*पुस्तक समीक्षा*
*अपने समय का भावनात्मक दस्तावेज है कुमार अजय की डायरी*
हाल ही में प्रकाशित कुमार अजय की डायरी ‘मैं चाहूं तो मुस्करा सकता हूूं’ में अपनी काबिलियत और बहुदर्शिता का परिचय देते हुए लेखक ने आपबीती और जगबीती को समेटते हुए परिवार, समाज, राजनीति, अर्थशास्त्रा, इतिहास, सिनेमा और मानवीय रिश्तों पर अपना नजरिया इस तरह रखा है कि पाठक डायरी में ही कहानी, संस्मरण, रेखाचित्र, व्यंग्य जैसी विधाओं जैसा रसास्वादन करते चलता है। सामान्य से विषय या घटना पर भी बात कहने का अलहदा अंदाज लेखक की खासियत बनकर सामने आया है। अकथ्य में कथा कहने की कला लेखक को भीड़ से जुदा खड़ा करती है। डायरी विधा की इस पुस्तक में आप लेखक की बेबाकी, चुटीलेपन, गांभीर्य, प्रेम और उदासी के साथ-साथ एक जीवन-दर्शन से रूबरू होते हैं। पाठक इस डायरी के बहाने अपने बचपन या उम्र के किसी भी पड़ाव पर घटित घटना को स्मरण करके स्मृति के पंखों से उड़ान भर सकता है।
चित्रकार रामकिशन अडिग के बनाए आवरण चित्र से सजी पुस्तक में हमें लेखक की एक अजनबी प्रेमिका से भी मिलने का अवसर मिलता है। उदासी के चरम लम्हों में लेखक अपनी प्रेयसी को संबोधित कर मन हल्का करने का जतन करते देखा जाता है और इसी प्रयास में जाने-अनजाने पाठक को भी उदासी का आवरण ओढ़ा देता है। वैसे तो पुस्तक में लेखक की उदासी हर जगह मिलती है और ये उदासी भी उन्होंने खुद गले लगाई है। पढ़ते हुए लगता है कि लेखक अपनी प्रिय उदासी को बड़े ही सम्मान के साथ सहेज रहा है। प्रेम से उपजी उदासी भी प्रेयसी जैसी ही प्यारी है।
सामयिक प्रसंगों को पढ़ते हुए कहा जा सकता है कि पुस्तक अपने समय का संक्षिप्त इतिहास है जिसकेे बहाने आप भूत और वर्तमान की राजनीति, ग्रामीण जीवन की सरसता, अखबारों की उडीक और उनके महत्त्व, संयुक्त और एकल परिवार, प्यार-मोहब्बत, शिक्षा, रोजगार, परीक्षा, पर्यटन, बारिश, आंधी-तूफान, संगीत, गजल, फिल्म, कार्यालयी कार्य, नाम की लालसा, दोस्ती, दोस्ती में आर्थिक और अन्य सहायता, संवादहीनता, पुरुषवादी मानसिकता वाले समाज में नारी की स्थिति, जातीय गौरव, जातिवाद, विवाह, प्रेम-विवाह, तलाक, धार्मिक कट्टरता इत्यादि विषयों पर लेखक की राय और मत से रूबरू होते हैं और थोड़े मतभेद के साथ कहीं न कहीं सहमत भी। विसंगतियों को व्यंग्य के साथ कहने में जैसे लेखक को महारथ हासिल है।
पुस्तक में जनवरी 2018 से दिसंबर 2018 तक के 32 दिनों के प्रसंग रोचक, आकर्षक और जिज्ञासा जगाने वाले शीर्षकों के साथ लिखे गए हैं। शीर्षक से एक साथ कई सवाल उठते हैं और लेखक अपनी डायरी में उनका समाधान करते हुए पाठक को सरसता से सरोबार करता है। कुछ ऐसे ही शीर्षकों की रोचकता और सरसता देखिए - ‘लुटते रहिए, मुस्कराते रहिए’ ( भला कोई लुटकर कैसे मुस्कराए, पर लेखक इसे