जैसा मुझे लगा-
पुस्तक #अछूत को पढ़कर जैसा मुझे लगा। यहाँ उतार दिया। सहमति-असहमति हो सकती है। सभ्य और भाषायी मर्यादा के साथ प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा में।
मुल्कराज आनंद की पुस्तक 'अछूत' को पढ़ने के बाद जैसा मुझे लगा। ये उपन्यास उनके अंग्रेजी उपन्यास Untouchable का हिंदी अनुवाद है। मुल्कराज आनंद स्वयं क्षत्रिय थे और भारतीय वर्ण-व्यवस्था के मुताबिक स्वच्छ्ता उन्हें विरासत में मिली थी। ये पुस्तक वर्ण-व्यवस्था के सबसे निचले पायदान (शुद्र) में भी अंतिम पंक्ति की जाति भंगी को विषय बनाकर लिखी है। मन में शूद्रों के प्रति अतिशय घृणा रखने वाले, वर्ण-व्यवस्था के समर्थक और पोषक तथा जन्मना जातीय गौरव में रहकर बाकी को हीन समझने वाले बेशक मुझ पर आरोप लगा दें पर आनंद इस आरोप से मुक्त हो गए।
'अछूत' जैसा मुझे लगा से पूर्व मुल्कराज आनंद की बात करें कि साहित्य लेखन में आप किस मुकाम पर मिलते हैं। हिंदी साहित्य इतिहास के चौथे भाग #आधुनिक_काल के चौथे भाग को प्रगतिवादी या नागार्जुन काल के नाम से अभिहित किया जाता है। मोटे तौर पर इसका काल 1936 से 1943 तक माना जाता है। वर्ष 1935 में ई. एम. फोस्टर द्वारा पेरिस में प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की स्थापना की गई। इसी तर्ज पर वर्ष 1936 में सज़्ज़ाद हुसैन और मुल्कराज आनंद द्वारा लंदन में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की गई। इसका पहला सम्मेलन लखनऊ में 1936 में प्रेमचंद की अध्यक्षता में आहूत और संपन्न हुआ।
'अनटचेबल' का तो कह नहीं सकता पर 'अछूत' की प्रस्तावना ई.एम.फोस्टर ने ही लिखी थी। वे लिखते हैं कि किस प्रकार एक सम्पूर्ण जाति को मानव-मल उठाने और पाखाने साफ करने हेतु विवश किया गया और उस जाति में जन्म लेने वाले प्रत्येक स्त्री-पुरुष को अछूत, बहिष्कृत, घृणित और जानवर से भी बदतर बना दिया गया। इसी क्रम में वे अछूत के नायक से कहलवाते हैं कि 'वे सोचते हैं कि हम गंदे हैं क्योंकि हम उनकी गंदगी साफ करते हैं।' आगे लिखते हैं कि अछूत जैसी रचना और बक्खा जैसा चरित्र कोई यूरोपियन नहीं गढ़ सकता; क्योंकि वह इनकी परेशानियों को गहराई से नहीं जानता। ऐसी रचना कोई अछूत भी नहीं कर सकता क्योंकि वह या तो क्रोध प्रकट करेगा या आत्मदया का प्रदर्शन। खैर जो भी हो पुस्तक लिखी गई, साहित्य अकादमी से पुरस्कृत भी हो गई। होनी भी चाहिए। ( मेरे निजी विचार में अवार्ड के लिए आदर्श ओर यथार्थ को तवज्जो मिलने चाहिए। फिर अछूत में तो सब यथार्थ ही यथार्थ है। लक्खा द्वारा गालियाँ बकना, शहर में अनजान पुजारी द्वारा भ्रष्ट करने की बात पर हंगामा खड़ा करना और बक्खा को जलील करना, बक्खा की बहिन को हवस की शिकार बनाने की लालसा और विरोध पर भ्रष्ट करने का आरोप लगाना, पादरी हंचिसन द्वारा धर्मांतरण का प्रलोभन देना, गाँधी का स्वयं को छुआछूत का विरोधी पर कट्टर रूढ़िवादी हिन्दू मानना और युवा कवि बशीर द्वारा शास्त्र, विज्ञान और शिक्षा पर लंबा व्याख्यान और अंत में छुआछूत के समुचित उन्मूलन के लिए मार्ग बताना इत्यादि सब में यथार्थ ही यथार्थ है।)
