Wednesday, 11 December 2019

चुनिंदा शब्दावली

                            चुनिंदा शब्दावली

कुछ चुनिंदा शब्द जिनके प्रयोग से लेखन और अभिव्यक्ति सशक्त होगी। उम्मीद है आपको हमारा ये प्रयास पसंद आएगा। आपके सुझाव और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में....

अंगीकार- स्वीकार, मंजूर, ग्रहण

अंतरंग- भीतरी, अत्यंत समीपी/निकटस्थ, घनिष्ठ, आत्मीय, अंतःकरण का, मानसिक (अंतर्+अंग)

अधीर- धैर्यरहित, उद्विग्न, खिन्न,  व्याकुल, बेचैन, विह्वल, अप्रसन्न, कातर, आकुल।

अध्येता- अध्ययन करने वाला, पाठक, छात्र।

अनधिकार- जिस पर अधिकार न हो, प्रभुत्व न होना, बेबसी, लाचारी।

अनागत- अनुपस्थित, न आया हुआ।

अनादर- निरादर, अप्रतिष्ठा, बेइज्जती।

अनाश्रित- निरवलम्ब(निर्+अवलंब), बेसहारा, निराश्रय।

अनासक्त- किसी विषय पर आसक्त न होने वाला, निर्लेप।

अनाहूत- जिसे बुलाया न गया हो, अनिमंत्रित।

अनिंद्य- जो निंदा के योग्य न हो, निर्दोष।

अनवरत- लगातार, सतत, निरंतर, हमेशा।

अंतर्दृष्टि- प्रज्ञा, बुद्धि, इल्म, आंतरिक ज्ञान, अंतर्ज्ञान, एकाग्रता, मेधा, समझ।

अकथनीय- न कहने योग्य, अवर्णनीय, अनिवर्चनीय।

अकर्मण्य- आलसी, काम न करने वाला।

अकिंचन- गरीब, निर्धन, दरिद्र, कंगाल।

अक्षुण्ण- एक, न टूटा हुआ, सारा, समस्त।

अगणित- जिसे गिना न जा सके, बेशुमार, सामान्य।

अतुल्य- अनुपम, बेजोड़, असमान।

अथक- बिना थके।

अदावत- दुश्मनी, बैर, शत्रुता, विरोध।

अद्यतन- अब तक का, अंग्रेजी में update

आगाह- जानकार, वाकिफ, सचेत, सावधान।

आतिथ्य-मेहमाननवाजी, अतिथि का सत्कार।

आत्मगौरव- अपनी बड़ाई या प्रतिष्ठा का ध्यान रखना, आत्मसम्मान।

आनुषंगिक- किसी बड़े कार्य के साथ थोड़े प्रयास में सधने वाला कार्य, प्रासंगिक।

आबरू- इज्जत, प्रतिष्ठा, बड्डपन, मान, मर्यादा।

आबाद- बसा हुआ।

आभ्यंतर- भीतरी, आंतरिक।

आभिजात्य- कुलीनों के गुण/लक्षण, कुल-संस्कार, कुलीनता।

आमुख- प्रस्तावना या भूमिका।

आदाब- कायदा, लिहाज, मान, नमस्कार, सलाम।

आरजू- इच्छा, कामना, वाञ्छा, अनुनय, विनय, विनती, आग्रह, प्रार्थना, इल्तजा, मिन्नत।

