अपने राष्ट्रीय
या कहें कि सामाजिक
चरित्र के मुताबिक
उसने भी
आज
देश के विकास
और समाज के
उत्थान में
अपना 'भरपूर'
योगदान दे डाला।
ठीक वैसे ही
जैसे व्यापारी
देता है
कालाबाज़ारी
मुनाफाखोरी
मिलावट
नकली और
घटिया सामान
बेचकर।
ठीक वैसे ही
जैसे
मीडिया करता है
महँगाई
बेरोजगारी
मंदी और
भ्रष्टाचार को
ताक पर रखकर
हिन्दू-मुस्लिम
या पाकिस्तान पर
बहस।
ठीक वैसे ही
जैसे
गणतंत्र और
स्वतंत्र में
अंतर
न जानने वाले
ठहरा देते हैं
एक वर्ग को
देशद्रोही।
ठीक वैसे ही
जैसे
एक आम आदमी
जहाँ भर से डरे
या
जाते ही
उतारी जाती है
इज्जत उसकी
वहीं
हाँ, ठीक वहीं
किसी अपराधी
के लिए
हो जाता है
चाय-नाश्ते
या
चिकन-खंभे
का बंदोबस्त।
ठीक वैसे ही
जैसे
सुबह-सुबह
एक निर्जीव मूर्ति को
लगा धूप-बत्ती
पढ़कर दो श्लोक
लगा
साथियों संग ठट्ठे
कितनी सहजता से
कह देते हैं
इन्हें कुछ नहीं आता
ये पास नहीं हो सकते
किसी भी सूरत में।
ठीक वैसे ही
जैसे
तिरपन की टिकट में
छोड़कर तीन रुपये
वो डकार जाता है
बाकी के पचास
और
एक चोर निगाह
मंद मुस्कान
या
एक आँख मारकर
हम भी बचा लेते हैं
'तीन' रुपये।
ठीक वैसे ही
उसने भी
घर में बचे
सीमेंट-गारे से
गली की
सीसी रोड़ पर
घर के
दरवाजे के
आजू-बाजू
ठोक डाले
दो ब्रेकर।
अब हर कोई
उसे
स
ला
म
ठोककर
ही
जाएगा।
अभिनव
19 फरवरी 2020
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