बहरहाल पुस्तक के रूप में उपन्यास की बात करते हैं। साहित्य की समझ रखने वाले व्याख्याकार और विद्वजनों द्वारा दी जाने वाली परिभाषा में इसे रखा जाए या नहीं इस पर चर्चा न के बराबर करते हुए आगे बढ़ते हैं। चूँकि कहानी में जीवन के किसी एक भाग को कथानक रूप में लिया जाता है जबकि उपन्यास में सम्पूर्ण जीवन को ही कथानक रूप में लिया जाता है। इस उपन्यास में कथानायक बक्खा के जीवन की एक दिन की कथा को पिरोया गया है। ये लेखक की शैली है कि एक दिन के घटनाक्रम को भी उन्होंने वृहदाकार बना दिया। उनकी शैली ही है कि इस एक दिन के घटनाक्रम के मध्य उन्होंने पड़ोसी, घर, रेजिमेंट के माध्यम से सभी जरूरी बातों को शामिल कर लिया है। भंगी मुहल्ले के कच्चे घरों और हल्के-फुल्के माहौल को अंत में छुआछूत और जातिवाद को खत्म करने के यक्ष सवाल पर ले जाते हैं और कुछ उपाय भी सुझाते हैं। पूरी पुस्तक एक ही भाग में सिमटी हुई है। न कोई पाठ, न कोई अनुच्छेद। बस शुरू करना है और पढ़ते जाना है।
इसे पढ़ने की पहली शर्त तो ये है कि पाठक को धैर्यवान होना पड़ेगा। मन खिन्न होगा, उद्विग्न होगा, गुस्सा आएगा पर ऐसे पढ़ा जाए तो लेखक के संदेश का क्या होगा? उसके द्वारा संप्रेषित संदेश बीच राह में ही दम तोड़ देगा।
अछूत का नायक बक्खा है जो शारीरिक रूप से किसी वीररस वाली कविता का नायक हो सकता है पर है नहीं क्योंकि वो भंगी है और भंगी का वीररस की कविता का नायक होना कदापि संभव नहीं है। ये मुँह और मसूर की दाल। पिता लक्खा अपनी औलाद के लिए भयंकर गालीबाज और भारतीय सेना की रेजिमेंट के शौचालय साफ करने वाले भंगियों का जमादार है। जिसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि सेना की किसी पार्टी या आयोजन में बाहर फेंकी गई जूठन को उठाने का पहला अधिकार उसीका है। यहाँ आकर बक्खा वाला वीररस जुगुप्सा में बदल जाता है। छोटा भाई रक्खा वयोचित लापरवाह। लोग इसे आवारापन भी कह सकते हैं। छोटी बहिन सोहनी जो माँ की मौत के बाद बहिन भी है तो बेटी भी और चूल्हे के पास बैठती है तो बक्खा को माँ की भूमिका में ही नजर आती है। उपन्यास में आनंद ने अछूतों के घर, खानपान, गंदगी की समस्या का जीवंत चित्रण किया है।
बक्खा को सैनिकों वाले जूते, ड्रेस, हैट और सिगरेट का शौक है। कई दफा उसने अपने शालीन व्यवहार के चलते किसी फौजी से उतरी हुई वर्दी प्राप्त भी कर ली। वह अंग्रेजी सैनिकों के समान होने के सपने देखता है। वह भी उनकी तरह रजाई न ओढ़कर रातभर एक लोई में लिपटा पड़ा रहता है। रातभर की सर्दी से बुखार होने लाजिमी था। फिर भी बाप की गालियाँ खाकर सुबह पहुँच जाता है शौचालय साफ करने। वहाँ से निकलकर मुख्य सड़क पर आता है और किसी जंजाळ के चलते अपने शाश्वत वाक्य का 'भंगी आ रहा है' का उद्घोष नहीं