मैं अभिनव सरोवा मूल रूप से झुंझुनूँ जिले की मलसीसर तहसील के बासड़ी गाँव का निवासी हूँ।
राजकीय सेवा में प्रथम पदस्थापन चूरू जिले की सुजानगढ़ तहसील की ग्राम पंचायत राजियासर मीठा के गाँव ढाणी रिणवां के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में हिंदी शिक्षक के रूप में हुआ। यहाँ आया तब स्कूल में कुल 6 शिक्षक थे। हम दो के आने के बाद कुल 8 शिक्षक हो गए। यहाँ 11 सितम्बर 2012 को पोस्टिंग के बाद से 13 जुलाई 2016 तक एक अध्यापक के रूप में सेवा दी। 13 जुलाई 2016 से वहीँ पर कार्यवाहक प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य करने और खुलकर काम करने का अवसर मिला हालाँकि इससे पूर्व भी श्री घड़सी राम जी की तरफ से पूरी छूट मिली हुई थी। इससे पूर्व यहाँ प्रार्थना सभा को रोचक और प्रभावशाली बनाने के प्रयास में हर रोज सामान्य ज्ञान, दैनिक और सामान्य विज्ञान, प्रचलित रीति-रिवाज, पहनावे, रिश्तों पर आधारित, राजनीतिक और सामाजिक गठन पर आधारित प्रश्न करने शुरू किये। ये प्रश्न मैं खुद अपने हाथ से लिखकर दिया करता था और बच्चे इसका जवाब देने को आतुर रहते थे। हर रोज किसी नाते बच्चे को आगे आकर सवाल करने होते थे। इसके साथ-साथ बच्चों से हिंदी के छंद, सूक्तियों और संस्कृत के श्लोक का वाचन और उसका अर्थ करवाया जाता था। बच्चों का स्कूल के जुड़ाव बढ़ा और खेल-खेल में सिखाने के प्रयास भी जारी रहे। कक्षा 8 के बच्चों को प्रोत्साहनस्वरूप चाँदी के सिक्के देने की घोषणा की गई और प्रार्थना सभा से पहले और छुट्टी के बाद अतिरिक्त कक्षाओं का आयोजन किया गया।
तदुपरांत प्रधानाध्यापक का पद मिल जाने पर कुछ नया करने की लालसा को पंख मिले। नौकरीशुदा लोगों से संपर्क करके विद्यालय में फर्नीचर, आटा चक्की, ग्रीन बोर्ड, पानी की टंकी, भामाशाहों के नाम लिखवाने हेतु बोर्ड, आदमकद आइना इत्यादि सुविधाएँ भामाशाहों के माध्यम से जुटाई गई। स्कूल स्टाफ के साथ मिलकर टाई-बेल्ट और गैस चूल्हा स्कूल को दिया गया।
28 जून 2017 से राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय कचोटिया, प्रतापगढ़ में पदस्थापन होने के बाद देखने में आया कि बच्चों का स्तर कुछ कमजोर है और स्कूल से जुड़ाव भी कम है। स्कूल में ठहराव सुनिश्चित करने हेतु सभी बच्चों को क्लास में लेकर एक संवाद शुरू किया गया। सभी बच्चों के मोबाइल नम्बर लिए गए ताकि लगातार दो दिन तक अनुपस्थित रहने पर जानकारी हासिल की जा सके। इसका एक फायदा ये हुआ कि बच्चों को लगने लगा कि सर हमारी निगरानी रखते हैं इसलिए यदि किसी आवश्यक कार्यवश रुकना भी पड़े तो वे मुझे मोबाइल या प्रार्थना-पत्र के माध्यम से सूचना देना न भूलते थे। बच्चे जब भी किसी विषय या टॉपिक पर खुद को असमंजस में पाते तो बेझिझक फोन कर लेते थे। ये उनके साथ दोस्ताना व्यवहार से संभव हो पाया। कभी उनकी जाति, धर्म, लिंग, गरीबी को आड़े नहीं आने दिया। कक्षा कक्ष में सबसे पहले पहुंचना और बच्चों को उनका इंतजार करते मिलने से देर से आने वाली समस्या का समाधान भी हो गया। यहाँ तक कि बच्चों के जन्मदिन भी कक्षा में मनाए गये ताकि हमारे प्रति उनका विश्वास बढ़ सके और वे हमारी बात को मानने को तैयार हो सकें। एकबार झाड़न (Duster) भी घर से लेकर गया तो दूसरी बार कहने का अवसर तक नहीं मिला। बच्चों को पढ़ने के लिए खुद के पुस्तकालय से पुस्तकें दी गई। इस कार्य हेतु fb पर पोस्ट लिखी तो अजमेर नगरनिगम की तात्कालिक जॉइंट कमिश्नर ज्योति ककवाणी जी ने 40 पुस्तकें भेजीं जो बिना किसी प्रकार की औपचाकारिता के बच्चों को दी गई। इससे बच्चों में स्कूल सिलेबस से इतर साहित्य पढ़ने की आदत लग गई। कुछ बच्चे जो आज हमारे विद्यालय में अध्ययनरत नहीं हैं, वो भी बुक्स लेने स्कूल आते रहते हैं।
सत्र 2018-19 में बच्चों को कविता पढ़ने के साथ-साथ कविता या गद्य के रूप में अपने भाव लेखन के लिए प्रोत्साहित किया गया। कुछ बच्चे आज बहुत बढ़िया कविता लिखने लगे हैं। इसे और अधिक रोमांचक बनाने के लिए कक्षा-कक्ष में खुद के पैसों से खरीदकर एक बोर्ड लगाया गया और उस पर इन बच्चों की कविताओं को चिपकाया गया ताकि और बच्चे भी मोटीवेट हों। अंततः ये प्रयास भी सफल रहा और बच्चे कविता के साथ-साथ अन्य विषयों के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर लिखकर उस बोर्ड पर चस्पा करने लगे। इससे उनके शब्दकोष और लेखन शैली में सुधार हुआ। छुट्टी के दिन अतिरिक्त कक्षा का आयोजन किया जाता है और बच्चे सहर्ष उसमें अपनी भागीदारी देते हैं। इस वर्ष स्कूल के अलावा बच्चों की सहायतार्थ whatsapp पर एक समूह बनाया गया जिसमें बच्चे अपने सवाल करके अपनी जिज्ञासा शांत करते हैं और आपस में सार्थक चर्चा भी करते हैं।
अंटार्कटिका महाद्वीप पर शोधरत हमारे मित्र राजीव कुमार से whatsapp से वीडियो कॉलिंग के मार्फत वार्ता करवाई गई। बच्चों ने जमकर सवाल किए। ये सवाल करने की आदत विकसित करने को मैं अपनी निजी उपलब्धि मानता हूँ। बच्चे अब किसी भी अपरिचित व्यक्ति के सामने अपनी शंकाएँ रख सकते हैं और पूछे जाने वाले सवालों के जवाब देते हैं तो मन को ख़ुशी मिलती हैं। खैर अभी भी बहुत-सा काम करने की गुंजाईश है। यही गुंजाईश हमें निरंतर काम करने और सार्थक प्रयास हेतु प्रोत्साहित करती हैं।
11 सितम्बर 2012 से 5 फरवरी 2019 तक की अनवरत शैक्षिक यात्रा की कहानी। यात्रा अभी जारी है।
अभिनव सरोवा
कचोटिया यूनिवर्सिटी।