Saturday, 26 October 2019

चोब और राजनीति

चोब और राजनीति.....

      गाँव के जोहड़ में बने ये खड्डे चोब या ढाब कहलाते थे। कच्चा होता तो चोब और पक्का होता तो जोहड़। चोब या लगभग बीचोंबीच होते थे। इसे कई बार नाभी भी कह दिया जाता था लेकिन हिंदीभाषियों द्वारा। बरसात के दिनों में चारों तरफ का पानी ढलान के कारण दौड़ता हुआ उसमें गिरता था। आदमी और पशुओं के लिए पानी का भंडार। जब तक आदमी ने पानी पीया, पशुओं को अंदर नहीं घुसने दिया। कालांतर में कुएँ, कुंड बने और ये उपेक्षित हो गए। पशु नहाने लगे। भैंसों को तो जैसे जन्नत मिल गई। कीचड़ में सनी देख धणी और धिराणी जरूर करड़-परड़ करते लेकिन भैंसे इससे निरापद रहकर नहाने का मजा लेती। एक समय वो भी था जब भैंस और लड़के साथ-साथ नहा लेते थे। मैं भी उन्हीं खुशनसीबों में हूँ। स्कूल से आने के बाद कई बार उस गंदले पानी में नहाया था। आज के छोहरे तो उस चोब या ढाब के दर्शन के भी नादिदे हैं। समय बीतता गया तो बदलाव होने लाजिमी थे। पानी के साथ तले में मिट्टी जमती गई। निजी स्कूल प्रचलन में आईं। होम वर्क का बोझ बढ़ा, कुछ नजाकत भी। लिहाजा चोब के गंदले पानी मे नहाना बन्द हुआ। भले ही नहाकर पहले की बजाय ज्यादा गंदे ही क्यों न हों लेकिन होता नहाना ही था। कई बार बकरियाँ चराते-चराते नहाने में खो जाते और बकरियाँ पड़ोसी का खेत जीम जाती। ओळमा लेकर कोई आता तो कभी नंगे तो कभी नेकर हाथ में लिए भागते फिरते। आज ये चोब बच्चों के साथ-साथ भैंसों को भी तरस रही हैं। अब आकड़ों से आबाद हैं।

    यही हाल हमारी राजनीति का भी है। पहले-पहल लोग राजनीति में सेवार्थ आते थे। फिर समय के साथ-साथ नहाने वाली बात भी होने लगी। लोग सेवार्थ की बजाय स्वार्थ को तवज्जो देने लगे। फिर भैसों जैसे काले-कलूटे(काले रंग का अर्थ चमड़ी से न लेकर नीति से लिया जाए) लोग इसमें डुबकी लगाने लगे। अब आम आदमी जीतने के बाद विरोधी विचारधारा वाले खेमे में जाने के बाद अपने नेता पर करड़-परड़ के सिवाय कर ही क्या सकता है। लोग रोजगार और अन्य कार्यों के कारण खुलकर राजनीति न कर इससे दूरी बनाने लगे। लड़कों की तरह। अब तो आकड़ों जैसे बेकार लोगों की शरणस्थली बनी हुई है ये चोब। नाभी भी है लेकिन बिलकुल छिछली। गहराई तो रही ही नहीं। आकड़ों के सूखे पत्ते जैसे हवा के साथ चक्करी चढ़कर इधर-उधर डोलते फिरते रहते हैं वैसे ही हमारे नेता लोग भी हवा(राजनीति की हवा) के साथ कभी इसके साथ, कभी उसके साथ। कोई ओळमा दे तो मुँह लटका देते हैं या अपने चेले-चपाटों की संख्या देखकर आक्रामक भी हो जाते हैं। जैसे भी हो बस देश सेवा(?) करने की जुगत बैठाते रहते हैं।

   अब तय देश की जनता को करना है कि हमें आकड़ों को किस तरह निकाल बाहर करना है। जब तक जड़ नहीं खोदी जाएगी, इनकी वंशवृध्दि होती रहेगी और हम हाथ मलते रहेंगे।काँकरें फेंकते रहेंगे जैसे दूध की टेम पर पानी मे बैठी भैंस को निकालने के लिए उसका ग्वाला फेंकता था लेकिन भैंस थी कि नेता बनी रहती!