आरूढ़- सवार, चढ़ा हुआ।

आरोग्य- स्वास्थ्य, तंदुरुस्ती, नीरोग, स्वस्थ रहने का भाव।

आरोह- ऊपर की तरफ चढ़ना।

आर्तनाद/आर्तस्वर- दुःखसूचक शब्द, करुण पुकार, क्रंदन।

आलंबन- सहारा, आश्रय, अवलंब।

आविर्भूत- प्रकाशित, प्रकट, उत्पन्न, उदित।

आसन्न- निकट आया हुआ, प्राप्त, उपस्थित।

आह्लाद- आनंद, हर्ष, प्रसन्नता।

आह्वान- बुलावा, पुकार।

इंतखाब- चुनाव, निर्वाचन, पसंद।

इंतहा- चरम सीमा, हद, अंत, समाप्ति, परिणाम, फल।

इकराम- पारितोषिक, इज्जत, आदर, इनाम।

इकरार- प्रतिज्ञा, करार, वादा।

इजहार- जाहिर करना, प्रकाशन, प्रकटीकरण, गवाही, सत्य।

इतर- दूसरा, अन्य, अपर।

इतरेतर- परस्पर, एक-दूसरे के साथ।

इत्तेफाक- मेल-मिलाप, एका, सहमति,  संयोग, मौका, अवसर।

इत्तला- सूचना, खबर।

इनायत- कृपा, दया, अनुग्रह, एहसान।

इम्तहान- परीक्षा, जाँच।

इरशाद- आज्ञा, हुक्म, फरमान, आदेश।

इल्जाम- अपराध, अभियोग, दोषारोपण, दोष, आरोप।
इसरार- हठ, जिद्द, कुतर्क।

उऋण- ऋण से मुक्त, जिसका ऋण से उद्धार हो गया हो।

उत्कंठा- प्रबल इच्छा, तीव्र अभिलाषा।

उत्कट- तीव्र, विकट, उग्र।

उत्कर्ष- समृद्धि, उन्नति, अधिकता, श्रेष्ठता, उत्तमता, बड़ाई।

उत्कीर्ण- लिखा हुआ, खुदा हुआ।

उत्कृष्ट- उत्तम, श्रेष्ठ, सबसे भला।

उत्क्षिप्त- फेंका हुआ, हटाया हुआ, उछाला हुआ।

उत्सर्ग- त्याग, बलिदान, न्योछावर, छोड़ना।

उदात्त- श्रेष्ठ,बड़ा, समर्थ, योग्य।

उद्दाम- बंधनरहित, स्वतंत्र,महान, गंभीर, निरंकुश, उग्र।

उद्धार- मुक्ति, छुटकारा, निस्तारण, उन्नति, समृद्धि।

उद्यत- तैयार, तत्पर,सन्नद्ध, प्रस्तुत, मुस्तैद, उठाया हुआ।

उद्यम- प्रयत्न, प्रयास, उद्योग, मेहनत, कामधंधा, रोजगार।

उद्वेग- बेचैनी, घबराहट, आवेश, जोश, तरंग।

उपकार- हितसाधन, भलाई, नेकी, लाभ, फायदा।

उपदेश- सीख, नसीहत, शिक्षा,गुरुमंत्र।

उपसंहार- समाप्ति, खातमा, संहरण, परिहार।

उपार्जित- कमाया हुआ, परिश्रम से प्राप्त किया हुआ, हासिल किया हुआ।

उपालम्भ- उलाहना, शिकायत, राजस्थानी में ओळमा।

उपेक्षा- उदासीनता, लापरवाही, विरक्ति, तिरस्कार, अवहेलना, परित्याग।

उम्दा- श्रेष्ठ, विशिष्ट, भला।

उलफत- प्रेम, आशनाई, वफा, प्यार।

उल्था-एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपांतरण या अनुवाद, भाषान्तर, अनुवाद, तरजुमा।

