Saturday, 9 February 2019

शहीद- भाग बारह

शहीद- भाग बारह

घर भर गया
जिन्दा लाशों से
कुछ लाशे हैं
अभी भी अपने घरों में।
नहीं हो रहा साहस
बाहर निकलने का।

छिपा बैठा है
एक लुहार
अपनी गाड़ी तले,
घन उठाने वाला
नहीं उठ पा रहा
आज खुद।

कोयले भी तो
नहीं सुलगा पाया
क्योंकि जल रही है आग
सीने में
धौंकनी वाली तो
बुझ भी जाए
पर ये कैसे बुझे।

पैरों के पास नहीं है
घन, हथौड़ी या संडासी
है केवल एक बोतल
जिसमें कभी दी थी
डालकर
थोड़ी रम
उसने।

आज रम तो नहीं
पर बोतल तो है
खाली ही सही
कम से कम
उसके स्पर्श का
एक एहसास तो है।

गोद में बोतल नहीं
जैसे समाया हो
वो खुद ही।
आहिस्ता-आहिस्ता
फिर रहे हाथ
जैसे सहला रहे हों
गाल उसके
उँगलियाँ
फिर रही हों
बालों में 'उसके'

याद आ रहा बार-बार
वही दृश्य
स्मृत्ति में-
कि बाबा,
आऊँगा अबकी बार
तो दूँगा पूरी बोतल।

हाय! नहीं चाहिए मुझे
छोड़ दूँगा अब
बस एकबार
तू आजा।

अभिनव सरोवा
27 जनवरी 2019

मुझे क्या बनना है

मुझे क्या बनना है...

डाल से टूटा काँटा
हूँ अकेला
रखता हूँ माद्दा
दर्द देने का
तो
कर सकता
पहरेदारी खेत की भी।

गुच्छे से बिछड़ा तिनका
हूँ अकेला
ला सकता हूँ
आँख में आँसू
तो
बन सकता हूँ
डूबते का सहारा भी।

बोरी से बिखरा
हूँ दाना
सड़ सकता हूँ
गोदाम में
तो
मिटा सकता हूँ
किसी की भूख भी।

दरिया से छिटकी
हूँ बूँद
मिल सकती हूँ
गंदे नाले में
तो
कर सकती हूँ
कोई गला तर।

शाख से टूटा
हूँ पुष्प
सज सकता हूँ
मृत देह पर
तो
खिला सकता हूँ
किसी मायूस चेहरा भी।

नस से निकला
खून मैं
फैला सकता हूँ वैमनस्य
तो
दौड़ सकता हूँ
किसी की नसों में भी।

लाय से बिछड़ी
मैं चिंगारी
फूँक सकती हूँ
घर भी
तो
जला सकती हूँ
किसी का चूल्हा भी।

अभिनव सरोवा
8 फरवरी 2019

Friday, 8 February 2019

घास

तुमसे कभी न मरा था, न कभी मरूँगा।
तुम्हारी ये तृष्णा, कभी न पूरी करूँगा।।

कुचलोगे तुम, जितना ऊपर से।
फैलाऊंगा जड़ें, उतनी अंदर से।।

बिखर जाऊँ भले ही, हो जाऊँ तिनके-तिनके।
उनको खूब खलूँगा, दिल काले हैं जिनके।।

हर बार उग आऊँगा, कर दूँगा हर प्रयास विफल।
चैन न लूँगा तब तक,  कर दूँ न अंदर से विकल।।

बालू के टीले से, पत्थरों के ढेर से।
निकल आऊँगा बार-बार, समंदर के तीर से।।

कुचलना तुम्हारी फितरत, तो उगना बहुजन की आस है।
किसे कुचलना चाहते हो? तुम जानते नहीं ये घास है।।

