तू बन जा तीर...
तू भिड़, मार टक्कर
काट दे जीभ बड़बोलों की
फोड़ दे आँख बुरी नजर वालों की
नोच ले चेहरे से मुखोटे
तोड़ दे रीढ़ महँगाई की
मरोड़ दे हाथ
शोषणकारी व्यवस्था और
उसके पोषकों के
रोक दे कदम लाशों से गुजरने वालों के।
डर मत कि तू अकेला है
तूने सुना है कभी
बीज अकेला होकर भी न उगा हो
अँधेरे ने कभी सवेरा न होने दिया हो
ख़ुशी या गम में न छलकी हो आँखें।
तीर तो चलता ही अकेला है
बना प्रत्यंचा साहस को
हिम्मत को कमान
फिर देख
कैसे बढ़ते हैं
तेरे तरकस के तीर।
तू बन
उस तरकस का तीर
जो साधे निशाना
समाज की विसंगतियों पर
जंग आखिर तुझे ही जीतनी है
ये दुनिया तुझे ही बदलनी है।
अभिनव सरोवा
24 जनवरी 2019
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