अभिनव
26 अक्टूबर 2019

दिखणादा मोहल्ला

दिखणादा मोहल्ला-

बसा है बेतरतीब
मेरा गाँव
न चौरस
न तिकोना
न गोल।
परन्तु दिशाएँ तो कायम थीं
कायम हैं और
कायम ही रहेंगी
सो मोहल्ले भी हैं।
उत्तरादा है तो दिखणादा भी है
अगुणा है तो आथुणा भी।

दिखणादे ने खूब तरक्की की
डॉक्टर दिए तो सिपाही भी
मास्टर दिए तो ग्रामसेवक भी
प्रिंसिपल दिए तो सैनिक भी।

फिर आथूणे मोहल्ले में जगा
अध्यात्म और बन गया मंदिर
पर न लगी तो बिजली
न घंटा बजा न घड़ियाल
न शंख बजा न माइक
न दीया जला न हुई धूप।
बस उगी है घास
रोज देखता हूँ
रो रही हो जैसे
कोई विरासत
अपनी अनदेखी पर।

फिर हुआ आध्यात्मिक ज्ञान
उत्तरादे मोहल्ले को भी।
एक और ठोक दिया
घंटा भी बजा और घड़ियाल भी
दीया भी हुआ तो धूप भी
शंख भी बजा तो माइक भी।
अब वहाँ कुछ नहीं बजता
क्यों?
क्योंकि
बच्चे पढ़ते हैं।

ये ज्ञान था कि यहीं न रुका
एक और आदेश हुआ
(कहीं ऊपर से)
अब एक और मंदिर बना
अगुणे मोहल्ले में
एक का हुआ उद्धार
दिखणादे में
दोनों में बजते हैं
घण्टे भी घड़ियाल भी
शंख भी माइक भी
होता है दीया भी तो धूप भी
जोरों से लगते हैं जयकारे।

क्योंकि यहाँ भी बच्चे ही पढ़ते हैं!

क्या बात करते हो!
बच्चे पढ़ते हैं?
क्यों?
कैसे?

हमारे होते
बच्चे पढ़ेंगे!
नामुमकिन।

कोई बोले भी कैसे
अधिष्ठाता भी तो लिया है
उसी दिखणादे मोहल्ले से।

अभिनव
26 अक्टूबर 2019

चोब और राजनीति

चोब और राजनीति.....

      गाँव के जोहड़ में बने ये खड्डे चोब या ढाब कहलाते थे। कच्चा होता तो चोब और पक्का होता तो जोहड़। चोब या लगभग बीचोंबीच होते थे। इसे कई बार नाभी भी कह दिया जाता था लेकिन हिंदीभाषियों द्वारा। बरसात के दिनों में चारों तरफ का पानी ढलान के कारण दौड़ता हुआ उसमें गिरता था। आदमी और पशुओं के लिए पानी का भंडार। जब तक आदमी ने पानी पीया, पशुओं को अंदर नहीं घुसने दिया। कालांतर में कुएँ, कुंड बने और ये उपेक्षित हो गए। पशु नहाने लगे। भैंसों को तो जैसे जन्नत मिल गई। कीचड़ में सनी देख धणी और धिराणी जरूर करड़-परड़ करते लेकिन भैंसे इससे निरापद रहकर नहाने का मजा लेती। एक समय वो भी था जब भैंस और लड़के साथ-साथ नहा लेते थे। मैं भी उन्हीं खुशनसीबों में हूँ। स्कूल से आने के बाद कई बार उस गंदले पानी में नहाया था। आज के छोहरे तो उस चोब या ढाब के दर्शन के भी नादिदे हैं। समय बीतता गया तो बदलाव होने लाजिमी थे। पानी के साथ तले में मिट्टी जमती गई। निजी स्कूल प्रचलन में आईं। होम वर्क का बोझ बढ़ा, कुछ नजाकत भी। लिहाजा चोब के गंदले पानी मे नहाना बन्द हुआ। भले ही नहाकर पहले की बजाय ज्यादा गंदे ही क्यों न हों लेकिन होता नहाना ही था। कई बार बकरियाँ चराते-चराते नहाने में खो जाते और बकरियाँ पड़ोसी का खेत जीम जाती। ओळमा लेकर कोई आता तो कभी नंगे तो कभी नेकर हाथ मे लिए भागते फिरते। आज ये चोब बच्चों के साथ-साथ भैंसों को भी तरस रही हैं। अब आकड़ों से आबाद हैं।

