आज(कौनसा आज, ये पता करने के लिए सबसे लास्ट में देखें) सुबह-सुबह कक्षा 11 की हिंदी अनिवार्य की पुस्तक कथा धारा के प्रथम अध्याय को पढ़ते-पढ़ते कुछ लिखने का मन भी हो गया। अब अपने ही मन की बात टालने का साहस कोई कैसे कर सकता है, लिहाजा पेन-रजिस्टर लेकर बैठ गया। चूँकि मैं कक्षा 11 व 12 में हिंदी अनिवार्य और साहित्य का अध्यापन करवाता हूँ तो जाहिर है अधिकांश बातें इन कक्षाओं में पढ़ने-पढ़ाने वालों के लिए ही हैं। वर्तमान (2019-20) सत्र तीसरा है। गत वर्षों के परिणाम संतोषजनक से कहीं ज्यादा उत्साहवर्द्धक रहे हैं।
खैर बात करते हैं विषय आधारित। इसके भी अपने कारण हैं। अन्य विषयों पर न इतनी पकड़ है, न अधिकार और न ही मन। तीसरा कारण न लिखने के लिए माकूल है। कोई काम न करने का इससे अच्छा बहाना क्या होगा कि मन नहीं है। हम भी मानव मन(?) रखते हैं। सो मन हुआ तो लिखने बैठ गए। बहुतेरे लोग इससे ग्रस्त ही होते हैं। अच्छी बात ये है कि इसका उपचार भी अपने ही हाथ है और डॉक्टर भी घर का ही है। मन को मनाना पड़ता है और हिम्मत करनी पड़ती है।
दरअसल कक्षा 11 व 12 में हिंदी साहित्य और अनिवार्य की दो-दो मूल पुस्तकें हैं। इनके अलावा एक-एक पुस्तक साहित्य और अनिवार्य में क्रमशः हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास और संवादसेतु के नाम से शामिल की हुई हैं। काव्यशास्त्र और व्याकरण अलग से। व्याकरण की प्रकृत्ति, महत्त्व और दैनिक जीवन में उपयोग से बच्चे पहले से परिचित हैं लेकिन काव्यशास्त्र के नियम, महत्त्व, मात्रा या वर्ण की गणना से इनका पहला और प्रत्यक्ष साबिका कक्षा 11 में ही पड़ा है। शुरू-शुरू में थोड़ी अरुचि हो सकती है लेकिन मेरे शिक्षक साथियों को अपने अध्यापन, अध्यापन शैली, नवाचार और व्यवहार से बच्चों की इस अरुचि को रुचि में बदलना है। शारीरिक और मानसिक सजा में मेरा निजी रूप से कोई विश्वास नहीं है। इसलिए बच्चों की रुचि के लिए और के अनुसार (जो लाभकारी भी हों) पाठ्यक्रम में शामिल साहित्य से इतर भी अध्यापन करवाया जाना बेहद जरूरी है। टाइम तो जितना है सब उतने में ही करना है। अब ये कैसे संभव होगा, मेरे शिक्षक साथियों को बताने की जरूरत नहीं है।
गत दो सत्रों की बात करें तो कक्षा 12 के लिए 2017-18 में 165 और 2018-19 में 172 कार्यदिवस रहे हैं। ये संख्या जिलेवार कुछ कम-ज्यादा हो सकती है। इन्हीं कार्यदिवसों में पाठ्यक्रम में शामिल कहानी, कविता, एकांकी, संस्मरण, रेखाचित्र, आत्मकथांश, दोहे, सोरठे, चौपाई एवं अन्य लेखन विधाओं को पढ़ाना जरूरी है। साथ ही साथ शाला दर्पण, बोर्ड परीक्षा के आवेदन करना, परीक्षा का कार्य संभालना, छात्रवृत्ति, बालसभा और अन्य सहशैक्षिक गतिविधियों का सफल आयोजन करवाने की चेष्टा भी करनी पड़ती है। फिर भी थक जाना नहीं, तू कभी हारके को याद रखना पड़ता है।
हालात ये हो जाते हैं कि कक्षा से बंक तो दूर की कौड़ी है। कभीकभार गलती से भी दूसरे कालांश के कुछ पलों का अतिक्रमण करने का विचार मन में आ जाए और उस पर अमल हो जाए तो साथी शिक्षक की नजर में भारतीय संविधान की दफा 302 के अपराधी बन जाते हैं। अतः जो कुछ करना है, इन्हीं 35-40 मिनटों में करना है। इन 160 से 170 दिनों में भी हर दिन शिक्षण दिवस नहीं हो सकता। दो दिवस तो स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस वाले ही कम हो जाते हैं। इसके अलावा कोई दिवस विशेष, जयंती, पुण्यतिथि, उत्सव और बालसभा विशेष वाले कम हो जाते हैं। कभी बच्चों के घर काम हो जाता है तो कभी शिक्षक अवकाश पर हो सकता है।
कभी बच्चों के घर कोई काम हो जाता है। कभी कोई शादी या अन्य आयोजन, कभी न चाहते हुए भी मौसम के शिकार, कभी अत्यधिक वर्षा/सर्दी/ गर्मी के कारण स्कूल तक आने में परेशानी और कभी-कभी इनकी वजह से जिला या राज्य स्तर से अवकाश घोषित हो जाते हैं। कभी हम शिक्षक अवकाश ले लेते हैं। हालाँकि मैंने निजी रूप से गत सत्र में डेढ़ आकस्मिक अवकाश का ही उपभोग किया है लेकिन ये ज्यादा भी हो सकते थे या हैं। अनुपातिक रूप से राज्यभर की बात करें तो एक सत्र में तकरीबन 150 दिन ही शिक्षण कार्य हो पाता है।
