Saturday, 12 August 2017

कचोटिया की आँखों देखी...

जब आपसे कोई उम्मीद लगाए बैठे हों और खासकर वो भी बच्चे तो लाजिमी हो जाता है कि हमें अपने पद के बोझ को कुछ देर के लिए अलग रखकर हर वो भूमिका अख्तियार कर लेनी चाहिए जिसकी प्रतीक्षा बच्चे कर रहे हैं। वैसे पद के अनावश्यक बोझ को छोड़ देने के पश्चात एक तरफ व्यक्ति जहाँ खुद को हल्का महसूस करेगा वहीं उसकी कार्यक्षमता में भी काफी इजाफा भी हो जाता है।

        हमारा कर्त्तव्य तब और भी ज्यादा मजबूती  से हमारे समक्ष एक चुनौती के रूप में आ खड़ा होता है जब हमारा सामना उस पीढ़ी से हो रहा है जब मोबाइल जैसी युक्ति के द्वारा उन्होंने संसार-सागर को अपनी मुट्ठी में कर रखा हो। हम स्कूल में मोबाइल के प्रयोग से रोक सकते हैं पर घर पर तो अवश्य ही काम मे लेते होंगे। दुनिया के साथ कदम-ताल बनाये रखने के लिए जरूरी भी है।

         आप बच्चों के सामने जब भी खड़े होते हैं तब बच्चे आपको ध्यान से सुन रहे हैं इसके दो अर्थ निकलते हैं। एक बच्चे आपसे सीखने का प्रयास कर रहे हैं। दो बच्चों में आपके पद का खौफ है। पहली स्थिति जहाँ हमारे और बच्चों के लिए हितकारी है वहीं दूसरी हमारे और बच्चों के लिए अहितकारी।

       मुझे इन बच्चों के लिए कई तरह के रोल निभाने पड़ रहे हैं। मैं भी खुश बच्चे भी खुश। और क्या चाहिए? जिनके पैरों तले आज तक धरती हिलती रही थी वे भी आज सहर्ष राष्ट्रीय कार्यक्रम का हिस्सा बनने को लालायित हैं। अपने साथी अध्यापक रवि जी, महेंद्र जी, राजेन्द्र जी, नारायण जी, गणेश जी, गिरिराज जी, कन्हैयालाल जी, लालूराम जी और प्रधानाचार्य श्री राजकुमार सिंह जी के सहयोग से सभी कार्य सुगम होते जा रहे है। साथी शिक्षिकाओं का सहयोग भी अविस्मरणीय है।

कचोटिया की आँखों देखी और खुद भुगती...

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