Saturday, 17 November 2018

मतभेद बनाम मनभेद

ये जो वैचारिक मतभेद हैं न
ये फगत विचारों तक होते तो ठीक था
पर ये विचारों के नहीं
संस्कारों के भेद हैं।

एक तरफ इनके विचार हैं
जो संस्कारों की बुनियाद पर खड़े हैं।

दूसरी तरफ उनके विचार
जो खड़े हैं- जातीय अहंकार पर।

इस मतभेद की मूल
सदियों से दबी पीड़ा और
इनको अवसर की अनुपलब्धता है।

जाहिर है, जहाँ मतभेद है
वहाँ मनभेद भी है।

मुँह में राम
बाकि सब छुरी ही छुरी हैं।

खैरियत ये है कि
मुँह में भी तभी तक राम है
जब तक ये मौन हैं।

जब कभी खुलता है मुख
तब चलते हैं
जहर बुझे बाण।

कमलनयन दृष्टिपात नहीं
कुठाराघात करते हैं।

चरणकमल भी
लातों की भाषा बोलने लगते हैं।

क्योंकि मतभेद की जड़ में
मनभेद जो ठहरा।

जब मत ही भिन्न है तो
क्यों दावा करते हो
मन के ऐक्य का?

वो मूढ़ समझते हैं कि
ये भेद आज उपजा है।

नहीं......

बीज इसके तुमने ही दबाए थे
कभी परंपरा के बहाने
कभी धन के बहाने
कभी धर्म के बहाने
कभी जाति के बहाने
कभी कर्म के बहाने
कभी लिंग के बहाने।

अब जब ये अंकुर निकल ही आया है
तो क्यों घुट रहे हो
भीतर ही भीतर?

सोचो! जिस दिन ये बन गया
वट-वृक्ष.....?

पर तुम काटते हो
लताओं से लटकती जड़ों को
छाया में बैठने के बहाने
चबूतरा बनाने के बहाने
चौक बनाने के बहाने।

और इस पेड़ की वृद्धि को
कर देते हो कुंठित।

पर कितने दिन.....?

जो कहते हैं कि
मतभेद भले ही हो पर
मनभेद नहीं है।

वो सबसे खतरनाक हैं।

अभिनव सरोवा

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