365 में से 150 दिन बहुत कम नजर आते हैं। आते क्या हैं हैं ही। तिस पर ये विस्तृत पाठ्यक्रम। फिर मेरे जैसा सिरफिरा जब पाठ्यक्रम के साथ-साथ अन्य किस्से कहानियाँ पेलने लगता है तो सिलेबस शैतान की आँत बन जाता है। पाठ्यक्रम में शामिल अधिकांश कवि/कवयित्री और लेखक/लेखिकाओं की अन्य रचनाएँ भी पुस्तकाकार में मिल ही जाती हैं तो उसके बारे में भी दो शब्द कहते-कहते थोड़ा-बहुत समय लगा ही देते हैं( नष्ट कर देते हैं नहीं लिखूँगा)।
राजकीय विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों की बात करूँ तो अधिकांश प्रतिशत किसान, मजदूर परिवारों का होता है। लिहाजा सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियाँ राह में रोड़े बन ही जाती हैं। घरेलू और कृषि कार्यों में भी हाथ बँटाना पड़ता है। लड़कियों के साथ ये समस्याएँ ज्यादा आती हैं। कई दफा तो ऐसे प्रकरण भी सामने आए हैं कि बच्चे आधी छुट्टी में पशुओं को पानी पिलाने, छाया में बाँधने या खेत मे रोटियाँ पकड़ाने के लिए छुट्टी माँगकर जाते और घण्टी लगने तक दौड़ते-हाँफते स्कूल आते थे। ऐसे बच्चों के प्रति सिर श्रद्धावनत हो जाता था। चूँकि कुछ शरारती या पढ़ाई में मन न लगने वाले बच्चे इन कार्यों की आड़ में बंक मारने की जुगत भी बैठाने की कोशिश करते थे। इनकी सीधी पहचान करने का मेरा निजी तरीका ये था कि कक्षाध्यापक से छुट्टी माँगी है तो बेईमानी कम और जिम्मेदारी बेसी है लेकिन कक्षाध्यापक के उपस्थित होने के बावजूद किसी अन्य अध्यापक से ऐसे ही कार्यों के लिए छुट्टी माँगने का मतलब है कि मन में कुछ काला है।
खैर समस्याएँ तो आएंगी और इनसे घबराकर दूर भागकर मंजिल नहीं पाई जा सकती। राह में झुककर काँटे निकालने लगे तो दिल का पैरों के घाव देखकर आहत होना लाजिमी है और मंजिल से दूरी बढ़ना भी तय है। हर कोई डॉ. कलाम या बाबा साहब नहीं हो सकते फिर भी सपने देखना भी कहाँ गुनाह है। इन पर न कोई टोल है और न ही कोई टैक्स। बस चलते जाना है, निरंतर, बिना रुके, बिना थके, बिना मुड़े। इंद्रियों को जागृत रखना है। जहाँ से,जैसे भी मिले, कड़वा-मीठा सब ग्रहण करते जाना है। चलते जाना है, बढ़ते जाना है, बहते जाना है। जो बहेगा निस्संदेह जीवनदायी सलिल बनेगा, रुका सो सड़ा। अब तय भी हमें ही करना है कि रुककर सड़ांध मारनी है या बहते हुए धरा, वनस्पति, पशु, पक्षी, मनुष्य का जी तृप्त करना है और खुद को सार्थक।
ये आदर्श स्थिति हो सकती है। यथार्थ इससे उलट होगा। हमारी सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक बंदिशें, विवशताएँ और हालात बाधक बनेंगे लेकिन जहाँ तक संभव हो, पढ़ाई जारी रखना। विवेक से काम लेना, किसी की अंधभक्ति नहीं करनी, किसी को आदर्श नहीं मानना है। अच्छे-बुरे की परख करना सीखना होगा। दोस्तों का साथ नहीं छोड़ना और बुरा चाहने वालों से दुश्मनी तो नहीं करनी लेकिन दूरी जरूर बनानी है। अपने कच्चे/पक्के घर, माँ, पापा, भाई, बहिन को लेकर अहंकार नहीं करना तो इनके कारण शर्मिंदा होने की जरूरत भी नहीं है। हमारा वजूद इन्हीं से है। अमीर घर से संबंध रखने वाले दोस्तों के सामने अपने गरीब किसान/मजदूर माँ-बाप पर फख्र ही करना है।
लिखने को तो बहुत कुछ है लेकिन मेरा मानना है कि ज्यादा ज्ञान ढोळने की जरूरत नहीं है। समय और सामाजिक उदाहरणों और ठोकरों से कमोबेश ज्ञान तो आ ही जाएगा।
मैं चाहता हूँ कि ऊपर लिखी बातों को सलीके/बेसलीके से पढ़ा जाए और मुनासिब हो तो मनन भी किया जा सकता है।
बाकी फिर कभी। जब भी मन में हुआ, कुछ लिख ही डालेंगे। झेलने के लिए तो आप हैं ही।
अभिनव सरोवा
11 अक्टूबर 2019
(कचोटिया के पूर्व और पिथूसर के वर्तमान मास्साब)