    यही हाल हमारी राजनीति का भी है। पहले-पहल लोग राजनीति में सेवार्थ आते थे। फिर समय के साथ-साथ नहाने वाली बात भी होने लगी। लोग सेवार्थ की बजाय स्वार्थ को तवज्जो देने लगे। फिर भैसों जैसे काले-कलूटे(काले रंग का अर्थ चमड़ी से न लेकर नीति से लिया जाए) लोग इसमें डुबकी लगाने लगे। अब आम आदमी जीतने के बाद विरोधी विचारधारा वाले खेमे में जाने के बाद अपने नेता पर करड़-परड़ के सिवाय कर ही क्या सकता है। लोग रोजगार और अन्य कार्यों के कारण खुलकर राजनीति न कर इससे दूरी बनाने लगे। लड़कों की तरह। अब तो आकड़ों जैसे बेकार लोगों की शरणस्थली बनी हुई है ये चोब। नाभी भी है लेकिन बिलकुल छिछली। गहराई तो रही ही नहीं। आकड़ों के सूखे पत्ते जैसे हवा के साथ चक्करी चढ़कर इधर-उधर डोलते फिरते रहते हैं वैसे ही हमारे नेता लोग भी हवा(राजनीति की हवा) के साथ कभी इसके साथ, कभी उसके साथ। कोई ओळमा दे तो मुँह लटका देते हैं या अपने चेले-चपाटों की संख्या देखकर आक्रामक भी हो जाते हैं। जैसे भी बस देश सेवा(?) करने की जुगत बैठाते रहते हैं।

   अब तय देश की जनता को करना है कि हमें आकड़ों को किस तरह निकाल बाहर करना है। जब तक जड़ नहीं खोदी जाएगी, इनकी वंशवृध्दि होती रहेगी और हम हाथ मलते रहेंगे।काँकरें फेंकते रहेंगे जैसे दूध की टेम पर पानी मे बैठी भैंस को निकालने के लिए उसका ग्वाला फेंकता था लेकिन भैंस थी कि नेता बनी रहती!

अभिनव
26 अक्टूबर 2019

Thursday, 17 October 2019

कबीर यूँ ही नहीं हुआ जाता

यूँ ही न कोई कबीर हुआ है न प्रेमचंद। कबीर होने के लिए कबीर होना पड़ता है और प्रेमचंद के लिए प्रेमचंद। जब कभी तुम अनायास या सायास कबीर कह देते हो तो लगता है जैसे सदियों पुराना बोझ कंधों पर लाद दिया है। ये भी सच है कि कबीर न हो सका लेकिन उसका प्रतिगामी भी नहीं हूँ। भले ही तुम्हें कबीर न बना पाया(माद्दा भी नहीं है) लेकिन उसके अनुसरण की राह जरूर पकड़ा दी। हम लीक से हटकर चले थे। जो तुम्हें भी पसंद आया। एकसूत्री की बनिस्पत बहुसूत्री कार्यक्रम पर काम किया।जितना बन पड़ा, किया। अब तुममें इस बात की समझ बन गई कि रोशनी शीशे पर रखनी है या चेहरे पर। तुम्हें चाँद पर सूरज को तवज्जो देनी है। प्रकाश अपना ही काम आएगा। बाकी सब क्षणिक, छलावा, भुलावा हो सकता है शाश्वत नहीं। माना कि सूरज भी अंधेरे को खत्म नहीं कर पाया पर उसने हार भी कहाँ मानी है। अकेला खड़ा है। प्रखर तेज के साथ। वही अंधेरा उसका पूरक बन गया। तुम्हें भी इसी अंधेरे को पूरक बनाना है। अंधेरा दूर भले ही न हो लेकिन चमकना न छोड़ना। कबीर की बाँह न सही, राह थामे रखना। बाकी खैरियत।

