शहीद के पिता- (भाग पहला)
यही कोई ढलती रात का
समय रहा होगा
उसके सिरहाने रखा फोन
चीख पड़ा
हेल्लो......।
हेल्लो, मैं अमुक यूनिट से बोल रहा हूँ।
देश की हिफाजत में
कुरबान होना
हर किसी के भाग्य में नहीं होता
ये लोग मरते नहीं
शहीद होते हैं।
वतन की आबरू
के असली रखवाले यही हैं।
मुझे बड़े दुःख और गर्व के साथ कहना पड़ रहा है कि
आपका बेटा बहुत वीर था।
आखिरी साँस तक लड़ा।
आज से आप
एक शहीद के पिता कहलाओगे।
हेल्लो.....
आप मेरी आवाज सुन रहे हैं?
इधर से महज एक गहरी साँस
सुनाई दी।
धरा स्तब्ध
हवा मौन
आसमाँ भी रो पड़ा।
बादल से कुछ बिंदु झड़े और
सींच गए घुटनों को।
जिस हाथ में फोन था
जैसे किसी ने काट दिया
या
उखाड़ लिया कंधे से।
गमछा पड़ा था सिरहाने
पर जब हाथ ही नहीं
तो कैसे पोंछे आसमाँ
के दोनों बादलों को?
अनायास ही आँगन से
घड़े और लोटे की आपसी
बातें सुनकर हाथ उग आए
और नदी की बहती धार को
एक ही रगड़ में सूखा डाला।
बादलों के नीचे तान दी
काली चद्दर
कि कोई बूँद जमीं पर
न गिर सके
प्राची से रक्तिम लाली फूटी
जैसे अभी-अभी खून से नहाई है।
चाय का कप लेकर
जोड़ायत 'मुँह धो ल्यो'
के शाश्वत वचन सहित
हाजिर हुई और कप बढ़ा दिया।
उसे लगा कप में चाय नहीं
मेरा अपना खून है
जो निकाला है किसी ने
मेरा अपना कलेजा फाड़कर।
न उगलते बन रहा
न निगलते।
सोचा- जहर ले आती।
काँपते हाथ मुँह के पास किए रहा
और नीचे रखने के बहाने
सींच दिया खाट का पाया।
इस दरम्यान वार्ता जारी रही
पर इकतरफा
एक वाचाल
एक मौन।
'मैं खेत जाऊँ'
हेल्लो के बाद के
आज के दूसरे बोल थे।
रास्ता पैरों के भारीपन के बोझ से
तड़प रहा था
पर मौन था, मूक था।
परिंदों की जुबाँ को जैसे
लकवा मार गया।
मोर अपनी शाख से
नदारद था।
ढाणी वाले काका का कुत्ता
भी तो आज लाचार है।
दोनों पैरों पर मुँह टिकाए
कान लटकाए
आँख झुकाए
बैठा है।
गर्दन उठाने की हिम्मत नहीं
सिर्फ पुतलियों को घुमाकर देख लिया।
काका बोले- चाय पिस्यां।
वापिस आते पीऊँगा।
अभी तो हर खेजड़ी से बात करनी है
जिसे छाँगा था उसने कभी
और हर उस झाड़ी (बेरी) से
जो लदी पड़ी है बेरों से
उसे भी तो समाचार देना है।
जमीं में दबे उस मतीरे को भी तो
खबर करनी है।
हर खेजड़ी से बाँथ भर-भरकर रोया
चारों सीमा घूमा
झोपड़ी में भी गया
पर बोला कुछ नहीं
पता नहीं जानबूझकर या
बोला गया नहीं।
फिर खेत के बीच में खड़ा होकर
लड़खड़ाती जीभ से
भर्राई आवाज में
इतना ही कह पाया-
झाड़ी के बेरों तुम झड़ जाओ
जमीं के मतीरों तुम सड़ना चाहो तो
सड़ जाओ।
तुम्हें खाने वाला अब कभी नहीं आएगा।
खेजडियो! तुम्हें गंडासी से छाँगने वाला
आज खुद किसी की गंडासी से
छाँग दिया गया।
अभिनव सरोवा
28 अक्टूबर 2018
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