तीन फसल एकर सागै--
कांकड़ पर खड्य रामू काकै नै
जदै खेत गो ध्यान राखण गो कह गी
हरियो घरै कानी बावडयो
तदै चिलम को ओळाव लैगी
रामू काको हरिये नै रोक लियो।
हरिये गो निस्तेज मुँह देख गी
काको बुझ बैठ्यो के- घरै सै ठीक तो है नीं?
हरियो बोल्यो- काका! के बताऊँ?
थारी बिनणी दो कुढ़ा होण हाळी है।
डागदर खास ध्यान राखण गो कह्यो है।
आज माँ-बाबो हुता तो कीं टेंशन कोनी होवती।
अर न्यारा होयां पछै भाभ्यां तो म्हारो फळसो इज भूलगी।
मैं सोचूँ, कियाँ पेश चढ़ सी?
ईयाँ कहगी हरियो घरे कानी भीर हुयो,
राह बगतो बो अपण-आप स्यूं लड़ै हो-
तीन फसलां एकर सागै ऊभी हैं-
एक खेत में खड़ी है।
दूजी जोड़ायत गै पेट मै पळै ही।
अर तीसरी फसल जो सस्यूं जाड़ी अर उलझ-पुलझ होरी ही,
हरिये गै मगज माँहीं ऊभी ही।
अभिनव सरोवा
1 जनवरी 2018
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