कर सका और एक पुजारी से टकरा जाता है। पुजारी भ्रष्ट होने की बात से ऐसा हौवा खड़ा किया कि पूरा बाजार वहीं आ खड़ा हुआ। लोग तरह-तरह के आरोप बक्खा पर लगा रहे थे। कोई सिर पर चढ़ने की बात करता है तो कोई औकात में रहने की नसीहत देता है। बेचारा बक्खा इस अनजान आफत से छुटने का प्रयास भी नहीं कर पाता है तभी एक मुस्लिम ताँगेवाला आता है और वही उसे अपने तांगे में बैठाकर ले जाता है। बक्खा तो ये सोचकर हैरान हो जाता है कि इस आदमी ने भी तो मुझे स्पर्श किया है ये कैसे भ्रष्ट नहीं हुआ। जो भी हुआ पर बक्खा राहत महसूस कर रहा था।
इधर बक्खा की बहिन सोहनी पानी लेने जाती है पर तात्कालिक व्यवस्था के अनुसार वो कुएँ की जगत पर चढ़कर पानी नहीं भर सकती। वहाँ कुछ और लोग भी थे। उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति का इंतजार था जो उनके लिए पानी निकाल सके। इतने में एक सवर्ण(?) वहाँ से गुजरता है और वे सभी उससे आग्रह करते हैं। वो व्यक्ति पानी जरूर निकालता है पर सिर्फ सोहनी के लिए और उसे बोलता है कि वह हमारे मुहल्ले में सफाई करने आए। चूँकि उस जाहिल को सोहनी के चेहरे की चमक और उसके उभारों से मतलब था। इधर बक्खा एक मंदिर में पहुँच जाता है। लोग अंदर जा रहे थे पर वो आज तक नहीं जा पाया था। आज उसने टोकरी और झाड़ू कहीं बाहर रख दिये थे। अंदर का दृश्य देखने की लालसा में वो मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगता है पर मन मे खटका बना रहता है कि कहीं किसी ने पहचान लिया तो। ठीक इसी समय 'भ्रष्ट कर दिया भ्रष्ट कर दिया' की आवाज से उसके होश फाख्ता हो गए पर मुड़कर देखा तो एक व्यक्ति चिल्ला रहा था। लेकिन उसे सुकून मिला कि मुझे नहीं कहा जा रहा पर तभी चौंक पड़ा। उस आदमी के पीछे खुद उसकी बहिन सोहनी खड़ी थी। बक्खा मंदिर छोड़कर सोहनी के पास आता है और बार-बार पूछने पर बताती है कि इसने मेरे सीने पर हाथ रखा था और मेरे विरोध के बाद चिल्लाने लगा। बक्खा अपने आपे से बाहर हो जाता है। स्थिति भाँपकर वो आदमी भाग जाता है। यहाँ लेखक का संदेश स्पष्ट है कि भ्रष्ट सिर्फ अछूतों के पुरुषों से होते हैं। उनके घर की जवान बेटियों और बहुओं साथ हवस मिटाते समय भ्रष्ट नहीं होते। कैसा दोगलापन है? दोनों भाई-बहिन घर आते हैं। मूड पहले से खराब था। बाप से बहस हो जाती है। वो घर से निकल जाने को बोलता है। बक्खा घर से निकल जाता है। उसकी चाल-ढाल देखकर एक पादरी उससे सहानुभूति जताता है और चर्च की ओर ले जाता है। वो बताता है कि यीशु के समक्ष कोई छोटा-बड़ा नहीं है। बक्खा को कुछ समझ नहीं आ रहा पर वो साथ चल रहा था। घर पहुँचते ही 'फादर' की घरवाली 'मदर' बक्खा को जातिसूचक गालियाँ देने लगती है। उस समय बक्खा और फादर का मुँह देखने लायक है। संदेश यही है कि धर्म बदलकर भी रहोगे अछूत ही।
