Thursday, 30 January 2020

चश्मदीद

चश्मदीद

कटघरे में खड़े
अधनंगे आदमी
जिसके
गालों की झुर्रियाँ
काली-सफेद
दाढ़ी से
ढकी थी।
सिर के सफेद
मगर घास जैसे बाल
फटे तौलिए की
ओट लिए
सहमे हुए थे, से
ऊँचे सिंहासन की अनुमति से
काले कोट ने पूछा-
तो तुमने वहाँ क्या देखा,
तुम वहाँ क्यों गए थे,
वहीं क्यों गए थे?
उस जगह
चारों तरफ की
क्षितिज देखने की
सुविधा के बावजूद
तुमने उसी तरफ क्यों देखा,
तुम क्या छिपा रहे हो?

सामने कटघरे में खड़ी
यह मासूम
निश्छल
कमसिन
गैरतमंद
हसीन व्यवस्था
जो अपनी
जुल्फें तक सलीके से
बाँधकर रखती है,
हत्या कैसे कर सकती है?
तुम झूठ बोल रहे हो
मेरी सीधी-सादी
लज्जाशील मुवक्किल पर
तोहमत लगाने के जुर्म में
और अदालत को गुमराह करने
और
हमारा बेशकीमती
समय ज़ाया करने के
अपराध में
तुम्हें
बामशक्कत
कैद होनी चाहिए।
बताओ, किसके इशारे पर
तुम इसे बदनाम कर रहे हो
कितने में बिके हो
तुम्हारी फंडिंग कौन करता है?

ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड
मेरे गवाह को
बोलने दिया जाए
ये एक दबी-सहमी
लेकिन काले कोट की ही
आवाज थी।

साहब, मैं छोटा आदमी हूँ
गाँव से शहर आया था
सोचा दो पैसों का जुगाड़ हो जाए।
लोगों से सुना था
वहाँ रोटी के देवता
ठेकेदार के वेश में आते हैं।
साहब, मैं उस मैदान के
बीचोंबीच खड़ा था।
दो तरफ कान थे
एक तरफ नाक और आँखें
एक तरफ थी पीठ।

पड़ रही थी भयंकर चीत्कार
दोनों तरफ से कानों में
रुदन बता रहा था
उनमें जवान भी थे
तो बूढ़े भी
पुरुष भी थे तो
महिला भी
लड़कियाँ भी थीं तो
बच्चियाँ भी,
साहब मुझसे सुना नहीं गया
मैंने धर दिए थे हाथ
अपने दोनों कानों पर।
ताकि रोक सकूँ
चीत्कार
क्रंदन
रुदन।

लेकिन इधर आँखों के सामने
लूट मची थी
वसूले जा रहे थे
तीन के तेरह।
वहीं पड़ी थी
कुछ जिंदा लाशें।
जिनसे उठती दुर्गंध से
कै होने को थी
मैंने मुँह फेर लिया
कानों में अब भी चीत्कार थी
अब लूट का दृश्य बदल गया था
मैं साँसों को
काबू करने की कोशिश में था
पर पहले जिधर पीठ थी
अब उधर आँख थी
वहीं दूर सामने
क्षितिज पर
यही तुम्हारी
कमसिन
हसीन
गैरतमंद
लज्जाशील व्यवस्था
रौंद रही थी लोगों को
उनमें कुछ के हाथ में टिफिन थे
कुछ पकड़े थे हाथों में थैले
कुछ किताबें
तो कुछ माँएँ
झिंझोड़ रही थी
अपनी निश्चल औलाद को।
तुम्हारी इस
हसीन व्यवस्था की
जुल्फें खुली ही नहीं
बिखरी हुई थी
दूध से दाँत
खून सने थे।
इसने मेरी आँखों के सामने
पढ़ाई
सड़क
नौकरी
रोजगार
दवा
को नोच-नोचकर
मार डाला था।

