मैं क्यों लिखूँ....?
मैं क्यों लिखूँ
किसी की पीड़
क्या पड़ी है मुझे?
बहुत देखे
इनके जैसे।
मैं ही हूँ क्या
और भी तो बहुत हैं
बहुत आगे गए
बहुत-से पीछे भी आ रहे हैं।
मैं ही क्यों लिखूँ
इनकी पीड़?
किसान का अभाव
मजदूर की तंगी
भिखारी की याचना
नारी की लाचारी और व्यस्तता
ये सब हमें
विरासत में मिलीं।
ये लगते भी क्या हैं
हमारे?
कोई रिश्ता थोड़े ही है।
हमारे पुरखों ने
बड़े जतन से
हमारे लिए संभालकर रखी।
सो हम भी नहीं लिखेंगे
कहीं आने वाली पीढ़ी
हमें उलाहना न दे दे
कि आपने छीन लिया
म्यूजियम हमारा
अब हम क्या देखें?
तब संग्रहालयों में
इनके पुतले लगाने पड़ेंगे
हम ऐसा नहीं चाहते
कि जो चीज सर्वसुलभ हो
उसके लिए भी खर्च करना पड़े।
अंततः हमने तय किया
कि बचाकर रखेंगे
विरासत अपनी
ताकि देख सके
भावी पीढ़ी हमारी
ये खो न जाए कहीं
इसलिए
करेंगे बाड़बंदी
और
रखेंगे इन्हें
यथास्थिति में।
अब मैं न लिखूँगा
इनकी पीड़।
अभिनव सरोवा
13 नवम्बर 2018
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