चश्मदीद
कटघरे में खड़े
अधनंगे आदमी
जिसके
गालों की झुर्रियाँ
काली-सफेद
दाढ़ी से
ढकी थी।
सिर के सफेद
मगर घास जैसे बाल
फटे तौलिए की
ओट लिए
सहमे हुए थे, से
ऊँचे सिंहासन की अनुमति से
काले कोट ने पूछा-
तो तुमने वहाँ क्या देखा,
तुम वहाँ क्यों गए थे,
वहीं क्यों गए थे?
उस जगह
चारों तरफ की
क्षितिज देखने की
सुविधा के बावजूद
तुमने उसी तरफ क्यों देखा,
तुम क्या छिपा रहे हो?
सामने कटघरे में खड़ी
यह मासूम
निश्छल
कमसिन
गैरतमंद
हसीन व्यवस्था
जो अपनी
जुल्फें तक सलीके से
बाँधकर रखती है,
हत्या कैसे कर सकती है?
तुम झूठ बोल रहे हो
मेरी सीधी-सादी
लज्जाशील मुवक्किल पर
तोहमत लगाने के जुर्म में
और अदालत को गुमराह करने
और
हमारा बेशकीमती
समय ज़ाया करने के
अपराध में
तुम्हें
बामशक्कत
कैद होनी चाहिए।
बताओ, किसके इशारे पर
तुम इसे बदनाम कर रहे हो
कितने में बिके हो
तुम्हारी फंडिंग कौन करता है?
ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड
मेरे गवाह को
बोलने दिया जाए
ये एक दबी-सहमी
लेकिन काले कोट की ही
आवाज थी।
साहब, मैं छोटा आदमी हूँ
गाँव से शहर आया था
सोचा दो पैसों का जुगाड़ हो जाए।
लोगों से सुना था
वहाँ रोटी के देवता
ठेकेदार के वेश में आते हैं।
साहब, मैं उस मैदान के
बीचोंबीच खड़ा था।
दो तरफ कान थे
एक तरफ नाक और आँखें
एक तरफ थी पीठ।
पड़ रही थी भयंकर चीत्कार
दोनों तरफ से कानों में
रुदन बता रहा था
उनमें जवान भी थे
तो बूढ़े भी
पुरुष भी थे तो
महिला भी
लड़कियाँ भी थीं तो
बच्चियाँ भी,
साहब मुझसे सुना नहीं गया
मैंने धर दिए थे हाथ
अपने दोनों कानों पर।
ताकि रोक सकूँ
चीत्कार
क्रंदन
रुदन।
लेकिन इधर आँखों के सामने
लूट मची थी
वसूले जा रहे थे
तीन के तेरह।
वहीं पड़ी थी
कुछ जिंदा लाशें।
जिनसे उठती दुर्गंध से
कै होने को थी
मैंने मुँह फेर लिया
कानों में अब भी चीत्कार थी
अब लूट का दृश्य बदल गया था
मैं साँसों को
काबू करने की कोशिश में था
पर पहले जिधर पीठ थी
अब उधर आँख थी
वहीं दूर सामने
क्षितिज पर
यही तुम्हारी
कमसिन
हसीन
गैरतमंद
लज्जाशील व्यवस्था
रौंद रही थी लोगों को
उनमें कुछ के हाथ में टिफिन थे
कुछ पकड़े थे हाथों में थैले
कुछ किताबें
तो कुछ माँएँ
झिंझोड़ रही थी
अपनी निश्चल औलाद को।
तुम्हारी इस
हसीन व्यवस्था की
जुल्फें खुली ही नहीं
बिखरी हुई थी
दूध से दाँत
खून सने थे।
इसने मेरी आँखों के सामने
पढ़ाई
सड़क
नौकरी
रोजगार
दवा
को नोच-नोचकर
मार डाला था।
अभिनव
29 जनवरी 2020