Saturday, 18 August 2018

समीक्षा- मुर्दहिया

कहने को तो मुर्दहिया एक शब्द है पर लेखक के नजरिये से देखें तो इसके अर्थ बड़े गहन हैं। गाँव के बाहर का ऐसा स्थान जहाँ मृत व्यक्ति का अंतिम क्रियाकर्म और पशुओं के दोहरे क्रियाकर्म संपन्न होते थे। पहले इनकी खाल उतारी जाती और तत्पश्चात गिद्ध, सियारों द्वारा माँस भक्षण। वास्तव में देखा जाये तो गिद्ध और सियार ही तो थे जो मुर्दहिया को आबाद किये हुए थे। वरना मानव तो साँझ के बाद से उधर देखना तो दूर सोचना भी पसंद नहीं करते थे। कारण था भूतों का भय।  लेखक के शब्दों में उनकी बस्ती के किसी भी व्यक्ति की जीवनी या आत्मकथा लिखी जाती तो यकीनन उसका नाम मुर्दहिया ही होता। पता नहीं कितने मुर्दा दफन थे अंदर?

इनका गाँव धरमपुर राहुल सांकृत्यायन के पैतृक गाँव 'कनैला' और मुलायम सिंह के पूर्व संकटमोचक अमरसिंह के गाँव 'तिरवां' के पड़ोस में आबाद था। कहने को आबाद था पर असल में बसती थी कुछ ज़िंदा लाशें, चलते-फिरते कंकाल, माँ की छाती को चूसते निरीह बच्चे और संपूर्ण रूप से बेरोजगार युवा पीढ़ी।

  आत्मकथा का पहला खंड लेखक तुलसीराम के जन्म से लेकर 10 वीं पास करके घर से भागकर डी ए वी इण्टर कॉलेज में प्रवेश लेने तक की कथा है। उसके बाद का खंड मणिकर्णिका के नाम से लिखा गया है।  (पढ़ना शेष है)। दलित बस्ती में अपने परिवार की बड़ी सदस्य संख्या के चलते चैत्र आने तक लगभग फाकों की नौबत आ ही जाया करती थी। कहाँ जाए, क्या करें, किससे कहें, वाली स्थिति बन पड़ती थी। लगभग हर घर, गाँव की यही स्थिति थी।

  शिक्षा की तो बात ही क्या कहें- एक चिट्ठी आने पर पाँचवीं पास उस लड़के की खोजबीन शुरू हो जाती थी जिसे बाहर वाले ही नहीं बल्कि घर वाले भी एक आँख न होने के कारण *कनवा* कहकर पुकारते थे। ये संबोधन उसके लिए घनघोर पीड़ादायक था पर...?
ऐसे में वह बालक जब 'पावबल मुर्बिदास' की जटिल गुत्थी को सुलझाता है और इसे 'पावै बलमू रविदास' के रूप में विश्लेषित करता हटो गाँव भर में उसकी पूछ बढ़ जाती है। एकबार भैंस से गिर जाने पर गाँवभर की नवविवाहिताएं (जो परदेश में रहने वाले अपने पति को पत्र लिखवाया करती थी) उसे बुलाकर या घर जाकर ऐसा न करने के लिए कहती हैं। भले ही उसके मूल में खुद की सुविधा ही क्यों न हो।

भूखमरी इस कदर व्याप्त थी कि बरसात के समय चूहों के बिलों में पानी भर जाता और जब चूहे बाहर निकलते तो उन्हें मारकर लाना और खाना (भले ही हममें जुगुप्सा उत्पन्न हो पर ये कथा के मुताबिक सत्य हैं। आज़ादी के तुरंत बाद की बातें हैं)।

अन्धविश्वास इस तरह से व्यापत था कि बालक के बीमार हो जाने पर इलाज की बजाय ओझा-सोखा को दिखाया जाता था और कमजोरी तथा भूख की वजह से बालक की मृत्यु हो जाने पर गाँव की किसी मर चुकी महिला पर चुड़ैल का आरोप लगाकर उसके द्वारा खा लेने की घोषणा हो जाती। ओझा द्वारा एक तरह से मनोवैज्ञानिक शोषण किया जाता था। इस बात का बड़ा मार्मिक चित्रण किया गया है।