फादर से पिंड छुड़ाकर आगे चलने पर बक्खा देखता है कि लोग बेतहाशा भागे जा रहे हैं। किसी महात्मा गाँधी की जय-जयकार करते हुए। सब उसके बारे में बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। बक्खा भी जाने किस प्रेरणा के वशीभूत होकर उसी भीड़ में शामिल हो जाता है। इस दरम्यान वो कई लोगों से टकरा भी जाता है पर इस समय कोई भ्रष्ट नहीं हुआ और न ही किसी के पास इसके लिए समय था। बस गाँधी के दर्शन करने की जुगत में सब भागे जा रहे थे। खैर गाँधी का भाषण शुरू होता है कि मैं बचपन में अपने घर आने वाले भंगी ऊक्का को जानबूझकर छू लिया करता था। हालांकि घरवालों के दवाब में मुझे नहाना पड़ता था। वो यहीं नहीं रुके और आगे कहते हैं कि मैं स्कूल जाते समय अछूतों से जानबूझकर छूता था फिर माँ के कहे अनुसार किसी मुसलमान से टकराकर उस अछूत से हुई टकराहट की काट लगा लेता था।
यहाँ मेरे निजी सवाल खड़े होते हैं- इतना जहर लेकर जीवित कैसे रह लेते थे? अछूतों और मुसलमानों में तथा आपमें भिन्नता क्या थी? शायद यही कि वो न तो आपके जितने चालाक थे, न चालबाज, न धूर्त और न ही सयाणे थे। झूठ भी कितना बोला गया- उस जमाने में जब बहुत कम(न के बराबर) अछूतों की पहुँच स्कूल तक थी तो ये कब टकरा लेते थे? हद है झूठ की भी।
वे यहीं नहीं रुके और आगे कहते हैं कि मैं छुआछूत के खिलाफ हूँ किंतु कट्टर रूढ़िवादी हिन्दू हूँ। कैसे जनाब? कट्टर रूढ़िवादी हिन्दू और छुआछूत का विरोधी? फिर ये सब करता कौन था? एक साँस में दोहरा बरताव कैसे कर लेते हो?
गाँधी यहीं नहीं रुकते और कहते हैं कि भंगियों को अपनी स्थिति सुधारनी होगी,नशा छोड़ना होगा। स्वच्छा रहना होगा, गंदगी से दूर रहना होगा। यहाँ वाले पॉइंट काबिल-ए-गौर थे किंतु इनमें भी सवाल थे। हालात कैसे सुधरें? गंदगी उठाने के लिए किसने विवश किया? जब इनके पास न उत्पादन के साधन हैं न जमीन है और न ही शिक्षा। ऐसे में विकल्प क्या है? अन्य कामों में लोग इन्हें लगाएँगे नहीं तो इनको क्या करना है और कैसे करना है? साथ ही साथ ये भी बता देते। अछूतोद्धार का ये आदर्शवादी तरीका है जो कामयाबी की राह पर नहीं जा सकता।
गाँधी के बाद युवा कवि बशीर के माध्यम से लेखक मुल्कराज आनंद छुआछूत और जातिवाद जैसी घिनौनी समस्या का समाधान मशीनीकरण और शिक्षा के रूप में देते हैं। 1935 में प्रकाशित मूल उपन्यास #Untouchable में कवि बशीर बताते हैं कि हाथ से मल साफ करने और उठाने के स्थान पर मशीनों का प्रयोग किया जाना चाहिए। आज 84 साल बाद छुआछूत और जातिवाद जैसी समस्या में बहुत कमी आई है किंतु ये आशानुरूप और मानवता के नाते कम है। हम आज भी मानव की पहचान जाति के आधार पर करते हैं। लेखक मुल्कराज आनंद को धन्यवाद देना चाहूँगा के उस जमाने में जब लोग अछूतों को देखना और नाम तक लेना पसंद नहीं करते थे उस समय आपने अछूतों के दर्द को जाना, समझा और उसे दस्तावेज का मूर्त रूप दिया। साहित्य प्रेमी और अछूत वर्ग आपका आभारी रहेगा।
सामान्य ढंग से शुरु होने वाला उपन्यास अंत में एक राष्ट्रीय सवाल के साथ खत्म होता है।
अभिनव सरोवा
11 अगस्त 2019