Saturday, 26 October 2019

चोब और राजनीति

चोब और राजनीति.....

      गाँव के जोहड़ में बने ये खड्डे चोब या ढाब कहलाते थे। कच्चा होता तो चोब और पक्का होता तो जोहड़। चोब या लगभग बीचोंबीच होते थे। इसे कई बार नाभी भी कह दिया जाता था लेकिन हिंदीभाषियों द्वारा। बरसात के दिनों में चारों तरफ का पानी ढलान के कारण दौड़ता हुआ उसमें गिरता था। आदमी और पशुओं के लिए पानी का भंडार। जब तक आदमी ने पानी पीया, पशुओं को अंदर नहीं घुसने दिया। कालांतर में कुएँ, कुंड बने और ये उपेक्षित हो गए। पशु नहाने लगे। भैंसों को तो जैसे जन्नत मिल गई। कीचड़ में सनी देख धणी और धिराणी जरूर करड़-परड़ करते लेकिन भैंसे इससे निरापद रहकर नहाने का मजा लेती। एक समय वो भी था जब भैंस और लड़के साथ-साथ नहा लेते थे। मैं भी उन्हीं खुशनसीबों में हूँ। स्कूल से आने के बाद कई बार उस गंदले पानी में नहाया था। आज के छोहरे तो उस चोब या ढाब के दर्शन के भी नादिदे हैं। समय बीतता गया तो बदलाव होने लाजिमी थे। पानी के साथ तले में मिट्टी जमती गई। निजी स्कूल प्रचलन में आईं। होम वर्क का बोझ बढ़ा, कुछ नजाकत भी। लिहाजा चोब के गंदले पानी मे नहाना बन्द हुआ। भले ही नहाकर पहले की बजाय ज्यादा गंदे ही क्यों न हों लेकिन होता नहाना ही था। कई बार बकरियाँ चराते-चराते नहाने में खो जाते और बकरियाँ पड़ोसी का खेत जीम जाती। ओळमा लेकर कोई आता तो कभी नंगे तो कभी नेकर हाथ मे लिए भागते फिरते। आज ये चोब बच्चों के साथ-साथ भैंसों को भी तरस रही हैं। अब आकड़ों से आबाद हैं।

    यही हाल हमारी राजनीति का भी है। पहले-पहल लोग राजनीति में सेवार्थ आते थे। फिर समय के साथ-साथ नहाने वाली बात भी होने लगी। लोग सेवार्थ की बजाय स्वार्थ को तवज्जो देने लगे। फिर भैसों जैसे काले-कलूटे(काले रंग का अर्थ चमड़ी से न लेकर नीति से लिया जाए) लोग इसमें डुबकी लगाने लगे। अब आम आदमी जीतने के बाद विरोधी विचारधारा वाले खेमे में जाने के बाद अपने नेता पर करड़-परड़ के सिवाय कर ही क्या सकता है। लोग रोजगार और अन्य कार्यों के कारण खुलकर राजनीति न कर इससे दूरी बनाने लगे। लड़कों की तरह। अब तो आकड़ों जैसे बेकार लोगों की शरणस्थली बनी हुई है ये चोब। नाभी भी है लेकिन बिलकुल छिछली। गहराई तो रही ही नहीं। आकड़ों के सूखे पत्ते जैसे हवा के साथ चक्करी चढ़कर इधर-उधर डोलते फिरते रहते हैं वैसे ही हमारे नेता लोग भी हवा(राजनीति की हवा) के साथ कभी इसके साथ, कभी उसके साथ। कोई ओळमा दे तो मुँह लटका देते हैं या अपने चेले-चपाटों की संख्या देखकर आक्रामक भी हो जाते हैं। जैसे भी बस देश सेवा(?) करने की जुगत बैठाते रहते हैं।

   अब तय देश की जनता को करना है कि हमें आकड़ों को किस तरह निकाल बाहर करना है। जब तक जड़ नहीं खोदी जाएगी, इनकी वंशवृध्दि होती रहेगी और हम हाथ मलते रहेंगे।काँकरें फेंकते रहेंगे जैसे दूध की टेम पर पानी मे बैठी भैंस को निकालने के लिए उसका ग्वाला फेंकता था लेकिन भैंस थी कि नेता बनी रहती!

अभिनव
26 अक्टूबर 2019

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