नकारात्मकता बनाम सकारात्मकता...
छाया का महत्त्व तब है जब झुलसा देने वाली धूप और गर्मी हो, घर का महत्त्व भी वही जान सकता है जो कभी बेघर रहा हो या तपती दोपहर में किसी वीरान मरुस्थल में पर्णरहित रूँख को आसरा बनाया हो या सर्द रात में खुले आसमान तले अपने जीवन का कुछ अंश बिताया हो। दुःख की उपस्थिति ही सुख की महत्ता दर्शाती है। अमीरी का मोल गरीबी से और गरीबी से दूर भागने की लालसा अमीरी को देखकर ही जगती है।
उसी प्रकार सकारात्मकता या उसके साम्य विचारों का महत्त्व नकारात्मकता या ही ऐसे विचारों के कारण बढ़ जाता है। किसी कार्य के प्रति सकारात्मक होना लाजिमी है किंतु किसी नकारात्मक विचार वाले व्यक्ति की उपस्थिति सकारात्मक विचार वाले व्यक्ति के जेहन में एक झुंझुलाहट जरूर पैदा कर देती है पर साथ ही उसे आत्मबल के साथ-साथ फिर से कुछ अच्छा और नया करने की प्रेरणा भी देता है तथा बूस्ट करने वाला रिचार्ज भी।
नकारात्मक विचार वाले व्यक्ति का होना उतना ही आवश्यक है जितना आग में धुँआ। उठता धुँआ हमें मजबूर कर देता है कि फूँक मारें और आग जलाएँ। वो आग जो सृष्टि का पोषण करे न कि संहार। अब जरुरत है कि आग को बुझने न दें और निरंतर गति से ईंधन डालते रहें। बेशक ऐसा समय भी आएगा जब ईंधन भीगा हो और वातावरण भी नम। ऐसे में भी हम चूल्हा भी जलाते हैं और भोजन बनाकर उदरपूर्ति भी करते हैं।
शिक्षा या विद्यादान जैसे प्रकरण में भी ईंधन भीग सकता है, वातावरण नम या तर हो सकता है। चूँकि ऐसे में जब हम भोजन बनाकर खा सकते हैं शिक्षा की राह में आने वाली तमाम मुसीबतों, भौतिक-मानवीय संसाधनों की न्यूनता (जिसकी पूर्ति करना हमारे वश में भी नहीं है) या अन्य कार्यों की अधिकता का रोना लेकर क्यों बैठे रहें? हम भीगे चूल्हे एवं भीगे ईंधन को अपनी काबिलियत और कर्त्तव्य के संयोग रूपी ईंधन से क्यों न रोशन करें।
एक शिक्षक के रूप में काम करते हुए ज्यादा तो नहीं पर छह साल पूरे हो गए हैं। इस दौरान शिक्षकों से संपर्क ज्यादा बना। इसे मज़बूरी समझो या संयोग। इनमें सिरफरे, नवाचारी, पेशे को जूनून की हद तक चाहने वाले या कहें कि प्रेयसी की भाँति इश्क करने वाले भी मिले पर बहुतांश में वो भी मिले जो अपने नकारात्मक रवैये के कारण कोई छाप न छोड़ पाए।
मेरे निजी विचार में एक शिक्षक को तो कतई नकारात्मक विचार वाला नहीं होना चाहिए। हम आज भी पुराने ढर्रे को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। आने वाले नवाचारों का दिल से स्वागत करने और उन्हें apply करने में तंगी दिखाते हैं। हर नवाचार गले का साँप नजर आता है; जैसे हाथ बढ़ाया और इसने डसा।
जरूरत तो इस बात की है कि हम खुद नवाचार क्रिएट करें और हो ये रहा है कि हम किसी साथी या सरकार द्वारा प्रस्तुत नवाचार में खामियाँ खोजने लगते हैं।
बालक की आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक और लैंगिक स्थिति का अवलोकन किए बगैर उसके आई. क्यू. का निर्धारण करने लगते हैं और उसे निकृष्ट साबित करने की जी तोड़ कोशिश करते हैं। हम आई. क्यू. को लिए बैठे हैं और शिक्षा मनोविज्ञान ई.क्यू. तक पहुँच गया है। जब वह प्रोत्साहन के दो शब्द सुनने को बेताब होता है या हमारे द्वारा प्रोत्साहन के रूप में कहे गए दो शब्द उसकी दशा और दिशा बदल देने की कुव्वत रखते हों उसी दरम्यान उन दो प्रेरक शब्दों की बजाय हतोत्साहित करने वाले दर्जनों शब्द प्रयुक्त कर लेते हैं।
आखिर क्यों?