अभिनव
16 अक्टूबर 2019

Tuesday, 15 October 2019

विद्यार्थी दिवस 2019

विश्व विद्यार्थी दिवस

        सबसे पहले तो यूएनओ को डॉ. कलाम के जन्मदिवस को विश्व विद्यार्थी दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा करने के लिए धन्यवाद। एक शिक्षक के लिए उसके विद्यार्थी ही सब कुछ होते हैं। एक शिक्षक का परिचय वो नहीं हो सकता जिसे वो खुद देता है। उसका असली परिचय उसके विद्यार्थियों के माध्यम से मिलता है। विद्यार्थी किसी शिक्षक की मानस संतान के रूप में उसके प्रतिबिंब होते हैं। विद्यार्थी ही वो माध्यम हैं जिसके द्वारा शिक्षक अपनी काबिलियत दुनिया के समक्ष रखता है। उसके व्यवहार और चरित्र का आईना उसके विद्यार्थी होते हैं। जरूरी नहीं कि सब नौकरी करके ही खुद को सफल साबित करें लेकिन सार्थक जरूर हों, समाज में अपनी उपयोगिता साबित करें।
     तुम पढ़ो, बढ़ो, खुद को गढ़ो, निखरो, तार्किक बनो, दुनिया को देखो, उसकी अच्छाइयों से सीखो तो गलतियों से भी सीखो, बहते रहो। नदी न सही, नाले के रूप में भी खुद को साबित करो।
      भाँत-भाँत का पढ़ते रहो, घर-परिवार, गाँव-गुवाड़, समाज, रिश्ते-नातेदारों के प्रति अपने कर्तव्य को पहचानो और यथासंभव पूरा करने का जतन करो। दुनिया की शाबासी और निंदा से घबराए बगैर संविधान सम्मत कार्य करते रहो। नशे से दूर ही रहो तो अच्छा है। राजनीतिक रूप से किसी बाड़े के बंदी न बन जाना, बन जाओ तो अंधभक्त नहीं बनना। ये कागज की दीवार हैं तोड़ देने की कुव्वत रखना। विश्लेषण करने की काबिलियत बनाओ। पक्ष-विपक्ष में अपनी बात रखने का माद्दा पैदा करो। फोन के अंदर जितनी दुनिया है उससे खूबसूरत कहीं बाहर है, उसका आनंद लो। आदर्श की बजाय यथार्थ में जीना सीखो। दुनिया का असली साक्षात्कार यथार्थ में ही है। सही-गलत की पहचान करना सीखो। किसी की बात को आँख बंद कर न मानो। बड़े सपने देखो, पूरा करने के लिए खुद को गला दो। सपनों में जान हो और उसे पूरा करने की तड़प और प्रयास हों तो संसाधन की कमी आड़े नहीं आएगी। डॉ. कलाम ने भी बड़े सपने देखे थे, आज आपके सामने हैं।
         विश्व विद्यार्थी दिवस के अवसर पर सभी विद्यार्थियों को आशीर्वाद और उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ।

