Friday, 26 October 2018

राड़ और मुक्ति

राड़ और मुक्ति-

तेरी राड़ तुझसे है
खुद से बड़ा बैरी
इस ज़माने में नहीं।

जमाना तो है
तुझे ये एहसास दिलाने
कि कम न होने देंगे
तेरी पीड़ा, दुःख, संताप।

समझ सकते हैं-

खुद से लड़ना
आसां नहीं।
सब कुछ टूट जाता है
थोड़ा-सा पाने में।

आँख आँख न रहीं
अकाल की कंदराएँ हो गई
जहाँ न घास है
न पानी
और न जीवन की आस।

चेहरे की झुर्रियाँ भी तो
बालू के निर्जन धोरों की
लहरें बनी हैं।

पीठ झुककर
बदन को
कमान बनाए दे रही है।

गर लड़ना है खुद से तो
करना होगा कुछ हटकर
अपनी संतान को
सिर्फ संस्कार
दरांत, फावड़ा
जेई और गंडासी
ही मत दे।

उन्हें नए जमाने से
लड़ना है तो
कुछ और भी देना होगा।

इसलिए
अपना जखीरा बढ़ा
खरीद या चुरा
पर
चुराना तेरे लिए मुमकिन कहाँ

खैर
तू नए हथियार ले
और दे अपनी संतान को
कुछ नाम सुझा रहा हूँ
बाकि खुद सोच लेना-
पहला कलम
दूसरा वैज्ञानिक चिंतन
और तीसरा तर्क।

निश्चिन्त न हो
इसकी बाड़बंदी भी करनी है
बचाना है इसे
ज़माने से और
मिटाना है इससे ज़माने की
विसंगतियों को।

तो देख
इस बारूद को बचा
नशे की चिंगारी से
और अन्धविश्वास की
'शॉर्ट सर्किट' से। 

फिर तू खुद से भले ही
जीते न जीते
पर न लड़ने का मलाल तो
न रहेगा।

अभिनव सरोवा
26 अक्टूबर 2018

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