रार अभी भी है...
रार थी उसकी
व्यवस्था से
छद्म हितेषियों से
अपने ही पेट से
न सूखते पसीने से
रोज पड़ते अकाल से
तपती धूप से
आवारा पशुओं से
लालची बँटाईदारों से
सामाजिक विद्रूपताओं और
विसंगतियों से।
रार अभी भी है
बढ़ गए दुश्मन
उग आए रक्तबीज-से
ठन गई उसकी
धर्म-ध्वज-वाहक-पूत से
राजनीतिक साँकळ खाते बंधुओं से
फैलती नशे की आदत से
बढ़ती बेरोजगारी से
बेटी के दहेज़ से
बाजार की महँगाई से
ईर्ष्यालु रिश्तों से
गिरते स्वास्थ्य से
मंडी के दलालों से।
पर उसने हिम्मत न छोड़ी
लड़ रहा है अभी भी
हारा नहीं है
थका नहीं है
वो किसान है
वो मजदूर है।
अभिनव सरोवा
20 जनवरी 2019
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