उसूल- सिद्धांत।

ऊर्जस्वित- ऊपर की ओर चढ़ा हुआ, बहुत बढ़ा हुआ।

ऊर्जस्वी-बलवान, शक्तिशाली, तेजवान, प्रतापी।

एकाग्र- एक तरफ स्थिर, निरत, एकरत, एक में लीन, जिसका ध्यान एक तरफ लगा हो।

एहतियात- सावधानी, ख्याली, होशियारी, परहेज।

ऐक्य- एकत्व, एकता का भाव, एका, मेल, एक राय, एकता।

ऐच्छिक- इच्छानुसार, जो अपनी इच्छा पर हो।

ऐब- दोष, खोट, नुक्स, अवगुण, कलंक।

ओजस्वी- शक्तिवान, प्रभावशाली।

ओहदा- पद, स्थान।

औचक- अचानक, एकाएक, सहसा।

कथोपकथन- आपस में वार्तालाप, बातचीत, वर्णन।

कपोलकल्पना-मनगढ़ंत बात, बनावटी बात, गप्प।

करीम- कृपालु, दयालु।

कर्मण्य- खूब काम करने वाला, उद्योगी, प्रत्यनशील, कुशल, दक्ष, चतुर।

कवायद- अभ्यास, नियम, व्यवस्था।

कशिश- आकर्षण,खिंचाव।

काबिलियत- योग्यता, पांडित्य, विद्वता, लियाकत।

कारगर- प्रभावजनक, असरकारक, उपयोगी।

कारुणिक- दयालु, कृपालु।

किंकर्तव्यविमूढ़-जिसे ये न सूझे कि अब क्या करें क्या न करें। हक्का-बक्का, भौंचक्का।

किफायत- कमख़र्ची, संभलकर खर्च करना।

कीर्तिमान- यशस्वी, नेकनाम, मशहूर, विख्यात।

किस्मत-भाग्य,तकदीर, नसीब, करम।

कुसाइत- बुरा मुहूर्त, बुरी साइत, कुसमय,अनुपयुक्त समय।

कृतज्ञ- उपकार को मानने वाला, एहसान मानने वाला, एहसानमंद।

कृतघ्न- उपकार को न मानने वाला, एहसान न मानने वाला, एहसानफरामोश।

कृत्रिम- नकली, बनावटी, छद्म, मानव निर्मित।

कौतिगहार- तमाशबीन, कौतुक देखने वाला।

खटका- डर, भय, आशंका, चिंता, फिक्र।

खफा-नाराज, अप्रसन्न, क्रुद्ध, रूष्ट।

खबर- समाचार, वृतांत, हाल।

खबरदार- होशियार, सजग, सावधान।

खबरनवीस- समाचार लेखक।

खल- बुरा, नीच, अधम, पापी, क्रूर, दुर्जन, दुष्ट।

खरा- मिलावट रहित, विशुद्ध, बढ़िया, करारा, खालिस।

खाकसार- नाचीज़, अकिंचन, तुच्छ।

खातिर- आदर, सम्मान, के लिए।

खामी- कमी, त्रुटि, दोष, कच्चापन।

खालसा- सरकारी, राजकीय।

खारिज- बाहर किया हुआ, निकाला हुआ,बहिष्कृत, रद्द किया हुआ, जिस अभियोग पर सुनवाई से इनकार किया गया हो।

खाविंद- पति, मालिक,स्वामी।

खासियत- स्वभाव, प्रकृति, आदत, गुण।

खिताब- पदवी, उपाधि।

खिदमत- सेवा।

तैयारकर्त्ता- अभिनव सरोवा
9314911782

खिराज- राजस्व, कर।

खिलाफ- विरुद्ध, उलटा, विपरीत।

खुदगर्जी- स्वार्थपरता, मतलब।

खुदमुख्तार- जिस पर किसी का दबाव न हो, स्वतंत्र, स्वच्छंद, आज़ाद।

खुदी- अहंकार, अभिमान, शेखी, घमंड।

खुफिया- गुप्त, पोशीदा, छिपा हुआ।

खुमार- मद, नशा।

खुशमिजाज- सदा प्रसन्न रहने वाला, हँसमुख।

खूबसूरत- सुंदर, रूपवान।

खैरख्वाह- भला चाहने वाला, शुभचिंतक।

खैरियत- कुशल-क्षेम, राजीखुशी, भलाई, कल्याण।

गनीमत- संतोष की बात।

गफलत- असावधानी, लापरवाही, बेखबरी, भूल, चूक, चेतना का अभाव।

गाम्भीर्य- गंभीरता, गहराई, स्थिरता, गहनता, गूढ़ता।

गिरा- वाणी, जीभ,जबान, जिह्वा, वचन, कलाम।

गीला- शिकायत,उलाहना।

गुलज़ार- बाग, हराभरा, आनंद और शोभायुक्त, रौनक।

गुस्ताख़- बड़ों का संकोच न रखने वाला, ढीठ, अशालीन, अशिष्ट, बेअदब, असभ्य, बेगैरत, बेमुरव्वत।

