Friday, 29 December 2017

काली हवेली

ये ऊँची काली-बदरंग हवेलियाँ
रही होंगी किसी जमाने में
तुम्हारी शान-औ-शौकत की प्रतीक,
किसी जमाने में इनकी चमक
तुम्हारे ठाठ को दर्शाती होंगी!

मेरी नजर में-

ठाठ नहीं अपितु तुम्हारे उन होठों के प्रतिबिम्ब हैं
जिनसे पिया था तुमने
मजदूरों, किसानों सहित जनता का लहू।

पर अब उनका रंग काला और बदरंग जो हो गया है।
वो हकीकत बयां हो रहा है,
वो वाकई में उस हवेली का नहीं बल्कि
काला रंग पसीने में नहाए
बेगार करने वालों का
और
बदरंग उनके जिस्म को ढकने वाले फ़टे-पुराने लिबास का
प्रतीक है।

उनमें बोलते कबूतर
निरीह जन की करुण व्यथा
और
उल्टे लटके चमगादड़
जनता में तुम्हारे भय और अत्यचार की कहानी
आज भी चीख-चीखकर कह रहे हैं।

हर कोने में लगे मकड़ी के जाले और उनमें फँसे कीट,
तुम्हारे अत्याचार, बैठ-बेगार और माळ में फँसी जनता है।

हो सकता है तुम्हे न दिखे पर
इसके लिए आँखें चाहिए जो
तुम्हारे पास कहाँ से आएँगी?

अभिनव सरोवा

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