जो कभी न मरी है, कभी न सूखी है।
अंदर से जिंदा पर, बाहर से रूखी है।।

*बहुजन- पीड़ित, शोषित, पददलित वर्ग

अभिनव
07 फरवरी 2019

Tuesday, 5 February 2019

राजकीय सेवा यात्रा

मैं अभिनव सरोवा मूल रूप से झुंझुनूँ जिले की मलसीसर तहसील के बासड़ी गाँव का निवासी हूँ।
राजकीय सेवा में प्रथम पदस्थापन चूरू जिले की सुजानगढ़ तहसील की ग्राम पंचायत राजियासर मीठा के गाँव ढाणी रिणवां के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में हिंदी शिक्षक के रूप में हुआ। यहाँ आया तब स्कूल में कुल 6 शिक्षक थे। हम दो के आने के बाद कुल 8 शिक्षक हो गए। यहाँ 11 सितम्बर 2012 को पोस्टिंग के बाद से 13 जुलाई 2016 तक एक अध्यापक के रूप में सेवा दी। 13 जुलाई 2016 से वहीँ पर कार्यवाहक प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य करने और खुलकर काम करने का अवसर मिला हालाँकि इससे पूर्व भी श्री घड़सी राम जी की तरफ से पूरी छूट मिली हुई थी। इससे पूर्व यहाँ प्रार्थना सभा को रोचक और प्रभावशाली बनाने के प्रयास में हर रोज सामान्य ज्ञान, दैनिक और सामान्य विज्ञान, प्रचलित रीति-रिवाज, पहनावे, रिश्तों पर आधारित, राजनीतिक और सामाजिक गठन पर आधारित प्रश्न करने शुरू किये। ये प्रश्न मैं खुद अपने हाथ से लिखकर दिया करता था और बच्चे इसका जवाब देने को आतुर रहते थे। हर रोज किसी नाते बच्चे को आगे आकर सवाल करने होते थे। इसके साथ-साथ बच्चों से हिंदी के छंद, सूक्तियों और संस्कृत के श्लोक का वाचन और उसका अर्थ करवाया जाता था। बच्चों का स्कूल के जुड़ाव बढ़ा और खेल-खेल में सिखाने के प्रयास भी जारी रहे। कक्षा 8 के बच्चों को प्रोत्साहनस्वरूप चाँदी के सिक्के देने की घोषणा की गई और प्रार्थना सभा से पहले और छुट्टी के बाद अतिरिक्त कक्षाओं का आयोजन किया गया।

तदुपरांत प्रधानाध्यापक का पद मिल जाने पर कुछ नया करने की लालसा को पंख मिले। नौकरीशुदा लोगों से संपर्क करके विद्यालय में फर्नीचर, आटा चक्की, ग्रीन बोर्ड, पानी की टंकी, भामाशाहों के नाम लिखवाने हेतु बोर्ड, आदमकद आइना इत्यादि सुविधाएँ भामाशाहों के माध्यम से जुटाई गई। स्कूल स्टाफ के साथ मिलकर टाई-बेल्ट और गैस चूल्हा स्कूल को दिया गया।

28 जून 2017 से राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय कचोटिया, प्रतापगढ़ में पदस्थापन होने के बाद देखने में आया कि बच्चों का स्तर कुछ कमजोर है और स्कूल से जुड़ाव भी कम है। स्कूल में ठहराव सुनिश्चित करने हेतु सभी बच्चों को क्लास में लेकर एक संवाद शुरू किया गया। सभी बच्चों के मोबाइल नम्बर लिए गए ताकि लगातार दो दिन तक अनुपस्थित रहने पर जानकारी हासिल की जा सके। इसका एक फायदा ये हुआ कि बच्चों को लगने लगा कि सर हमारी निगरानी रखते हैं इसलिए यदि किसी आवश्यक कार्यवश रुकना भी पड़े तो वे मुझे मोबाइल या प्रार्थना-पत्र के माध्यम से सूचना देना न भूलते थे। बच्चे जब भी किसी विषय या टॉपिक पर खुद को असमंजस में पाते तो बेझिझक फोन कर लेते थे। ये उनके साथ दोस्ताना व्यवहार से संभव हो पाया। कभी उनकी जाति, धर्म, लिंग, गरीबी को आड़े नहीं आने दिया। कक्षा कक्ष में सबसे पहले पहुंचना और बच्चों को उनका इंतजार करते मिलने से देर से आने वाली समस्या का समाधान भी हो गया। यहाँ तक कि बच्चों के जन्मदिन भी कक्षा में मनाए गये ताकि हमारे प्रति उनका विश्वास बढ़ सके और वे हमारी बात को मानने को तैयार हो सकें। एकबार झाड़न (Duster) भी घर से लेकर गया तो दूसरी बार कहने का अवसर तक नहीं मिला। बच्चों को पढ़ने के लिए खुद के पुस्तकालय से पुस्तकें दी गई। इस कार्य हेतु fb पर पोस्ट लिखी तो अजमेर नगरनिगम की तात्कालिक जॉइंट कमिश्नर ज्योति ककवाणी जी ने 40 पुस्तकें भेजीं जो बिना किसी प्रकार की औपचाकारिता के बच्चों को दी गई। इससे बच्चों में स्कूल सिलेबस से इतर साहित्य पढ़ने की आदत लग गई। कुछ बच्चे जो आज हमारे विद्यालय में अध्ययनरत नहीं हैं, वो भी बुक्स लेने स्कूल आते रहते हैं।