गुस्ताखी-धृष्टता, ढिठाई, अशिष्टता, बेअदबी।

गैरत- लज्जा, हया, शर्म।

ग़ैरमुनासिब/गैरवाजिब- अनुचित, अयोग्य।

गौरव- बड्डपन, महत्त्व, सम्मान, गरिमा, उत्कर्ष।

चहारदीवारी- (फ़ारसी शब्द) किसी स्थान के चारों तरफ की दीवार, प्राचीर।

छवि- शोभा, सौंदर्य,कांति, प्रभा।

जूस्तजू- तलाश, खोज, आरजू।

ठेठ- निपट, बिलकुल, निरा, निर्लिप्त, निर्मल, शुरू, आरंभ।

ढंग- प्रणाली, शैली, ढब, रीति, प्रकार, तरह, किस्म, युक्ति, रचना, बनावट, गढ़न, उपाय, उचित रास्ता।

ढाढ़स- धैर्य, आश्वासन, तसल्ली, दृढ़ता, साहस, हिम्मत।

ढिठाई- धृष्टता, गुस्ताखी, निर्लज्जता, अनुचित साहस।

तकरार- हुज्जत, विवाद, झगड़ा, टंटा।

तकरीर- भाषण, बहस, दलील, जिरह, बातचीत।

तकलीफ- कष्ट, क्लेश, दुःख, विपत्ति, मुसीबत।

तकल्लुफ़-केवल शिष्टाचारवश कष्ट उठाकर कोई काम करना, शिष्टाचार,औपचारिक काम।

तजवीज- सम्मति, राय, फैसला, निर्णय, ख्याल, अनुमान, विचार।

तत्पर- उद्यत, तैयार, मुस्तैद, सन्नद्ध।

तत्त्वावधान- जाँच-पड़ताल, देखरेख, निरीक्षण।

तद्रूप(तत्+रूप)- समान, सदृश, उसी रूप का।

तन्मय- जो किसी काम में बहुत मग्न हो, लवलीन, दत्तचित्त, एकाग्रचित्त।

तफसील- विस्तार, विस्तृत वर्णन, टीका, तशरीह, कैफियत, ब्यौरा।

तरजुमा-अनुवाद, भाषान्तर, उल्था।

तरजीह- किसी को अन्य से अच्छा समझना या प्रधानता देना।

तस्कीन- तसल्ली, सांत्वना।

तसदीक- सचाई की परीक्षा या निश्चय, प्रमाणों के माध्यम से पुष्टि करना, समर्थन, साक्ष्य, गवाही, सचाई।

