Wednesday, 24 October 2018

श्रम देवी

श्रम देवी-

हर सुबह
निपटाकर
घरेलू काम
वो चल देती है
दुनिया के सबसे विराट
(किंतु बर्बर भी)
ब्यूटी पार्लर में।
जहाँ सूरज उसके
माथे पर सजने को
बैठा है तैयार।

वो फगत माथे ही नहीं
बल्कि पूरे चेहरे की
पारदर्शी बिंदुओं को
बना देता है रंगीन, चमकीला।
लाली और काजल विहीन
उसके मुखावरण पर
देख अगणित श्रमकण,
तारे भी तो
धुन रहे हैं
सिर अपना।

तारागण की नाराजगी भी तो
जायज है,
सही है दलील उनकी भी
कि सूरज अकेला
थोड़े ही है?
हम भी चेहरे के नूर को
बनाते हैं प्रकाशमान।

इधर हवा भी तो आतुर है
उसे कंघी भी करनी है और
सँवारने हैं रुखसार भी।
पर.....
कुछ सोचकर
शायद यही कि
रूठ न जाए, सूख न जाए
माथे की तरल बिंदिया
देती विराम गति को अपनी।

उधर रूप का धनी
चाँद भी तो
अपने ज्ञान से दे रहा है
ब्यूटी टिप्स
वो शायद क्षितिज पर
आइना थामे या
उसकी ओट लिए
बैठा है उसके पीछे।

इन सबसे बेखबर
ये श्रमदेवी
कर रही अपना सिंगार
वो मन की लाली को
छिटका रही 
न केवल चेहरे
अपितु प्रकृत्ति पर
और साथ ही हर उस आँख में
जो देख रही रूप उसका।

तारों और सूरज की बिंदिया से
उसे क्या वास्ता!
वो अपने निर्मल हृदय-सागर से
खींच रही श्रम-कण
और छिड़क रही
भाल-जगत्-क्यारी में।

लोग भले ही दें
ताव अपनी मूँछों पर
तुम देखो
मेरी मूँछों का बाँकपन।

ऐ सूरज!
ऐ चाँद!
ऐ हवा!
ओ तारो!
मेरी आवाज सुन सको तो
सुनो कान खोलकर
ये सिंगार मेरे अपने नहीं
भावी पीढ़ी की
खुशहाली के लिए हैं।

मेरी पीढ़ी मुझ पर नाज़ करेगी
मैं पूरी कायनात को
सर्वसुलभ पार्लर न बना दूँ तो कहना।

(प्रयास अभी भी अपूर्ण है)

अभिनव सरोवा
24 अक्टूबर 2018

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