#शहीद- भाग चौदह
जमा थी
भीड़ दुनियाभर की
गाँव
पंचायत
ननिहाल के लोग।
बुआ
मौसी
के साथ आये थे
सभी रिश्तेदार।
आस-पड़ोस में
जिसने भी सुना
चल पड़ा
मिला जो भी साधन
थे उतावले सभी
देनी थी आहूति
अग्नि में एक जवान की।
देखनी थी
सधे कदमों की परेड
सुननी थी
मातमी धुन और
बंदूक की धाँय.....।
देखने थे
उल्टे हथियार
चढ़ाने थे पुष्प
लगाने थे जयकारे
सो सब चल पड़े
जैसे भी थे।
नाम था उसीका
सबकी जुबाँ पर
जाने कैसी मिठास थी
नाम में उसके
लोग थकते न थे
जुबान पर लाने से अपनी।
बह रहा था लहू बनकर
आँसू सबकी आँखों से
बस नाम था उसका और
सामने था #ताबूत
आँगन में रोती-बिलखती
ताई, माँ, बहिन
दादी और चाची
बुआ और मौसी
और बाकी से भी था
कोई न कोई रिश्ता।
बाहर बाखळ में
रोके साँस
खड़े थे लोग
लिए सहारा
नाम के उसका।
पास ही
थे खड़े कुछ सैनिक
पहने थे वर्दी
सिर पर कलंगी
हाथ मे हथियार
आँखों में गज़ब का कॉन्फिडेंस
खींच रहे हों जैसे
कुएँ से हिम्मत
फिर भी दर्द की लकीरें
दिख रही चेहरे पर।
वो सोच रहे
उठाया करते थे अकेले
जिसे ट्रेनिंग के दौरान
हथियार भी होता था
साथ में उसका।
आज मिलकर
चार जोड़ी कंधे
उठा भी पाएँगे उसे या नहीं।
जाने किस मिट्टी से
गढ़े जाते हैं जवान ये
खो दिया साथी पर
मजाल कि
दुनिया के सामने
गिर जाए एक भी कतरा
आँख से उनकी या
फफक पड़ें होठ।
अब तक निभाया साथ
हँसते-हँसते
अंतिम विदाई भी हो ऐसी
करेंगे कोशिश
पर कैसे.....?
यही सवाल आपकी-मेरी तरह
कचोट रहा उनको भी।
इधर सज गई डोली
दूल्हन हुई तैयार
अनगिनत थे कहार
लगाने को हाथ
दूल्हन ने बढ़ाए कदम
निकली आँगन से
फफक पड़े सब
उसने भी चलते-चलते
माँग ली माफी
गाँव से
खेत से
खलिहान से
खेजड़े से
माँ से, बाप से
बहिन से, भाई से
चाचा से, ताऊ से
अपने यारों से
जिसे जानता था उनसे भी
न जानता था उनसे भी
कर रहे थे विदा सब
कलेक्टर हो या मंत्री
या संग के अधिकारी
थे और भी कई।
उनमें ही थे
पंचायत के सरपंच
जो अभी भी थे
गाँव के गुवाड़ में।
यही कोई छह माह पहले मिला था
और कहा था मुझसे
सरपंच साहब!
अबकी छुट्टी आऊँगा
लगाएँगे परिण्डे
गुवाड़ के पीपल पर
स्टैंड पर लगेगी प्याऊ एक
और शमशान में रोपेंगे पौधे
किसे पता था
आज रोप रहा हूँ
खुद उसी को
ताकि उग सकें
नई पौध
उसीके जैसी।
अभिनव सरोवा
30 जनवरी 2019