तहकीकात- किसी घटना की ठीक-ठाक बातों की खोज, अनुसंधान, जाँच, पड़ताल, छानबीन।

तहजीब- सभ्यता, शिष्टता।

ताजीरात- दंड संबंधी कानूनों का संग्रह।

तानाशाही- अधिकारों का मनमाना प्रयोग, स्वेच्छाचारिता, निरंकुशता, अधिनायकतंत्र।

तामील- पालन, पालना के लिए पाबंद करना।

तारीफ- बखान, प्रशंसा, श्लाघा, बड़ाई, गुण, विशेषता।

तालीम- शिक्षा, उपदेश, अभ्यास।

तासीर- असर, प्रभाव।

तीमारदारी- रोगियों की सेवा, परिचर्या।

तैनात- नियत, नियुक्त, मुकर्रर।

त्वरित- जल्दी से, वेगपूर्वक।

दत्तक- औरस संतान के अभाव में शास्त्रीय विधि से स्वीकार किया गया पुत्र।

दस्तूर- नियम, कायदा, रीत, रिवाज, रस्म, प्रथा।

दावा- हक, अधिकार, जोर, दबाव, अभियोग।

दास्तान- वृत्तांत, हाल, कथा, किस्सा।

दीप्ति- प्रकाश, उजाला, रोशनी, प्रभा, आभा, चमक, द्युति, कांति, शोभा, छवि।

नियामक- नियम तय करने वाला,व्यवस्था या विधान करने वाला, नियंत्रण करने वाला।

निष्ठुर- क्रूर, बेरहम, कड़ा, कठिन, सख्त।

निष्णात- विज्ञ, कुशल, प्रवीण, दक्ष, निपुण, माहिर, उस्ताद।

मकतूल-पीड़ित।

निस्संदेह- अवश्य, जरूर, बेशक, जिसमें कोई सन्देह न हो।

निहित- विद्यमान, स्थापित, रखा हुआ, शामिल।

नुमाइश- प्रदर्शन, दिखावा।

नुमाइंदा- प्रतिनिधि, डेलीगेट।

नैतिक- नीति संबंधी।

नैसर्गिक- प्राकृतिक, कुदरती, स्वाभाविक।

पक्ष- पार्श्व, तरफ, मत, प्रवृत्ति, पहलू, सिद्धांत।

परस्पर- आपस में, एक-दूसरे के साथ, आपसी।

पराकाष्ठा- सीमांत, चरम सीमा, हद, अंत।

परिष्कार- सफाई, स्वच्छता, निर्मलता, शोभा, सजावट।

पुनरुत्थान- फिर से उठना, पतन के बाद फिर से उठना, उन्नति करना।

पुलिंदा- कागज या कपड़े की गड्डी, बंडल, गट्ठर।

परामर्श- सलाह, मंत्रणा, युक्ति, विवेचन, विचार, मशविरा।

प्रखर- तेज, तीखा, तीक्ष्ण, प्रचंड, धारदार, पैना।

कोमलता- सुकुमारता, नजाकत।

नज़ीर- उदाहरण, मिसाल, दृष्टांत, नमूना, प्रतिबिंब, प्रतिमान।

प्रगल्भ- आत्मविश्वास से पूर्ण, अभिमानी,साहसी, प्रत्युपन्न मतिवाला, हाजिरजवाब, चतुर, होशियार, प्रतिभाशाली, निर्भय।

प्रज्ञा- अंतर्दृष्टि, अंतर्ज्ञान, ज्ञान, एकाग्रता, बुद्धि, मेधा, समझ।

प्रयोजन- काम, कार्य, अर्थ, उद्देश्य, अभिप्राय, मतलब, आशय, उपयोग, व्यवहार।

फ़ज़ल- अनुग्रह, कृपा, दया, अनुकंपा,रहम।

फरिश्ता- देवदूत।

सूची- फेहरिस्त, लिस्ट।

बख्शिश- दान, उदारता, क्षमा।

मुनासिब- उचित, सही।

भावप्रवण- भावुक।

भीरू- डरपोक, कायर।

शगल- शौक, चाव, रुचि।

जनसंख्या- मर्दुमशुमारी, आबादी।

मशक्कत- मेहनत, श्रम, परिश्रम।

मशहूर- प्रख्यात, प्रसिद्ध, विख्यात।

माकूल-उचित, वाजिब, ठीक, लायक, योग्य, अच्छा, बढ़िया।

मातहत- अधीनस्थ।

माहात्म्य- महिमा,गौरव, बड़ाई, आदर, मान।

मिजाज- स्वभाव, तासीर, प्रवृत्ति, तबियत, दिल, शरीर या मन की दशा।

मुगालता- धोखा, कपट, छल।

रियाया- जनता, प्रजा।

अंकुश- प्रतिबंध, शासन, दबाव, रोक।

पुरजोर- ओजपूर्ण, जोरदार।

तैयारकर्त्ता- अभिनव सरोवा
9314911782

लजीज- स्वादिष्ट।

अदब- शिष्टाचार, सभ्यता।

अप्रितम- सुंदर, अद्भुत।

अपरिमित- बहुत अधिक, अथाह।

सरोकार- परस्पर सम्बंध, लगाव, वास्ता।

सहिष्णुता- सहनशीलता।

शालीन- विनीत, नम्र, लज्जाशील।

बेइंतहा- बहुत अधिक।

बेकरार- व्याकुल, व्यग्र।

अदीब- लेखक।

वकार- गरिमा।

जमाल- सौंदर्य।

मुहिम- कठिन काम, बड़ा काम।

प्रदत्त- प्रदान किया हुआ, दिया हुआ।

अमूमन- अधिकतर, अधिकांश, लगभग।

अभिनव सरोवा
(हिंदी शिक्षक)
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय-पीथूसर, झुंझुनूं