अभिनव सरोवा
15 अक्टूबर 2019

Friday, 11 October 2019

मन हो गया तो लिख डाला

आज(कौनसा आज, ये पता करने के लिए सबसे लास्ट में देखें) सुबह-सुबह कक्षा 11 की हिंदी अनिवार्य की पुस्तक कथा धारा के प्रथम अध्याय को पढ़ते-पढ़ते कुछ लिखने का मन भी हो गया। अब अपने ही मन की बात टालने का साहस कोई कैसे कर सकता है, लिहाजा पेन-रजिस्टर लेकर बैठ गया। चूँकि मैं कक्षा 11 व 12 में हिंदी अनिवार्य और साहित्य का अध्यापन करवाता हूँ तो जाहिर है अधिकांश बातें इन कक्षाओं में पढ़ने-पढ़ाने वालों के लिए ही हैं। वर्तमान (2019-20) सत्र तीसरा है। गत वर्षों के परिणाम संतोषजनक से कहीं ज्यादा उत्साहवर्द्धक रहे हैं।

     खैर बात करते हैं विषय आधारित। इसके भी अपने कारण हैं। अन्य विषयों पर न इतनी पकड़ है, न अधिकार और न ही मन। तीसरा कारण न लिखने के लिए माकूल है। कोई काम न करने का इससे अच्छा बहाना क्या होगा कि मन नहीं है। हम भी मानव मन(?) रखते हैं। सो मन हुआ तो लिखने बैठ गए। बहुतेरे लोग इससे ग्रस्त ही होते हैं। अच्छी बात ये है कि इसका उपचार भी अपने ही हाथ है और डॉक्टर भी घर का ही है। मन को मनाना पड़ता है और हिम्मत करनी पड़ती है।
       दरअसल कक्षा 11 व 12 में हिंदी साहित्य और अनिवार्य की दो-दो मूल पुस्तकें हैं। इनके अलावा एक-एक पुस्तक साहित्य और अनिवार्य में क्रमशः हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास और संवादसेतु के नाम से शामिल की हुई हैं। काव्यशास्त्र और व्याकरण अलग से। व्याकरण की प्रकृत्ति, महत्त्व और दैनिक जीवन में उपयोग से बच्चे पहले से परिचित हैं लेकिन काव्यशास्त्र के नियम, महत्त्व, मात्रा या वर्ण की गणना से इनका पहला और प्रत्यक्ष साबिका कक्षा 11 में ही पड़ा है। शुरू-शुरू में थोड़ी अरुचि हो सकती है लेकिन मेरे शिक्षक साथियों को अपने अध्यापन, अध्यापन शैली, नवाचार और व्यवहार से बच्चों की इस अरुचि को रुचि में बदलना है। शारीरिक और मानसिक सजा में मेरा निजी रूप से कोई विश्वास नहीं है। इसलिए बच्चों की रुचि के लिए और के अनुसार (जो लाभकारी भी हों) पाठ्यक्रम में शामिल साहित्य से इतर भी अध्यापन करवाया जाना बेहद जरूरी है। टाइम तो जितना है सब उतने में ही करना है। अब ये कैसे संभव होगा, मेरे शिक्षक साथियों को बताने की जरूरत नहीं है।
   
  गत दो सत्रों की बात करें तो कक्षा 12 के लिए 2017-18 में 165 और 2018-19 में 172 कार्यदिवस रहे हैं। ये संख्या जिलेवार कुछ कम-ज्यादा हो सकती है। इन्हीं कार्यदिवसों में पाठ्यक्रम में शामिल कहानी, कविता, एकांकी, संस्मरण, रेखाचित्र, आत्मकथांश, दोहे, सोरठे, चौपाई एवं अन्य लेखन विधाओं को पढ़ाना जरूरी है। साथ ही साथ शाला दर्पण, बोर्ड परीक्षा के आवेदन करना, परीक्षा का कार्य संभालना, छात्रवृत्ति, बालसभा और अन्य सहशैक्षिक गतिविधियों का  सफल आयोजन करवाने की चेष्टा भी करनी पड़ती है। फिर भी थक जाना नहीं, तू कभी हारके को याद रखना पड़ता है।