अभिनव
29 जनवरी 2020

Tuesday, 21 January 2020

मिशन 100

#मिशन_शेखावाटी-100
संयुक्त निदेशक कार्यालय-चूरू

         किसी भी शिक्षक और उसके बच्चों के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण समय बोर्ड परीक्षा से पहले वाला होता है। इस दौरान वो दोनों सामूहिक रूप से अपनी तैयारी को अंतिम रूप देने में मशगूल रहते हैं। लेकिन कई बार राष्ट्रीय महत्त्व के कार्यों के कारण इस समय में व्यवधान आने लाजिमी हो जाते हैं। लिहाजा बच्चों को प्रत्यक्ष रूप से इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। शिक्षक चाहते हुए भी कुछ कर नहीं पाता है या जो रणनीति उसने बनाई है उस पर काम नहीं कर पाता है। ऐसा ही एक महत्त्वपूर्ण काम है- चुनाव। सत्र 2019-20 की बोर्ड परीक्षा से ठीक पहले पंचायतीराज चुनाव आने से शिक्षा विभाग के कार्मिक चुनाव आयोग की मशीनरी के उपकरण बन जाते हैं।
          ऐसे समय में चूरू मंडल के संयुक्त शिक्षा निदेशक आदरणीय सुरेंद्र सिंह गौड़ और सहायक निदेशक आदरणीय ओमप्रकाश फगेड़िया के निर्देशन में कक्षा 10 के उर्दू सहित सात विषयों और कक्षा 12 के भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, गणित, जीवविज्ञान, हिंदी और अंग्रेजी जैसे विषयों के विशेषज्ञ एक टीम के रूप मिलकर काम करते हैं। इसी कार्य का प्रतिफल मिशन शेखावाटी 100 नामक पुस्तिका के रूप में सामने आता है। बोर्ड परीक्षा परिणाम में न केवल मात्रात्मक अपितु गुणात्मक सुधार को लक्ष्य कर बनाई गई इन पुस्तिकाओं को शेखावाटी के तीन जिलों के सभी माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में निश्शुल्क पहुँचाया गया। बाकी के जिलों के लिए शाला दर्पण और टीचर जंक्शन नामक मोबाइल एप्लीकेशन पर लिंक जारी किया गया। मेरी निजी जानकारी के अनुसार अन्य जिलों के शिक्षक साथी इन लिंक्स से पुस्तिकाओं को डाउनलोड करके कक्षा में प्रश्नोत्तर लिखवा रहे हैं। इस कार्य के लिए समस्त संस्था प्रधानों और शिक्षक साथियों का अभिनंदन जो इस मुहिम की सफलता के लिए कार्य कर रहे हैं।  इससे बच्चों का लेखन भी सुधरेगा और प्रिंट देने के अनावश्यक खर्च से भी निजात मिल रही है। ये पुस्तिकाएँ पूर्ण रूप से बोर्ड नीलपत्र(ब्लू प्रिंट) पर आधृत हैं। पिछले वर्षों के प्रश्न-पत्रों का अवलोकन करके तैयार की गई पुस्तिकाओं में परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर शामिल किए गए हैं।
      इसके साथ ही दैनिक अखबार दैनिक भास्कर में हर रोज किसी एक विषय पर आधारित 15 प्रश्नोत्तर प्रकाशित किए जा रहे हैं। ये प्रश्नोत्तर प्रार्थना सभा में बच्चों के साथ साझा किए जाते हैं। खाली कालांश में बच्चे स्वयं अखबार में इन प्रश्नों पर चर्चा करते हुए देखे गए हैं। ये प्रश्नोत्तर भी विषय विशेषज्ञों द्वारा निश्शुल्क तैयार किए जा रहे हैं। इन्हें प्रकाशित करने के लिए दैनिक भास्कर का अभिनंदन करते हैं।
         चूँकि इस समय बहुत से शिक्षक साथी पंचायत चुनाव कार्य और बोर्ड की प्रायोगिक परीक्षा में व्यस्त हैं। इस कारण इनकी उपयोगिता और बढ़ गई है। चूरू संयुक्त निदेशक कार्यालय का लक्ष्य बोर्ड परीक्षा में राजकीय विद्यालयों का परीक्षा परिणाम गुणवत्ता के साथ शतप्रतिशत रखने का है। मिशन शेखावाटी 100 की पूरी टीम को उनके इस नेक कार्य के लिए साधुवाद। उनकी सामूहिक टीम भावना और विषय और शिक्षार्थियों के प्रति काम करने का जज्बा देखते ही बनता है। माननीय शिक्षा निदेशक और माननीय शिक्षा मंत्री महोदय ने भी चूरू मण्डल के इस प्रयास की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। जब सक्षम और उच्च स्तर से प्रोत्साहन और सराहना मिलती  है तो काम करने का आनंद द्विगुणित हो जाता है। मुझे खुशी है कि मैं भी इस टीम का एक अदना-सा उपकरण हूँ। समस्त उच्चाधिकारियों, शिक्षक साथियों का अभिनंदन और बच्चों को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ....💐