साबित करते हैं), ‘फाल्गुन का महीना और दर्दनाक परीक्षाएं’, ‘सबको मालूम है मैं शराबी नहीं’, ‘जुराबों की महक और दिमागों की सड़ांध’, ‘कितने दिन हुए खुद से मिले हुए’, ‘आपका डर कुछ लोगों के लिए संभावना है’ इत्यादि। ये सब शीर्षक लेखक के शब्द-भंडार और व्यापक दृष्टिकोण के परिचायक हैं और यही शीर्षक पाठक के मन में जल्द से जल्द अंतिम पेज तक जाने की उद्विग्नता पैदा करते हैं। ‘फजल का बंगला’ में वे न केवल अपने ताऊजी को याद करते हैं बल्कि पाठक को भी उसकी जिन्दगी के किसी वटवृक्ष (बुजुर्ग) की याद दिला देते हैं। ये हमारी बिखरती हुई पारिवारिक स्थिति के लिए संजीवनी के समान है। कुमार अजय की भावनाओं में एक तरफ बच्चों की सी नादानी और लापरवाही है तो किशोर की सी अल्हड़ता भी है। प्रौढ़ की सी जिम्मेदारियों से भरी हुई उलझनें भी हैं तो वृद्धों की सी वर्तमान और भविष्य की चिंताएं भी यहां हैं।
सच में, यह डायरी लेखक के यायावर होने का लिखित दस्तावेज है। तकल्लुफ आपको पसंद नहीं। इसी बेतकल्लुफी में एक सम्मोहन है जो पाठक को बांधकर रख लेता है। कभी हम उनके साथ रन फाॅर जोधपुर में दौड़ लगाते हैं तो कभी नाडोल में पुरातत्त्व सर्वेक्षण कर रहे होते हैं तो हिमाचल की वादियों में पीठ पर बोझा लादे स्थानीय लोगों से बात कर रहे होते हैं। आप इसी पर्यटन के सहारे लोगों के जीवन, रहन-सहन, वेशभूषा और स्थानीय समस्याओं पर ध्यान आकर्षित केंद्रित करते हैं। मन में उद्वेलन की स्थिति पैदा हो जाती है। नाडोल की पुरातात्त्विक खुदाई के बहाने डायरी में आम और खास में सदियों से चले आ रहे मत-मतांतर को रेखांकित किया गया है। वर्तमान और भविष्य की चिंता छोड़ भूत के मोह पर व्यक्त विचार किसी भी सहृदय को सोचने पर विवश कर देते हैं। ’आम के बिना खास की क्या औकात?’ जैसी पंक्तियां सोचने को बहुत कुछ दे जाती हैं। एक स्वप्न के बहाने प्राप्त और अप्राप्त पर दार्शनिक विचार मिलते हैं कि जब कोई चीज उपलब्ध नहीं थी तो उसकी चाह थी, आज वो उपलब्ध है तो दिल पुनः उसी अभाव में जाने को तिलमिला उठता है। सुख-सुविधा अकसर साथ में प्रयुक्त किये जाने वाले शब्द हैं लेकिन दोनों में मूलभूत अंतर है। सुविधा जहां भौतिक पदार्थ है तो सुख एक मानसिक स्थिति। जरूरी नहीं कि जहां सुविधाएं हैं, वहां सुख भी हो।
‘नेमप्लेट और कुत्ते’ में कुमार अजय व्यंग्य के सहारे कितना कुछ कह जाते हैं। मसलन- ‘कुत्तों का यह आदमीचारा देखकर बहुत तसल्ली-सी होती है, उतनी ही जितनी आदमी का कुत्तापन देखकर तकलीफ होती है।’