Sunday, 1 December 2019

मुर्दहिया

पुस्तक- मुर्दहिया
लेखक- डॉ. तुलसीराम (प्रो. जेएनयू)
विधा- आत्मकथा

कहने को तो मुर्दहिया एक शब्द है पर लेखक के नजरिये से देखें तो इसके अर्थ बड़े गहन हैं। गाँव के बाहर का ऐसा स्थान जहाँ मृत व्यक्ति का अंतिम क्रियाकर्म और पशुओं के दोहरे क्रियाकर्म संपन्न होते थे। पहले इनकी खाल उतारी जाती और तत्पश्चात गिद्ध, सियारों द्वारा माँस भक्षण। वास्तव में देखा जाये तो गिद्ध और सियार ही तो थे जो मुर्दहिया को आबाद किये हुए थे। वरना मानव तो साँझ के बाद से उधर देखना तो दूर सोचना भी पसंद नहीं करते थे। कारण था भूतों का भय।  लेखक के शब्दों में उनकी बस्ती के किसी भी व्यक्ति की जीवनी या आत्मकथा लिखी जाती तो यकीनन उसका नाम मुर्दहिया ही होता। पता नहीं कितने मुर्दा दफन थे अंदर?

इनका गाँव धरमपुर राहुल सांकृत्यायन के पैतृक गाँव 'कनैला' और मुलायम सिंह के पूर्व संकटमोचक अमरसिंह के गाँव 'तिरवां' के पड़ोस में आबाद था। कहने को आबाद था पर असल में बसती थी कुछ ज़िंदा लाशें, चलते-फिरते कंकाल, माँ की छाती को चूसते निरीह बच्चे और संपूर्ण रूप से बेरोजगार युवा पीढ़ी।

  आत्मकथा का पहला खंड लेखक तुलसीराम के जन्म से लेकर 10 वीं पास करके घर से भागकर डी ए वी इण्टर कॉलेज में प्रवेश लेने तक की कथा है। उसके बाद का खंड मणिकर्णिका के नाम से लिखा गया है।  (पढ़ना शेष है)। दलित बस्ती में अपने परिवार की बड़ी सदस्य संख्या के चलते चैत्र आने तक लगभग फाकों की नौबत आ ही जाया करती थी। कहाँ जाए, क्या करें, किससे कहें, वाली स्थिति बन पड़ती थी। लगभग हर घर, गाँव की यही स्थिति थी।

  शिक्षा की तो बात ही क्या कहें- एक चिट्ठी आने पर पाँचवीं पास उस लड़के की खोजबीन शुरू हो जाती थी जिसे बाहर वाले ही नहीं बल्कि घर वाले भी एक आँख न होने के कारण *कनवा* कहकर पुकारते थे। ये संबोधन उसके लिए घनघोर पीड़ादायक था पर...?
ऐसे में वह बालक जब 'पावबल मुर्बिदास' की जटिल गुत्थी को सुलझाता है और इसे 'पावै बलमू रविदास' के रूप में विश्लेषित करता हटो गाँव भर में उसकी पूछ बढ़ जाती है। एकबार भैंस से गिर जाने पर गाँवभर की नवविवाहिताएं (जो परदेश में रहने वाले अपने पति को पत्र लिखवाया करती थी) उसे बुलाकर या घर जाकर ऐसा न करने के लिए कहती हैं। भले ही उसके मूल में खुद की सुविधा ही क्यों न हो।

भूखमरी इस कदर व्याप्त थी कि बरसात के समय चूहों के बिलों में पानी भर जाता और जब चूहे बाहर निकलते तो उन्हें मारकर लाना और खाना (भले ही हममें जुगुप्सा उत्पन्न हो पर ये कथा के मुताबिक सत्य हैं। आज़ादी के तुरंत बाद की बातें हैं)।

अन्धविश्वास इस तरह से व्यापत था कि बालक के बीमार हो जाने पर इलाज की बजाय ओझा-सोखा को दिखाया जाता था और कमजोरी तथा भूख की वजह से बालक की मृत्यु हो जाने पर गाँव की किसी मर चुकी महिला पर चुड़ैल का आरोप लगाकर उसके द्वारा खा लेने की घोषणा हो जाती। ओझा द्वारा एक तरह से मनोवैज्ञानिक शोषण किया जाता था। इस बात का बड़ा मार्मिक चित्रण किया गया है।