हालात ये हो जाते हैं कि कक्षा से बंक तो दूर की कौड़ी है। कभीकभार गलती से भी दूसरे कालांश के कुछ पलों का अतिक्रमण करने का विचार मन में आ जाए और उस पर अमल हो जाए तो साथी शिक्षक की नजर में भारतीय संविधान की दफा 302 के अपराधी बन जाते हैं। अतः जो कुछ करना है, इन्हीं 35-40 मिनटों में करना है। इन 160 से 170 दिनों में भी हर दिन शिक्षण दिवस नहीं हो सकता। दो दिवस तो स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस वाले ही कम हो जाते हैं। इसके अलावा कोई दिवस विशेष, जयंती, पुण्यतिथि, उत्सव और बालसभा विशेष वाले कम हो जाते हैं। कभी बच्चों के घर काम हो जाता है तो कभी शिक्षक अवकाश पर हो सकता है।
      कभी बच्चों के घर कोई काम हो जाता है। कभी कोई शादी या अन्य आयोजन, कभी न चाहते हुए भी मौसम के शिकार, कभी अत्यधिक वर्षा/सर्दी/ गर्मी के कारण स्कूल तक आने में परेशानी और कभी-कभी इनकी वजह से जिला या राज्य स्तर से अवकाश घोषित हो जाते हैं। कभी हम शिक्षक अवकाश ले लेते हैं। हालाँकि मैंने निजी रूप से गत सत्र में डेढ़ आकस्मिक अवकाश का ही उपभोग किया है लेकिन ये ज्यादा भी हो सकते थे या हैं। अनुपातिक रूप से राज्यभर की बात करें तो एक सत्र में तकरीबन 150 दिन ही शिक्षण कार्य हो पाता है।
       365 में से 150 दिन बहुत कम नजर आते हैं। आते क्या हैं हैं ही। तिस पर ये विस्तृत पाठ्यक्रम। फिर मेरे जैसा सिरफिरा जब पाठ्यक्रम के साथ-साथ अन्य किस्से कहानियाँ पेलने लगता है तो सिलेबस शैतान की आँत बन जाता है। पाठ्यक्रम में शामिल अधिकांश कवि/कवयित्री और लेखक/लेखिकाओं की अन्य रचनाएँ भी पुस्तकाकार में मिल ही जाती हैं तो उसके बारे में भी दो शब्द कहते-कहते थोड़ा-बहुत समय लगा ही देते हैं( नष्ट कर देते हैं नहीं लिखूँगा)।

        राजकीय विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों की बात करूँ तो अधिकांश प्रतिशत किसान, मजदूर परिवारों का होता है। लिहाजा सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियाँ राह में रोड़े बन ही जाती हैं। घरेलू और कृषि कार्यों में भी हाथ बँटाना पड़ता है। लड़कियों के साथ ये समस्याएँ ज्यादा आती हैं। कई दफा तो ऐसे प्रकरण भी सामने आए हैं कि बच्चे आधी छुट्टी में पशुओं को पानी पिलाने, छाया में बाँधने या खेत मे रोटियाँ पकड़ाने के लिए छुट्टी माँगकर जाते और घण्टी लगने तक दौड़ते-हाँफते स्कूल आते थे। ऐसे बच्चों के प्रति सिर श्रद्धावनत हो जाता था। चूँकि कुछ शरारती या पढ़ाई में मन न लगने वाले बच्चे इन कार्यों की आड़ में बंक मारने की जुगत भी बैठाने की कोशिश करते थे। इनकी सीधी पहचान करने का मेरा निजी तरीका ये था कि कक्षाध्यापक से छुट्टी माँगी है तो बेईमानी कम और जिम्मेदारी बेसी है लेकिन कक्षाध्यापक के उपस्थित होने के बावजूद किसी अन्य अध्यापक से ऐसे ही कार्यों के लिए छुट्टी माँगने का मतलब है कि मन में कुछ काला है।
           खैर समस्याएँ तो आएंगी और इनसे घबराकर दूर भागकर मंजिल नहीं पाई जा सकती। राह में झुककर काँटे निकालने लगे तो दिल का पैरों के घाव देखकर आहत होना लाजिमी है और मंजिल से दूरी बढ़ना भी तय है। हर कोई डॉ. कलाम या बाबा साहब नहीं हो सकते फिर भी सपने देखना भी कहाँ गुनाह है। इन पर न कोई टोल है और न ही कोई टैक्स। बस चलते जाना है, निरंतर, बिना रुके, बिना थके, बिना मुड़े। इंद्रियों को जागृत रखना है। जहाँ से,जैसे भी मिले, कड़वा-मीठा सब ग्रहण करते जाना है। चलते जाना है, बढ़ते जाना है, बहते जाना है। जो बहेगा निस्संदेह जीवनदायी सलिल बनेगा, रुका सो सड़ा। अब तय भी हमें ही करना है कि रुककर सड़ांध मारनी है या बहते हुए धरा, वनस्पति, पशु, पक्षी, मनुष्य का जी तृप्त करना है और खुद को सार्थक।