सत्र 2018-19 में बच्चों को कविता पढ़ने के साथ-साथ कविता या गद्य के रूप में अपने भाव लेखन के लिए प्रोत्साहित किया गया। कुछ बच्चे आज बहुत बढ़िया कविता लिखने लगे हैं। इसे और अधिक रोमांचक बनाने के लिए कक्षा-कक्ष में खुद के पैसों से खरीदकर एक बोर्ड लगाया गया और उस पर इन बच्चों की कविताओं को चिपकाया गया ताकि और बच्चे भी मोटीवेट हों। अंततः ये प्रयास भी सफल रहा और बच्चे कविता के साथ-साथ अन्य विषयों के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर लिखकर उस बोर्ड पर चस्पा करने लगे। इससे उनके शब्दकोष और लेखन शैली में सुधार हुआ। छुट्टी के दिन अतिरिक्त कक्षा का आयोजन किया जाता है और बच्चे सहर्ष उसमें अपनी भागीदारी देते हैं। इस वर्ष स्कूल के अलावा बच्चों की सहायतार्थ whatsapp पर एक समूह बनाया गया जिसमें बच्चे अपने सवाल करके अपनी जिज्ञासा शांत करते हैं और आपस में सार्थक चर्चा भी करते हैं।

अंटार्कटिका महाद्वीप पर शोधरत हमारे मित्र राजीव कुमार से whatsapp से वीडियो कॉलिंग के मार्फत वार्ता करवाई गई। बच्चों ने जमकर सवाल किए। ये सवाल करने की आदत विकसित करने  को मैं अपनी निजी उपलब्धि मानता हूँ। बच्चे अब किसी भी अपरिचित व्यक्ति के सामने अपनी शंकाएँ रख सकते हैं और पूछे जाने वाले सवालों के जवाब देते हैं तो मन को ख़ुशी मिलती हैं। खैर अभी भी बहुत-सा काम करने की गुंजाईश है। यही गुंजाईश हमें निरंतर काम करने और सार्थक प्रयास हेतु प्रोत्साहित करती हैं।

11 सितम्बर 2012 से 5 फरवरी 2019 तक की अनवरत शैक्षिक यात्रा की कहानी। यात्रा अभी जारी है।

अभिनव सरोवा
कचोटिया यूनिवर्सिटी।

बचपना अभी गया नहीं है

अभी बचपना गया नहीं है।
नंगे पाँव घूमता हूँ।
हाथ में लेकर रोटी खा लेता हूँ।
ओखली पर बैठ जाता हूँ।
पीढ़े पर सो जाता हूँ।
खाट की दावण में पैर लटकाकर
ओठों की गाड़ी भगा लेता हूँ।
छाछ पीकर आस्तीन से मुँह पौंछ लेता हूँ।
बिरखा होते ही
घरौंदे बनाने लगता हूँ।
मामा या बुआ आते हैं तो
साथ जाने को
रास्ते पर लौट जाता हूँ।
गाय की टोगड़ती और
बकरी के बच्चे संग खेल लेता हूँ।
रात को खाकर रोटी
बिन बिछाए सो जाता हूँ।
जिससे मन कर
बतिया लेता हूँ।
बिन बात
गुनगुना लेता हूँ।
क्योंकि बचपना अभी
गया नहीं है।

अभिनव
5 फरवरी 2019

एकला राही

कब हुआ है जमाना
उठते पलड़े का
कौन बैठा है पास
किसने रखकर हाथ
कंधे पर
दी है दिलासा
जताया है भरोसा
पोंछे हैं आँसू
हटाए हैं किसने
पथ के कंटक?