जातीय बहिष्कार का भी चित्रण किया गया है कि कैसे छोटी-सी बात पर ये कर दिया जाता था और तब तक वापसी नहीं हो पाती थी जब तक बहिष्कृत परिवार सूअर-भात की गोठ नहीं दे देता था। चमरिया माई को बलि देने भी आम बात थी। भले ही कर्जा लेना पड़े। गरीबी और अशिक्षा दोनों ही व्यक्ति को अंधविश्वासी बनाने हेतु पर्याप्त कारण हैं और जब ये दोनों एक साथ हो जाएँ तो 'करेला और नीम चढ़ा' वाली कहावत जीवंत जान पड़ती है।

वस्तु संग्रहण के लिए पशुओं के खोखले सींग काम में लिए जाते थे।इसके अलावा मृत्त पशु की तलवारनुमा पसली भी हथियार के रूप में इस्तेमाल की जाती थी।

एक तरफ प्राथमिक विद्यालय के एक अध्यापक द्वारा जातीय आधार पर भेदभाव किया जाता है तो दूसरे अध्यापक द्वारा इनकी प्रतिभा को पहचाना जाता है और आगे बढ़ने हेतु प्रेरित भी किया जाता है। एक अध्यापक का होना सार्थक करते हैं। आगे भी सुग्रीव सिंह जैसे क्षत्रिय अध्यापक न केवल पढ़ने हेतु प्रेरित करते हैं बल्कि बोर्ड के साथ-साथ इण्टर की फीस भी जमा करवाते हैं। जाहिर सन्देश है कि जातीय आधार पर किसी को भला या बुरा नहीं कहा जाना चाहिए। इन्हीं की कक्षा के हीरालाल (लुहार) इन्हें चमरवा कहकर पुकारते हैं जबकि क्षत्रिय पुत्र चिंतामणि सिंह का व्यवहार कभी गलत नहीं लगा। हाँ, गाँव के ब्राह्मण इन्हें ज्यादा पढ़-लिख जाने से 'पागल' जरूर घोषित करना चाहते थे और हर प्रकार से पढ़ाई रोकने का जतन करते थे।

अकाल का बड़ा मार्मिक वर्णन मिलता है। टोटा तो सबके ही था पर नाई और धोबी जैसी जातियाँ इस अकाल में सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं क्योंकि खेतीबाड़ी है नहीं और ये काम भी नकद न लेकर अनाज के बदले (शेखावाटी में इसे #खळाक कहते हैं) करते थे। ऐसे में लोग खुद भूखों मर रहे हैं तो इन्हें कहाँ से दें? ऐसा ही एक और परिवार था- नट। इसकी पुत्रवधू और दो जवान होती बेटियाँ अकाल से दो-दो हाथ करने खुद को झाड़ियों के झुरमुट में मनचलों के हाथ सौंप देती हैं।

जमींदार द्वारा ऐसे अवसर पर जमकर शोषण किया जाता था। 1 सेर के बदले सामान्यतः सवा सेर अनाज लिया जाता था पर अकाल के दौरान यही रेट सवाया से बढ़कर डेढ़ गुना हो जाती थी। तौल में भी बेईमानी का खेल खुलेआम होता था। देते समय कच्ची ईंट से और लेते समय पक्के बाँट से तौला जाता था। जिसके खिलाफ हड़ताल और लड़ाई भी हुई जिसमें परे हुए पशु की तलवारनुमा पसली से अछूत होने के भय से दलित महिलाएँ जीतती हैं और तौल सही होने लगता है।

बलि, मृत्युभोज, बाल विवाह, जातिवाद, धार्मिक कर्मकांड जैसी सामाजिक बुराइयों के स्याह पक्ष को खुलकर उद्घाटित किया गया है। ऐसे अवसर पर घरादि पर चित्र बनाने को
कला के संरक्षण के रूप में इंगित किया गया है। शायद लिपि से अंजान होने के कारण चित्रलिपि ही सबसे पहले भावनाओं की अभिव्यक्ति का जरिया बना था और शादी ऐसे अवसर पर इसे घर की दीवारों पर उकेरा जाता था।