Saturday, 18 January 2020

आओ, मिलकर मुस्कराएं

ये समय नहीं
दुःखी होने,
आँसू बहाने,
विचलित होकर
पथ-भ्रष्ट होने का।

ये है
दुनिया से तुम्हारा
पहला परिचय।
जाहिर है
आगे भी ये मिलते रहेंगे।

माँज लो खुद को
संचित करो आँसू-आग
बनो विराट
ताकि वो पहुँच न सके
तुम तक
या बन जाओ सूक्ष्म
ताकि आओ न
नजर उन्हें।

लिख दो आसमाँ पर
नाम अपना।

फेंके हुए पत्थरों से
बना डालो बंकर
ताकि झाँक न सकें
भाषायी आतंकी।

दुःखी होने से
रोने से
जलेगी काया
रोयेगा मन
जबकि हम चाहते हैं
चहकता चेहरा
तो सीखना होगा
इन्हें अनदेखा करना।

बन जाओ बादल
छितराओ नभ में
पाकर माकूल माहौल
सींच दो प्रेम-रस से।

तुम्हारे दुःख,
बुझे चेहरे से
मिलेगी ख़ुशी
कुछ को ही
और दुःखी होंगे
अनगनित,
तो क्यों न
हम खुश रहकर
भर दें
अपनों की झोली।

खींच दें
लंबी रेखा
मुख-मंडल पर
मुस्कान की।

तो आओ! मिलकर मुस्कराएं

अभिनव सरोवा
23 जनवरी 2019

Thursday, 9 January 2020

तन्हा

मुझे तन्हा रहने दो...

मेरी तन्हाई से
बिगड़ न जाए
रौनक-ए-महफ़िल
इस ख्याल से
रखता हूँ दूर खुद को
दुनिया की भीड़ से।

अभिनव सरोवा
8 जनवरी 2019

Wednesday, 8 January 2020

हाँ, मैं हत्यारा हूँ

#हाँ_मैं_हत्यारा_हूँ

हाँ, मैं हत्यारा हूँ
मैंने मारा है
माँ-बाप के सपनों को
जो देखे थे उन्होंने
मेरे बालपन की
धमाचौकड़ी में।

हाँ,मैंने की है हत्या
जोड़ायत के सपनों की
जो देखे थे उसने
कुछ सगाई से पहले
कुछ सगाई के बाद।
मुझे याद है
मैंने इन्हीं हाथों से घोटा था गला
जब तक पकड़ ढीली हुई
सपने मर चुके थे
बस पत्नी जिंदा थी।

सिलसिला थम जाता
तो भी क्या कम था
पर किसी की झल्लाहट से उपजी
बेहूदा हरकत
मेरी पसंदीदा आदत बन गई
मैं किए जा रहा था
हत्या पे हत्या।

अब तक लग चुका था
खून शेर के मुँह में
लिहाजा हत्याएँ जारी रहीं
बच्चे पाले बैठे थे
छोटी-छोटी कुछ उम्मीदें।
छोटी चीज हत्या के लिए
ज्यादा मुनासिब होती है
सो पकड़ पैर
उछाल हवा में
पटक दिया सिल पर
और इस तरह
कुछ और जुड़ गया खाते में।

अब मन भर गया था
छोटी-छोटी हत्याओं से
दिल कोई बड़ा शिकार चाहता था
देश-दुनिया मे नाम चाहता था
अपने नाम की ख्याति चाहता था
जहाँ चाह वहाँ राह
ये साध भी पूरी हुई
एक साथ तीन को मारना
बहादुरी का काम है
जो मैंने किया
उनकी हत्या मैंने की
वो तीन थे
एक जैसे थे।
मैं वहीं भीड़ में खड़ा
देख रहा था
सुन रहा था
लोग उन्हें गाँधी के बंदर बता रहे थे।

हाँ, मैं हत्यारा हूँ
मैंने गाँधी के बंदरों की हत्या की है
ये जुर्म-ए-इकबाल है।

अभिनव सरोवा
08 जनवरी 2020

लाठीचार्ज

हर लाठीचार्ज के बाद
सड़क पर बिखर जाते हैं कुछ चेहरे
उठाकर सौंप दो
आदमी होगा तो
खुद-ब-खुद मर जाएगा।

