पेड़
मिलेगा सागर में,
सूखी रेत में या
गाँव की गिन्नाणी में।

इस तरह मैं रोज मरता हूँ
थोड़ा-थोड़ा
रफ़्ता-रफ़्ता

अभिनव सरोवा
14 जनवरी 2019

Tuesday, 8 January 2019

शहीद के पिता- भाग दस

शहीद का साथी फौजी

भाग-दसवाँ

इधर पिता दबाए बैठा
जमानेभर का दर्द,
माँ-बेटी थीं अनजान
अपनी ही क़यामत से।

उधर सुदूर पूर्वोत्तर में
हो रही तैयारी आखिरी सलामी की
कल तक जो ठोकता था सलाम
आज बड़े से बड़ा ऑफिसर
करके अर्पित पुष्प-चक्र
ठोक रहे सलामी उसको।
पर वो लेटा ताबूत में
बिना किसी प्रतिक्रिया के
आज गाड़े थे उसने
झंडे अपनी बहादुरी के।

ले सलामी वह
हुआ रवाना
अपनी बाल-क्रीड़ा-भूमि को
ट्रक कैंप से एयरपोर्ट को
सरपट दौड़ा जा रहा।
थे कुछ साथी उसमें रोजाना के
उनमें भी एक कुछ खास था
जिसका शरीर आगे को
पर मन पीछे को दौड़ रहा।

यही कोई छह माह पहले ही तो
जुड़ा था यूनिट से
बड़ा मस्त लड़का
सदा हँसता रहता था।
कुछ ही दिनों में बन गया
मेरा लंगोटिया यार
मेरी पत्नी का देवर
बच्चों का चाचा
माँ का छोटा पर प्यारा बेटा।
पर आज.....?

जो कहा
वो कर दिखाया
दो को ढहाकर
सीने ने गोली खाई हैं।

चेहरे पर पीड़ा न शिकन कोई
हाथ भी रहा मूँछों पर
उँगली अभी भी थी
राइफल के ट्रिगर पर।

रात को ड्यूटी जाते
यही कहकर तो गया था
सुबह भाभी से बात करूँगा
और तेरी शिकायत भी।
पर अब कैसे करेगा
बात उससे?

अटैक की खबर पर
पहुँचे घाटी में तो
जाना कि
दो दहशतगर्द
मिल चुके धूल में।
पर एक और था जो
लेटा था, धरती-माँ की गोद में
वो *यार* था मेरा।
हाय! मुझे छोड़कर कैसे चला गया?
तू झूठा था
झूठ कहा था तूने
कि तू मेरा भाई है
यार है मेरा!

पता चला
दो को मारकर
हो गया कुरबान
धरती माँ की खातिर।

देखा मैंने
इसके दाएँ जूते से
रिस रहा खून था
नीचे धरती माँ
कटोरा लिए खड़ी हैं जैसे
बह न जाए कहीं व्यर्थ।

बायाँ जूता पैर में न था
उस पर जमी थी
खून सनी मिट्टी
जो छोड़ना न चाहती थी
पैरों को उसके।
शायद ले रही
शहीद की चरण-रज
बनने का एहसास
और हो रही गौरान्वित।

हमने देखा
उसका शरीर गर्म
पर साँस ठंडी पड़ चुकी थी
आह! मेरे यार
तू कहाँ चला गया,
क्यों चला गया?

तू उठ
तेरी भाभी ने बात करने को कहा था
तू जी भरकर कर शिकायत मेरी
बस तू आँख खोल।

करता हूँ वादा
तेरे ब्याह में
नाचेंगे जोड़े से
जी भरकर नाचेंगे दोनों।

तू आजा एकबार
खोल दे आँखें
नहीं तो
मैं करूँगा शिकायत तेरी
कि ये शादी में बुलाने से डर गया।

तेरा फोन नोट-रिचेबल होने पर
आएगा फोन उसका
तो क्या कहूँगा मैं?

ट्रक पहुँच गया एयरपोर्ट
पर वो अभी भी था
घटनास्थल पर।

अभिनव सरोवा
7 जनवरी 2019

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