निर्वंश, विधवा और अंग विकृत्त व्यक्ति को अपशगुनी माना जाता था। तुलसीराम खुद इससे भयंकर पीड़ित थे। कभी-कभार रात को घर से बाहर जाने की नौबत आती तो इन्हें ही भेजा जाता था। जिसके  पीछे इनके काना (दाहिनी आँख का न होना) होना पर्यापत कारण था। घरवालों का मानना था कि इस मनहूस को भले ही कुछ हो जाये बाकि घरवाले सुरक्षित रहने चाहिए। ये किसी भी सहृदय पाठक को अंदर तक झकझोरने के लिए काफी है। आज भी कहीं न कहीं ये कुप्रथा देखने में आ जाती है या लोग ऐसे लोगों के लिए इन अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते।

महाभारत, रामायण, त्रिपिटक, मृच्छकटिकम् , मानस, गीत गोविन्द के उद्धरण प्रस्तुत करना लेखक को अध्ययनशील साबित करता है।
घर से भाग जाने पर छठी कक्षा में प्रवेश के लिए घरवाले राजी होते हैं पर घर पर पढ़ने बैठते ही कामचोर का आक्षेप लगाया जाता है और लेखक का बालमन उस त्रासदी को झेलता है और पढता है। न केवल पढता है बल्कि नए प्रतिमान भी गढ़ता है।
कक्षा में बौद्ध धर्म को पढ़कर बुद्ध के प्रति लगाव बढ़ जाता है। डॉ. अम्बेडकर से पहली बार वास्ता तब पड़ता है जब घर से भागकर आजमगढ़ में छात्रावास में पहुँचते हैं।

भूतों का डर इस कदर व्यापत था कि एकबार साँप को मार देने पर भूतिया नागिन द्वारा बदला लेने के भय से भैंस बांधने के कमरे में चारपाई डालकर तीन साल से ज्यादा सोना पड़ा। भूतों से बचने हेतु गीता के पाठ की सलाह दी गई और उसके साथ संकड़े कमरे में बंधने वाली वो दुनिया की पहली भैंस होगी जो रोज सुबह गीता के पाँच श्लोक सुना करती थी।

माँ के साथ पिताजी के गलत व्यवहार ने इनके मन में उनके प्रति घनघोर नफरत भर दी जो अंततः हाथ उठाने तक पहुँच गई। इसके बाद पिताजी का माँ के प्रति व्यवहार बदल गया। दादी और माँ इनके चरित्र को गढ़ने वाली थीं। इनके कारण ये भी जबरदस्त अंधविश्वासी बन गए।

सुग्रीव सिंह गुरूजी द्वारा दिए गए 30 ₹ के साथ भागकर डी ए वी कॉलेज में प्रवेश लेने और उसके बाद होस्टल को बदहाल खाने और भ्रष्टाचार को बखूबी उकेरा गया है। जो हॉस्टल बच्चों की सुविधा हेतु निश्शुल्क होते थे उनमें 10 से 20 ₹ दिए बिना प्रवेश पाना असंभव था। ये आज की नहीं बल्कि हमारी पुरातन समस्या है।

15 अगस्त 1964 को आजमगढ़ से बनारस जाना और BHU के भवन को देखकर मन ही मन प्रण लेना कि इसमें पढ़ेंगे पर शाम को आजमगढ़ आते-आते वही सत्तू को टेंशन। कॉलेजेस और स्कूल्स में जातीय हिंसा और गुटबाजी का भी वर्णन मिलता है। संस्थापक की जाति किस प्रकार इनमें अपना वर्चस्व समझती है और न होने पर स्थापित करने का प्रयास करती है।

बाद में पता नहीं BHU में प्रवेश मिला या नहीं पर कालांतर में सेंटर फॉर रशियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, JNU में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत भी रहे और इस सेंटर के अध्यक्ष भी रहे।

अभिनव सरोवा
17 अगस्त 2018