दोष क्या है उस बालक/बालिका का?
उसके पापा गरीब हैं तो उसमें उसका नहीं बल्कि व्यवस्था का दोष है। वो कम मेहनत करता हो तो हम कह भी सकते हैं। वो दिनरात खेत में काम करता है और बावजूद उसके वह अपने बच्चों को नई ड्रेस, जूते या स्वेटर नहीं लाकर दे सकता तो ये उसका नहीं अपितु हम व्यवस्था के भागीदारों का दोष है। लड़का खुद छुट्टी के बाद पशु चराने जाता है या रात को खेत में पानी पिलाता है या आवारा पशुओं की रखवाली करता है तो ये उसकी विवशता है।
वो समाज में नीची, अस्पृश्य या कमतर समझी जाने वाली जाति से है तो उसमें उस बालक का कोई दोष नहीं है। जन्म पर उसका कोई हक या अधिकार नहीं है। ये जो जन्मसिद्ध अधिकार हैं न, ये सब जन्म के बाद की बातें हैं। हम कब तक जाति का लाँछन लगाकर उसे कहते रहेंगे कि तेरा कुछ नहीं हो सकता या अपने साथी शिक्षकों के बीच ठट्ठे लगाते समय कहेंगे कि इसका कुछ नहीं हो सकता।
कब तक उसकी कद-काठी, नैन-नक्श, रंग को भद्दा मजाक बनाएँगे। किसी पहाड़ी इलाके में जन्मने से उसका कद नाटा है या नाक चपटी है या रंग साँवला है तो उसमें इसका दोष है? उसके पर्यावरण को ऐसे कद-काठी, नैन-नक्श और रंग की जरूरत होगी।
कब तक लड़कियों पर लड़कों को तरजीह देते रहेंगे? वो लड़की है, हमारे प्रिंस की तरह नहीं हैं। उसे घर का काम भी करना है और खेत से थक-हारकर लौटे पापाजी को चाय भी पिलानी है। उसे घरवालों की उस इच्छा का ख्याल भी रखना है कि ससुराल से ये उलाहना न दिलवा देना कि माँ-बाप ने कुछ सिखाया भी था या नहीं। कुछ निजी समस्याएँ भी होती हैं। उसके बाद समय मिले तब जाकर थोड़ा-बहुत पढ़ पाती है।
इसके बाद कुछ बच भी जाता है तो गत कक्षा के प्राप्तांकों को कसौटी बनाकर अपनी विचारधारा तय कर लेते हैं।
आखिर ये कब तक चलेगा और क्यों?
आखिर हम इतने लकीर के फ़क़ीर क्यों हैं कि विभाग द्वारा किसी विशेष कार्य के लिए तय समय पर उँगली उठाते हैं पर भोजनावकाश के बाद घंटी लगाना अक्सर भूल जाते हैं या याद आने और भी याद नहीं करते!
माना कि नकारात्मकता का अपना महत्त्व है और उसी से सकारात्मक पहलू या नजरिये की सार्थकता। पर मेरे निजी विचार में एक शिक्षक को तो नकारात्मकता से परहेज ही करना चाहिए। हमारा नकारात्मक होना कक्षा ही नहीं बल्कि स्कूल के कई बच्चों को प्रभावित करता है।
हमारी दिली कामना है कि ये कुछ और बहुत के बीच की खाई जल्द से जल्द पाट दी जाए ताकि हम संपूर्णता की ओर अग्रसर हों। नकारात्मकता का अंशमात्र भी हममें न हो।
अभिनव सरोवा
13 जनवरी 2019