जातीय बहिष्कार का भी चित्रण किया गया है कि कैसे छोटी-सी बात पर ये कर दिया जाता था और तब तक वापसी नहीं हो पाती थी जब तक बहिष्कृत परिवार सूअर-भात की गोठ नहीं दे देता था। चमरिया माई को बलि देने भी आम बात थी। भले ही कर्जा लेना पड़े। गरीबी और अशिक्षा दोनों ही व्यक्ति को अंधविश्वासी बनाने हेतु पर्याप्त कारण हैं और जब ये दोनों एक साथ हो जाएँ तो 'करेला और नीम चढ़ा' वाली कहावत जीवंत जान पड़ती है।

वस्तु संग्रहण के लिए पशुओं के खोखले सींग काम में लिए जाते थे।इसके अलावा मृत्त पशु की तलवारनुमा पसली भी हथियार के रूप में इस्तेमाल की जाती थी।

एक तरफ प्राथमिक विद्यालय के एक अध्यापक द्वारा जातीय आधार पर भेदभाव किया जाता है तो दूसरे अध्यापक द्वारा इनकी प्रतिभा को पहचाना जाता है और आगे बढ़ने हेतु प्रेरित भी किया जाता है। एक अध्यापक का होना सार्थक करते हैं। आगे भी सुग्रीव सिंह जैसे क्षत्रिय अध्यापक न केवल पढ़ने हेतु प्रेरित करते हैं बल्कि बोर्ड के साथ-साथ इण्टर की फीस भी जमा करवाते हैं। जाहिर सन्देश है कि जातीय आधार पर किसी को भला या बुरा नहीं कहा जाना चाहिए। इन्हीं की कक्षा के हीरालाल (लुहार) इन्हें चमरवा कहकर पुकारते हैं जबकि क्षत्रिय पुत्र चिंतामणि सिंह का व्यवहार कभी गलत नहीं लगा। हाँ, गाँव के ब्राह्मण इन्हें ज्यादा पढ़-लिख जाने से 'पागल' जरूर घोषित करना चाहते थे और हर प्रकार से पढ़ाई रोकने का जतन करते थे।

अकाल का बड़ा मार्मिक वर्णन मिलता है। टोटा तो सबके ही था पर नाई और धोबी जैसी जातियाँ इस अकाल में सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं क्योंकि खेतीबाड़ी है नहीं और ये काम भी नकद न लेकर अनाज के बदले (शेखावाटी में इसे #खळाक कहते हैं) करते थे। ऐसे में लोग खुद भूखों मर रहे हैं तो इन्हें कहाँ से दें? ऐसा ही एक और परिवार था- नट। इसकी पुत्रवधू और दो जवान होती बेटियाँ अकाल से दो-दो हाथ करने खुद को झाड़ियों के झुरमुट में मनचलों के हाथ सौंप देती हैं।

जमींदार द्वारा ऐसे अवसर पर जमकर शोषण किया जाता था। 1 सेर के बदले सामान्यतः सवा सेर अनाज लिया जाता था पर अकाल के दौरान यही रेट सवाया से बढ़कर डेढ़ गुना हो जाती थी। तौल में भी बेईमानी का खेल खुलेआम होता था। देते समय कच्ची ईंट से और लेते समय पक्के बाँट से तौला जाता था। जिसके खिलाफ हड़ताल और लड़ाई भी हुई जिसमें परे हुए पशु की तलवारनुमा पसली से अछूत होने के भय से दलित महिलाएँ जीतती हैं और तौल सही होने लगता है।

बलि, मृत्युभोज, बाल विवाह, जातिवाद, धार्मिक कर्मकांड जैसी सामाजिक बुराइयों के स्याह पक्ष को खुलकर उद्घाटित किया गया है। ऐसे अवसर पर घरादि पर चित्र बनाने को
कला के संरक्षण के रूप में इंगित किया गया है। शायद लिपि से अंजान होने के कारण चित्रलिपि ही सबसे पहले भावनाओं की अभिव्यक्ति का जरिया बना था और शादी ऐसे अवसर पर इसे घर की दीवारों पर उकेरा जाता था।

निर्वंश, विधवा और अंग विकृत्त व्यक्ति को अपशगुनी माना जाता था। तुलसीराम खुद इससे भयंकर पीड़ित थे। कभी-कभार रात को घर से बाहर जाने की नौबत आती तो इन्हें ही भेजा जाता था। जिसके  पीछे इनके काना (दाहिनी आँख का न होना) होना पर्यापत कारण था। घरवालों का मानना था कि इस मनहूस को भले ही कुछ हो जाये बाकि घरवाले सुरक्षित रहने चाहिए। ये किसी भी सहृदय पाठक को अंदर तक झकझोरने के लिए काफी है। आज भी कहीं न कहीं ये कुप्रथा देखने में आ जाती है या लोग ऐसे लोगों के लिए इन अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते।