तू है राही
वीरान राहों का
एकाकी जीवन
जिंदगी राह
तू मुसाफिर
फिर क्यों जोहे बाट
कि आएगा कोई
बनेगा साथी
मिलाकर कदम से कदम
चलेगा
अनजानी राहों पर

अभिनव
4 फरवरी 2019

पाप तुम्हारे

बीज हैं
उग सकते हैं
हर कहीं
डाल सकते हैं
एक हरी चद्दर
तुम्हारे पाप पर भी
पर नहीं डालते।

कर लो
जो करना है।
पाप तुम करो
छुपाएँ हम...?

ये नहीं हो सकता।

अभिनव सरोवा
4 फरवरी 2019

बीज

कितना कुचलोगे
पैरों तले?

बीज हूँ
आखिर उग ही आऊँगा
घास की तरह।
कीचड़ में
कचरे के ढेर पर
दीवार की दरार में
तुम्हारे गढ़ की नींव में भी।

अभिनव सरोवा
4 फरवरी 2019

बहते जाना है


बस बहते जाना है
पानी की तरह
ढलान की तरफ
जहाँ जाने से
कतराता है
हर कोई।

अभिनव सरोवा
4 फरवरी 2019

हस्ती अपनी

मोहताज हैं
ज़माने भर के
पर इतने भी नहीं कि
गवाँ दें
वजूद अपना
मिटा दें
अपनी हस्ती।

ये
जैसी भी है
अपनी है।

इसे रखेंगे कायम
अपनी शर्तों पर।

अभिनव
4 फरवरी 2019

दे जवाब

समय नहीं है
दे घुटनों में सिर
आँसू बहाने का
न रुकने का
न झुकने का
न टूटकर बिखरने का
न दोष देने का।

समय है
अंदर की ज्योति
हिम्मत
हौसले
साहस
काबिलियत के
साक्षात्कार का।

दे जवाब
हाथों की करनी से
जुबान के मौन से
आँखों के अपनेपन से
लबों की मुस्कराहट से।

बस ये उम्मीद न करना
कि जमाना तेरा है।

Monday, 4 February 2019

सोचता हूँ जब

खेलता हूँ
जब भी
बच्चों संग
हार जाता हूँ
बार-बार
ताकि
चमक उठें
चेहरे उनके,
छोटी-छोटी
हथेलियों से
निकले
अंदर की ख़ुशी।

फिर कभी एकांत में
खेलने का
करता हूँ जतन
शब्दों संग
तब हार जाता हूँ
अपनी ही
अव्यवस्थित मनोदशा से।

खिलखिला रहे थे शब्द
मेरी हार पर,
पर हार से अपनी
मायूस नहीं हूँ मैं।

हारा हूँ लड़कर
इसी से मिलता है
हौसला
फिर से खेलने का,
खेलकर हारने का
हारकर खेलने का।

अभिनव सरोवा
3 फरवरी 2019

Friday, 1 February 2019

द्रोण का सच

बने रहो गाफिल
खुश रहो
अपनी ही बनाई
गिजगिजी दुनिया में
सड़ते रहो
अंदर ही अंदर।

अतीत से देखकर
मोह तुम्हारा
तरस आता तुम पर,
फिर घिन्न भी आती
क्यों लटके हो
छत से उलटे?

हर बार तुमने
ले नाम शास्त्रों का
किया मानव-मानव में भेद
सड़ चुके हो अंदर से।

एक तरफ तुम
शास्त्र को सही ठहराते
दूजी ओर खोज रहे
द्रोण की बेगुनाही के सबूत।

हम तो उस पूरे वाकये को ही
मानते हैं मनगढ़ंत, काल्पनिक
और किसी गप्पी की गपोड़
और कुत्सित चाल तुम्हारी।

फिर भी गर वो सही भी था
एकलव्य का अँगूठा भी सही था
माँगने में रहे हो
आगे सबसे
फिर अँगूठा क्या चीज है?

तुम करो साबित
द्रोण को पाक साफ
हम रखेंगे
उतनी ही शिद्दत से
उसके नापाक कृत्य को।

अभिनव सरोवा
1 फरवरी 2019