Tuesday, 7 January 2020

मेरा गाँव

गाँव-

गाँव शब्द सुनते ही
एक तस्वीर नाचने लगती है
आँखों के सामने

घुटनों तक धोती बाँधे अधेड़ और बुजुर्ग
घाघरा-लुगड़ी पहने,
घूँघट निकाले महिलाएँ।

सार्वजानिक नल से पानी भरती लड़कियाँ
कंचे खेलते या टायर दौड़ाते लड़के।

कच्ची दीवारों वाले घर
घास-फूस की छत
कच्चे रास्ते या गलियाँ
घर से बाहर कचरे की अकुरड़ी।

लेकिन इन्हें समेटने के बाद भी
कुछ अलग है गाँव

ये भी सच है यहाँ
जाति के नाम पर अभी भी बचा है
कुछ भेदभाव।
कुछ काम भी हैं पुश्तैनी
पड़ोसी के बेटे की सगाई या
बेटी के लिए नौकरी वाला दामाद मिलने पर या
बच्चों के नौकरी लगने पर होती है
थोड़ी जलन।

फिर भी बहुत कुछ जो
सिर्फ बसता है गाँव में-

धोती वाले होते हैं
गाँवभर के अभिभावक और पोषक
रखते हैं ख्याल सबका
भरते हैं पेट सबका।

घाघरे-लुगड़े से
झलकती है एकरूपता
और घूँघट से करती हैं
बड़ों का आदर।

यहाँ सिर्फ अंकल नहीं रहते
यहाँ रहते हैं
चाचा, ताऊ, दादा, बाबा
और
चाची, ताई, दादी और बड़ी माँ।

यहाँ के लड़के टायर और कंचे ही नहीं खेलते
ये करते हैं देश की रक्षा और
भरते हैं देश का पेट
जिन्दा रखते हैं देश की अर्थव्यवस्था।

लड़कियाँ सिर्फ नल तक ही सीमित नहीं
बल्कि दुनिया की खूबसूरती समेटे
निर्मल भाव लिए
आँखों में लज्जा और सम्मान संग
आत्मविश्वास लिए वो करती हैं
घरेलू काम और स्कूली प्रश्नों पर बात
और चाची, भाभी या दादी से सिखती हैं
पीहर, ससुराल और ननसार की बातें।

लड़की की शादी पूरे गाँव का
कार्यक्रम होता है।
नौकरी पर जाते समय
आधा गाँव जाता है बस अड्डे तक।

जब जावण, आटा, चाय, चीनी
न हो तो पड़ोसी से कप, टोपिया
भरवाया जाता है।

और जो जुदा करती शहरों से; वो है-

जब किसी की बकरी या भेड़ को
मार देते हैं आवारा कुत्ते
तब आधा गाँव इकट्ठा होता है।

और जब मर जाती है
गाय या भैंस
तो सिर्फ दरी नहीं बिछती
बाकि पूरा गाँव जमा होता है एक जगह।
यही है वो ताकत जो गाँव को
करती है शहर से अलग।

अभिनव सरोवा
04 जनवरी 2019

Monday, 6 January 2020

जड़, तना और शाखें

जड़, तना और शाखें....

हमें पढ़ाया गया
एक पेड़ था हरा-भरा
फला-फूला, लता-गुल्मों से ढका हुआ
हमें बताया गया कि
शाखें जड़ों से खुश थीं
जड़ें भी खुश थीं शाखों से
तना भी था दीवाना
पाकर इन्हें अपने आगे-पीछे
लेकिन नहीं
ये अधूरा सच नहीं
एक तिहाई झूठ था
सच ये था
शाखें करती थीं घृणा जड़ों से
और तने की करती थीं चापलूसी
तने की थी आशनाई
कुछ लचीली शाखों से।
तभी वो करता जड़ों का मानमर्दन
कभी-कभी तनमर्दन भी।
शाखें पलती रही जड़ों के रस से
जिसे इन्होंने अधिकार समझा
जड़ें भी करने को अपनी मजबूत जड़ें
पैठ गई गहरे
और डाल ली गले में
दुनियाभर की अंध आस्था
शाखें अब भी खुशहाल थीं
तने के भी निकल आये गूमड़
वो अब करवाता है 'हाँ'
हर सही-गलत बात की
शाखें भी करने लगी हैं बातें जड़ों से
और जड़ें फिदा हैं
तने के गुमड़ों और शाखों की नज़ाकत पर।

अभिनव सरोवा
06 जनवरी 2020