महाभारत, रामायण, त्रिपिटक, मृच्छकटिकम् , मानस, गीत गोविन्द के उद्धरण प्रस्तुत करना लेखक को अध्ययनशील साबित करता है।
घर से भाग जाने पर छठी कक्षा में प्रवेश के लिए घरवाले राजी होते हैं पर घर पर पढ़ने बैठते ही कामचोर का आक्षेप लगाया जाता है और लेखक का बालमन उस त्रासदी को झेलता है और पढता है। न केवल पढता है बल्कि नए प्रतिमान भी गढ़ता है।
कक्षा में बौद्ध धर्म को पढ़कर बुद्ध के प्रति लगाव बढ़ जाता है। डॉ. अम्बेडकर से पहली बार वास्ता तब पड़ता है जब घर से भागकर आजमगढ़ में छात्रावास में पहुँचते हैं।

भूतों का डर इस कदर व्यापत था कि एकबार साँप को मार देने पर भूतिया नागिन द्वारा बदला लेने के भय से भैंस बांधने के कमरे में चारपाई डालकर तीन साल से ज्यादा सोना पड़ा। भूतों से बचने हेतु गीता के पाठ की सलाह दी गई और उसके साथ संकड़े कमरे में बंधने वाली वो दुनिया की पहली भैंस होगी जो रोज सुबह गीता के पाँच श्लोक सुना करती थी।

माँ के साथ पिताजी के गलत व्यवहार ने इनके मन में उनके प्रति घनघोर नफरत भर दी जो अंततः हाथ उठाने तक पहुँच गई। इसके बाद पिताजी का माँ के प्रति व्यवहार बदल गया। दादी और माँ इनके चरित्र को गढ़ने वाली थीं। इनके कारण ये भी जबरदस्त अंधविश्वासी बन गए।

सुग्रीव सिंह गुरूजी द्वारा दिए गए 30 ₹ के साथ भागकर डी ए वी कॉलेज में प्रवेश लेने और उसके बाद होस्टल को बदहाल खाने और भ्रष्टाचार को बखूबी उकेरा गया है। जो हॉस्टल बच्चों की सुविधा हेतु निश्शुल्क होते थे उनमें 10 से 20 ₹ दिए बिना प्रवेश पाना असंभव था। ये आज की नहीं बल्कि हमारी पुरातन समस्या है।

15 अगस्त 1964 को आजमगढ़ से बनारस जाना और BHU के भवन को देखकर मन ही मन प्रण लेना कि इसमें पढ़ेंगे पर शाम को आजमगढ़ आते-आते वही सत्तू को टेंशन। कॉलेजेस और स्कूल्स में जातीय हिंसा और गुटबाजी का भी वर्णन मिलता है। संस्थापक की जाति किस प्रकार इनमें अपना वर्चस्व समझती है और न होने पर स्थापित करने का प्रयास करती है।

बाद में पता नहीं BHU में प्रवेश मिला या नहीं पर कालांतर में सेंटर फॉर रशियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, JNU में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत भी रहे और इस सेंटर के अध्यक्ष भी रहे।

दूसरा भाग (मणिकर्णिका) जल्द ही।

17 अगस्त 2018

मंद बनाम बंदबुद्धि

मंदबुद्धि बनाम बंदबुद्धि-

मंदबुद्धि होना उतना खतरनाक नहीं
जितना बंदबुद्धि होना।

एक प्रकृत्ति प्रदत्त
दूजी स्व-अर्जित।

एक निरीह
दूजी शातिर।

एक दया की पात्र
दूजी घृणा की।

एक को देखे प्यार उमड़े
दूजी से जुगुप्सा।

क्योंकि मंदबुद्धि होना खतरनाक नहीं
बंदबुद्धि होने से।

एक अतिरिक्त प्यार/स्नेह की आकाँक्षी
दूजी मानवता भक्षिणी।

एक रिश्तों की रक्षिणी
दूजी इनकी कलंकिणी।

एक बेवजह फिरती है
दूजी रिमोट से चलती है।

एक अनायास है देखती
दूजी वसनों को बेधती।

एक मृदुल
दूजी कर्कश।

कभी-कभी दोनों पत्थर भी फेंकती हैं
पर
पर...