तकनीकी और संचार क्रांति के वर्तमान दौर में जब अखबार या टीवी पर खबरों के विषय बदल गए हैं, ऐसे में कुछ विषयों को लेखक ने विस्तार दिया है, यथा- फिल्म ‘संजू’, नाडोल का पुरातात्त्विक उत्त्खनन, जोधपुर स्थापना दिवस इत्यादि। किताब के जरिए कुमार अजय में छिपे एक काबिल पत्रकार की झलक भी अकसर मिलती है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के व्यक्तित्त्वों के माध्यम से देश-दुनिया की बातों पर ध्यानाकर्षण किया गया है। लिहाजा मोदी जी, आडवाणी जी, अनूप जलोटा, संजय दत्त, राजेन्द्र यादव और मैत्रेयी पुष्पा, मोनिका सेलेस, स्टेफी ग्राफ, पंकज उधास जैसे लोगों से सम्बद्ध उद्धरण देखने-पढ़ने को मिलते हैं। अनूप जलोटा के अपनी शिष्या से संबंधों पर वे लिखते हैं कि उनकी जिंदगी जरूर निजी है लेकिन सरोकार तो सार्वजनिक हैं ही। विवाह जैसी सामाजिक संस्था पर लेखक लिखते हैं कि जरूरी नहीं कि विवाह या प्रेम-विवाह के बाद दोनों में तालमेल बना ही रहे। ऐसी स्थिति में तलाक होना कोई बड़ी बात नहीं। एक-दूजे को ढोने से बेहतर है अलग हो जाना। तलाक को विवाह की विफलता मानना एक प्रकार का पूर्वाग्रह ही है। यदि एक परिपक्व निर्णय के साथ एक खूबसूरत मोड़ पर दोनों अलग हो रहे हैं तो गलत भी क्या है। झेलने से बेहतर है अपनी अलग दुनिया बसाना। हालांकि सब इससे सहमत नहीं होंगे पर ये विचार एक सवाल तो छोड़ता ही है।
इसी प्रकार अज्ञात काल में लिखी गई महाभारत के पात्र शिखंडी से लेकर नाडोल की प्राचीन सभ्यता, राजीव गांधी की हत्या, इराक पर अमरीकी आक्रमण और सद्दाम हुसैन की फांसी, तहलका डाॅट काॅम द्वारा उजागर किए गए घोटाले, क्रिकेट मैच फिक्सिंग, गुजरात दंगे, नसीरुद्दीन शाह का बयान और राष्ट्रवादियों द्वारा की गई हरकतों से होते हुए वर्तमान समय की एक डाॅक्यूमेंटरी फिल्म जैस बन पड़ी है यह पुस्तक।
इधर, लोग जब पूरी तरह नकारात्मकता भरी बातें कर रहे हैं, तब किताब कहती है कि दुनिया इतनी बुरी नहीं है जितना उसे बताया जा रहा है। अपने आर्थिक अप्रबंधन के बहाने लेखक ने उधार देने वाले दोस्तों के लिए कृतज्ञता भी ज्ञापित कर दी है। भाषा की टूटती वर्जनाएं पुस्तक की खूबसूरती को बढ़ाती ही हैं। हिंदी, उर्दू, अरबी के साथ-साथ राजस्थानी भाषा के शब्दों का भी भरपूर इस्तेमाल प्रसंग को अधिक रोचक बनाता है। फेसबुकिया युवा पीढ़ी जिन शब्दों और अर्थों से वंचित है, ऐसे ‘ल्हस’, ‘मिरकली’, ‘अगूण’, ‘आथूण’, ‘नारेळ’, जैसे शब्दों के इस्तेमाल से किताब सम्मोहक बन पड़ी है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह किताब हमारे समय का एक भावनात्मक और संवेदनात्मक दस्तावेज है, अपने समय की व्यस्तताओं में खुद से मिलने की कहानी है। पुस्तक समाज, देश-दुनिया में घटित हो रही अप्रत्याशित घटनाओं को देखते हुए भी उनसे खुद को बचाने की कला सिखाती है। यह भी कह सकते हैं कि कुमार अजय की यह पुस्तक हमें बचपन की याद दिलाने वाला ब्लैक- व्हाइट टीवी है, एंटीना बदलते रहिए और आगे बढ़ते रहिए।
अभिनव सरोवा
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