कार्तिक में देख खलिहान
विवश हुआ यूँ सोचने को
इस बार खेत न बोउँगा
न बारह महीनों का अनाज
न सालभर का चारा
खर्चा भी तो बहुत हो जाता है
हर बार उधारी बढ़ती जा रही है।
बेटे के फॉर्म भरने और
बेटी के लिए रिश्ता देखना
कुछ भी तो ठीक से न हो रहा है
पत्नी आज भी फटी ओढ़नी से
न सिर्फ आँचल ढकती है
बल्कि मेरे स्व-युद्ध की
सबसे बड़ी सेनापति है
मेरी हार-जीत का नतीजा भी तो
इसी के दम से तय होगा।
मंगसिर, पौष, माघ और फागुन
इसी संकल्प को पोषित करते रहे
पर चैत्र में नजरें आसमान की
सैर करने को लालायित हो उठी।
कदाचित विचार न था पर
वैशाख में फावड़े में डंडा
लगवा ही लिया
और एक रोज पौ फटने से पहले ही
खुद को खेत में पाता है।
जमकर पसीना बहाने के बाद
दोपहर को अंतड़ियाँ
कुछ माँग करने लगी तब
घर पहुँचते ही
पत्नी ने दाग दिया पहला सवाल
कहाँ थे इत्ती देर?
आँख चुराते हुए उसने जवाब दिया
इस बार लू बहुत चली हैं
खेत तैयार है, फसल बढ़िया होगी
और
घरणी ने भी कुछ ऐसी ही
आशा रख दी सामने
फिर दोनों खो गए
उनके सपने पूरे होते दिख रहे हैं।
एक बार फिर से दोनों के आशावाद ने
दुनिया के हर 'वाद' को ठेंगा दिखा दिया।
हर 'वाद' इनके आशावाद से हार गया।
अभिनव सरोवा
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