एक तब जब माहौल प्रतिकूल हो
दूजी तब जब माहौल अनुकूल हो।

संख्या में एक वाली कम है
दूजी वाली भरकम है।

खतरा मंद से नहीं
बंद से माकूल है।

देश को बंद की नहीं
मंद की दरकार है।

#अभिनव_सरोवा

18.08.2018

Monday, 13 August 2018

इंसान

प्रकृत्ति ने दो हाथ और दो पैर वाले जीव को दो श्रेणियों में विभाजित किया एक नर एक मादा। पर उन दो श्रेणियों ने उस अद्भुत रचना को कई भागों में बाँट दिया। उसी में से एक श्रेणी है- अमीर और गरीब। इन दोनों में मात्र रुतबे, शौहरत, भोग-विलास के संसाधन और धन का ही अंतर नहीं है। मूल रूप से इनमें आचरण, व्यवहार और आपसी सहयोग की भावना में भी अंतर है। एक का घर बड़ा पर दिल छोटा होता है जबकि दूसरे का घर भले ही छोटा हो, दिल बड़ा होता है। संकट की घड़ी में आजू-बाजू खड़े रहने वालों में वो तबका होता है जिसे दोयम दर्जे का कहा जाता है।

एक के घर में या जीवन में रोमांच होता है दूसरे के घर या जीवन में रोमांच हो न हो, रोमांस जरूर होता है। एक जीवन को बिताता है और दूसरा इसे जीता है। टीवी पर प्रसारित होने वाले एक विज्ञापन के मुताबिक जीता वही है जो जीता है। खुदानखास्ता ही सही पर ये विज्ञापन इस दोयम दर्जे वाले की जिजीविषा और जीवटता के समकक्ष साबित हो रहा है।

पहले वाले दर्जे के लोगों में जहाँ आपसी प्रतिस्पर्द्धा और ईर्ष्या के साथ-साथ टाँग-खिंचाई की भावना बलवती होती है वहीं दूसरे वाले का संसार तो परस्पर सहयोग और प्यार के बलबूते पर आकाश की ऊँचाई को बौना साबित करता है।

आज भ्रम और भय के इस वातावरण में दूसरे समूह के लोग पहले से अपने संपर्क बढ़ाने के ख्याल में मरे जा रहे हैं। हमें चाहिए कि हम अपने गुणों को न केवल पहचानें बल्कि इन्हें प्रसारित भी करें। आपसी प्रेम, सहयोग, प्यार के बाजार को बढ़ाएं और नफरत, ईर्ष्या, पीछे छोड़ देने वाली प्रतिस्पर्द्धा को दिवालिया कर दें। शिक्षा के जरिये इन भावों को स्थापित करें।

कोयला

क्यों न गीले कोयले को सुलगाने के लिए पहली कक्षा के बालक की फटी कॉपी का कवर लेकर हवा की जाए। उजियारा फैलाना ही है तो कब तक यूँ ही पड़े रहेंगे, धूप के इंतजार में? धूप खिले न खिले, जलना ही बेहतर होगा। क्या होगा? कुछ देर धुँआ उठेगा और आखिर में धधक उठेंगे गीले कोयले भी। ऐसा है तो देर किस बात की?

तो करें सवाल।
क्या?
क्यों?
कैसे?
कब?
कहाँ?

यही तो वो कोयले हैं जिनकी नमी सुखाकर जलने और न केवल जलने बल्कि आँच देने के काबिल बनाना है।

आँच?

हाँ, आँच। वही आँच जिस पर रख तवा, सेंक रोटियाँ, किसी भूखे पेट की उदरपूर्ति की जाती है।

आखिर कब तक अपनी खुली आँखों से देखते रहेंगे किसी को पेट में घुटने देकर सोते हुए?

दिन के महत्त्वपूर्ण 6 घण्टे हमें देने वाले कब तक भूखे रहेंगे? कब तक अपनी आँखों से हमारी ओर देखते रहेंगे? वो न कह सकते कि हम भूखे हैं लेकिन उसकी निरीह आँखों में झाँककर हम ये भी न जान पाएं कि इसे खुराक चाहिए तो लानत है हमारी डिग्री और काबिलियत पर।

अभिनव सरोवा (हिंदी अध्यापक)

#सत्र_2018_19

Thursday, 9 August 2018

हाँड़ी

हाँड़ी ही तो है-

तब भी थी
अब भी है।

कभी गले में,
कभी कंधे पर।

कभी जोर-जबरदस्ती से,
कभी दिमाग की नसबंदी से।

बाँधते तब भी अपने हाथ से,
आज भी अपने हाथ से।

कभी घोर पीड़ित थे
अभी बड़े प्रसन्न हैं।

कल को जब लेगी हिसाब
तो हाँड़ी के सिवाय क्या
देने को.....?

अभिनव सरोवा

9 अगस्त 2018

विश्व आदिवासी दिवस