वो सुलगता है दिनभर
तब जाकर जलता है
चूल्हा घर का।
वो बहाता है पसीना
तब लगता है
आटा उसके घर।
नमक का नमकीनपन
आया है उसके
कुर्त्ते पर जमी सफेदी से।
पानी ने सरलपन
चुराया है
इसके ही शील से।
सूरज भी तो उगता-छिपता है
उसके जगने-सोने के साथ।
तारे टिमटिमाते हैं
उसकी आँखों की तरह।
चाँद भी घटता-बढ़ता
उसके सुख-दुःख के साथ।
पत्ते झड़ते हैं
उसके गमों की तरह
आती हैं नई कोंपलें
उसकी मुस्कराहट के जैसे।
हवा भी लेती है गति
उसकी साँसों से।
आँधी चलती है जब
वो छोड़ता है
गहरी निःश्वास।
जब देखकर
लहलहाती फसल
वो होता है खुश
तब दौड़ती है एक लहर
खेत में,
उसके तन में, मन में
सारे जहाँ में।
अभिनव सरोवा
25 जनवरी 2019
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