Monday, 14 January 2019

मैं रोज मरता हूँ

रोज मरता हूँ मैं...

दुनिया की भागमभाग में
सुबह से शाम तक
जितने भाव-विचार
मरते हैं मन में
बहते जल की तरह
खिसकते हैं हाथ से
निकल जाते सरलता से
उँगलियों के बीच से।

कगार के पेड़ की जड़ से
टूटती है मिट्टी
खोकर वजूद अपना
बह जाती पानी संग
पता नहीं कितने भाव
टूटकर गिरते हैं रोज
बहते दरिया में
मिट्टी की तरह।

जलता है मन
मोमबत्ती की तरह
ढुलकते हैं ख़यालात
गर्म मोम के जैसे,
उड़ जाते सपने
धुँए के जैसे और
खो जाते नीरव नभ में।

पल-पल झड़ता
अगरबत्ती की तरह
इसी तरह झड़ जाऊँगा एक दिन।

तब बुझेगी मोमबत्ती
ढहेगा कगार का पेड़
मिलेगा सागर में,
सूखी रेत में या
गाँव की गिन्नाणी में।

इस तरह मैं रोज मरता हूँ
थोड़ा-थोड़ा
रफ़्ता-रफ़्ता

अभिनव सरोवा
14 जनवरी 2019

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