       ये आदर्श स्थिति हो सकती है। यथार्थ इससे उलट होगा। हमारी सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक बंदिशें, विवशताएँ और हालात बाधक बनेंगे लेकिन जहाँ तक संभव हो, पढ़ाई जारी रखना। विवेक से काम लेना, किसी की अंधभक्ति नहीं करनी, किसी को आदर्श नहीं मानना है। अच्छे-बुरे की परख करना सीखना होगा। दोस्तों का साथ नहीं छोड़ना और बुरा चाहने वालों से दुश्मनी तो नहीं करनी लेकिन दूरी जरूर बनानी है। अपने कच्चे/पक्के घर, माँ, पापा, भाई, बहिन को लेकर अहंकार नहीं करना तो इनके कारण शर्मिंदा होने की जरूरत भी नहीं है। हमारा वजूद इन्हीं से है। अमीर घर से संबंध रखने वाले दोस्तों के सामने अपने गरीब किसान/मजदूर माँ-बाप पर फख्र ही करना है।
     लिखने को तो बहुत कुछ है लेकिन मेरा मानना है कि ज्यादा ज्ञान ढोळने की जरूरत नहीं है। समय और सामाजिक उदाहरणों और ठोकरों से कमोबेश ज्ञान तो आ ही जाएगा।
        मैं चाहता हूँ कि ऊपर लिखी बातों को सलीके/बेसलीके से पढ़ा जाए और मुनासिब हो तो मनन भी किया जा सकता है।

     बाकी फिर कभी। जब भी मन में हुआ, कुछ लिख ही डालेंगे। झेलने के लिए तो आप हैं ही।

   अभिनव सरोवा
11 अक्टूबर 2019
(कचोटिया के पूर्व और पिथूसर के वर्तमान मास्साब)

Tuesday, 8 October 2019

रावण तो रोज बिकते हैं

क्या लगता है
आज रावण बिके थे?
नहीं
पुतले थे सब
रावण तो
बिकते रहे हैं
सालभर
बस
बदलते रहे
राम,
कीमत,
स्थान
और
सदन।

इधर हम
पुतलों को
रावण समझ बैठे
और
रावणों को राम।

अभिनव सरोवा
8 अक्टूबर 2019

Thursday, 3 October 2019

अखबार

अख़बार...

सिर्फ जुबान रखते हैं
नाक, कान, हाथ
पैरों से विहीन।

आजकल बन रहे
प्रचारक भिन्न-भिन्न उत्पादों के।

कब किसान, मजदूर,
सैनिक, बेटी,
नारी और बेरोजगार की
आवाज बनेंगे?

ये सिर्फ जुबान रखते हैं
बोलना जानते हैं
सिर्फ अपनी
कहते हैं।

चूँकि तुम रहे हो क्रांति के अगुवा
तो फिर से अख्तियार करो
वही रूप पुराना
और बदल डालो
मुझ जैसों की अवधारणा।

तुम जरूर दोगे
साथ हमारा
बनोगे हमारी आवाज।

अभिनव सरोवा
5 जनवरी 2019