बने रहो गाफिल
खुश रहो
अपनी ही बनाई
गिजगिजी दुनिया में
सड़ते रहो
अंदर ही अंदर।
अतीत से देखकर
मोह तुम्हारा
तरस आता तुम पर,
फिर घिन्न भी आती
क्यों लटके हो
छत से उलटे?
हर बार तुमने
ले नाम शास्त्रों का
किया मानव-मानव में भेद
सड़ चुके हो अंदर से।
एक तरफ तुम
शास्त्र को सही ठहराते
दूजी ओर खोज रहे
द्रोण की बेगुनाही के सबूत।
हम तो उस पूरे वाकये को ही
मानते हैं मनगढ़ंत, काल्पनिक
और किसी गप्पी की गपोड़
और कुत्सित चाल तुम्हारी।
फिर भी गर वो सही भी था
एकलव्य का अँगूठा भी सही था
माँगने में रहे हो
आगे सबसे
फिर अँगूठा क्या चीज है?
तुम करो साबित
द्रोण को पाक साफ
हम रखेंगे
उतनी ही शिद्दत से
उसके नापाक कृत्य को।
अभिनव सरोवा
1 फरवरी 2019
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