Sunday, 31 March 2019

शहीद- भाग चौदह

#शहीद- भाग चौदह


जमा थी
भीड़ दुनियाभर की
गाँव
पंचायत
ननिहाल के लोग। 
बुआ
मौसी
के साथ आये थे
सभी रिश्तेदार।
आस-पड़ोस में
जिसने भी सुना
चल पड़ा
मिला जो भी साधन
थे उतावले सभी
देनी थी आहूति
अग्नि में एक जवान की।
देखनी थी
सधे कदमों की परेड
सुननी थी
मातमी धुन और
बंदूक की धाँय.....।
देखने थे
उल्टे हथियार
चढ़ाने थे पुष्प
लगाने थे जयकारे
सो सब चल पड़े
जैसे भी थे।

नाम था उसीका
सबकी जुबाँ पर
जाने कैसी मिठास थी
नाम में उसके
लोग थकते न थे
जुबान पर लाने से अपनी।
बह रहा था लहू बनकर
आँसू सबकी आँखों से
बस नाम था उसका और
सामने था #ताबूत
आँगन में रोती-बिलखती
ताई, माँ, बहिन
दादी और चाची
बुआ और मौसी
और बाकी से भी था
कोई न कोई रिश्ता।

बाहर बाखळ में
रोके साँस
खड़े थे लोग
लिए सहारा
नाम के उसका।
पास ही
थे खड़े कुछ सैनिक
पहने थे वर्दी
सिर पर कलंगी
हाथ मे हथियार
आँखों में गज़ब का कॉन्फिडेंस
खींच रहे हों जैसे
कुएँ से हिम्मत
फिर भी दर्द की लकीरें
दिख रही चेहरे पर।
वो सोच रहे
उठाया करते थे अकेले
जिसे ट्रेनिंग के दौरान
हथियार भी होता था
साथ में उसका।
आज मिलकर
चार जोड़ी कंधे
उठा भी पाएँगे उसे या नहीं।

जाने किस मिट्टी से
गढ़े जाते हैं जवान ये
खो दिया साथी पर
मजाल कि
दुनिया के सामने
गिर जाए एक भी कतरा
आँख से उनकी या
फफक पड़ें होठ।

अब तक निभाया साथ
हँसते-हँसते
अंतिम विदाई भी हो ऐसी
करेंगे कोशिश
पर कैसे.....?
यही सवाल आपकी-मेरी तरह
कचोट रहा उनको भी।

इधर सज गई डोली
दूल्हन हुई तैयार
अनगिनत थे कहार
लगाने को हाथ
दूल्हन ने बढ़ाए कदम
निकली आँगन से
फफक पड़े सब
उसने भी चलते-चलते
माँग ली माफी
गाँव से
खेत से
खलिहान से
खेजड़े से
माँ से, बाप से
बहिन से, भाई से
चाचा से, ताऊ से
अपने यारों से
जिसे जानता था उनसे भी
न जानता था उनसे भी

कर रहे थे विदा सब
कलेक्टर हो या मंत्री
या संग के अधिकारी
थे और भी कई।

उनमें ही थे
पंचायत के सरपंच
जो अभी भी थे
गाँव के गुवाड़ में।
यही कोई छह माह पहले मिला था
और कहा था मुझसे
सरपंच साहब!
अबकी छुट्टी आऊँगा
लगाएँगे परिण्डे
गुवाड़ के पीपल पर
स्टैंड पर लगेगी प्याऊ एक
और शमशान में रोपेंगे पौधे
किसे पता था
आज रोप रहा हूँ
खुद उसी को
ताकि उग सकें
नई पौध
उसीके जैसी।

अभिनव सरोवा
30 जनवरी 2019

शहीद- भाग तेरह

शहीद की मंगेतर- भाग तेरह

खबर हुई
त्वरित प्रसारित
पता लग गया उसे भी
जिसकी हर साँस थी
नाम उसके।

वो न रोई
न बोली
बस खो गई
दुनिया से अलग
दूसरी दुनिया में।

चाहा था जिसे टूटकर
माना था जिसे
सबसे बढ़कर।
इतराती थी
इस बात पर
कि उसे चाहने वाला
है देश का प्रहरी
या
चाहती है जिसे
वो करता है
सीमा की रखवाली।
आज न वो रहा
न उसे चाहने वाली
बस काया बची है
जीव गया उसी संग
अंदर बचा है सिर्फ
खोखलापन
सूख गए आँसू भी।
रुक गया
रक्त संचरण
वो बार-बार
लेती हाथ में
दूसरा हाथ
जिसमें पहनाया था
उसने कड़ा।
बंद मुट्ठी भी खुल जाती
देखने को अँगूठी
नाम के उसकी।
अबोध से सुबोध होने के बाद
आज पहली बार
बिना स्नान किए
पहन लिया वही सूट
जो दिलाया था उसने
जब मिले थे
पहली बार।

अभी तो
पेड़ की शाख ही चुनी थी
बनाना था घोंसला
उसी शाख पर
आने थे उस पर
नए पत्ते, फूल और वसंत
चहकने थे
नव-परिंदे,
हाय! टूट गई वही शाख।

अब बरसने लगे
बादलों से मोती
होठ भी फड़क पड़े
पर रुलाई न फूटी
फूटे भी क्यों
जब रो रहा हो
रोम-रोम।

चाहा था तुझे
टूटकर
आज चाहत में तेरी
टूट गई हूँ
बिखर गई हूँ।
कल तक कहती थी आप
आज वो (साधिकार)
तू बन गया।
ये अपनायत की
पराकाष्ठा थी
आज लग रहा
ज्यादा प्यारा।

तूने कहा था
आऊँगा इस बार
तेरे घर
तब पूरा गाँव होगा
छत पर या
घर अपने
पर अब कैसे...?

अब तेरी निकलेगी बरात
यादगार
अभूतपूर्व
अविस्मरणीय
बस फर्क ये होगा
दूल्हन भी तू
दूल्हा भी तू
न होंगे तो हम।
दुनिया हमारी
बिलकुल
वीरान, नीम।

वो वीडियो कॉलिंग
वो चैटिंग
वो सुबह का
पहला सन्देश
वो रात की
आखिरी Good night
अब कौन करेगा
कौन कहेगा?

न रो सकती
न चुप्पी संभव
सब टूट गया
बिखर गया
उजड़ गया।

भरने से पहले
पौंछ दी माँग
झड़का दिया चूड़ा
खींच लिया
मंगलसू.....
काटकर उँगली
निकाल ली अँगूठी
ले गया सब शृंगार।
अब कैसे रहूँगी
तेरे बिन
तू कैसे रहेगा
मेरे बिन?

मर गई
जीते-जी
न कुमारी
न विधवा
न वीरांगना
बस एक नाम
आज से तू
शहीद के सपनों की
अभागिन.....


अभिनव सरोवा

Saturday, 23 March 2019

हाथ

हाथ

नहीं हैं हाथ
करने को खुशामद
पकड़ने को पैर
सजाने को रूप।

हाथ तो हैं
तोड़ने को कारा
मोड़ने को धारा
मिलाने को गारा
पकड़ने को बारा(चड़स)
तोड़ने को तारा
तो
तोड़ दो
अंधविश्वास की कारा
मोड़ दो प्रेम की धारा
बना दो बेघर का घर
सींच दो खेत
कर दो वो काम
जो मुश्किल हो
तोड़ने से तारे।

अभिनव सरोवा
23 मार्च 2019

खतरा

खतरा...

मैं आया था इस धरा पर
तुम्हारी ही तरह
माँ की कोख से।
पीया था दूध
जैसे पीया था तुमने।
वही हवा, वही अन्न
खाता रहा हूँ
आज तक
तुम्हारी ही तरह।

मुझे बनना था 'आदमी'
पर जाने क्यों
तुमने मुझे खतरा बना दिया।

खतरनाक हो तुम
हाथ लटकाए हर लाश
तुम्हें आदमी नजर आती है
और
तुम्हें हर जिंदा आदमी
खतरा ही नजर आता है
और इस तरह मैं
खुद-ब-खुद
खतरा ही बन गया।

अभिनव सरोवा
हिंदी अध्यापक
23 मार्च 2019