बस्ता मुक्त शनिवार
राजस्थान सरकार द्वारा वर्ष 2020-21 के लिए 20 फरवरी 2020 को बजट पेश किया गया। मुख्यमंत्री सह वित्तमंत्री श्री अशोक गहलोत ने शैक्षिक नवाचारों के क्रम में सप्ताह के प्रत्येक शनिवार को बस्ता मुक्त दिवस (बैग फ्री डे) घोषित किया है। इस दिन बच्चे विद्यालय तो आएँगे लेकिन बस्ता नहीं लाएँगे। यह बहुत ही उम्दा पहल है। वास्तव में देखा जाए तो बच्चों के लिए बचपन को जीने का दिन होगा ये। इसके लिए शिक्षक परिवार को अपने विद्यालय के बच्चों की पारिवारिक व सामाजिक स्थिति को मद्देनजर रखते हुए कुछ इस प्लान करने होंगे क्योंकि बिना बच्चे बस्ते की आने वाले बच्चों की उमंग, उनकी चंचलता, जिज्ञासा, स्फूर्ति एवं बाल-सुलभ क्रियाओं को एक दिशा देना ही इस बस्ता मुक्त शनिवार की सफलता सुनिश्चित करेगा। हो सकता है कि पहल-पहले बच्चों को थोड़ा असहज महसूस हो लेकिन हम सुरुचिपूर्ण ढंग से गतिविधियों का आयोजन करेंगे और सभी बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित करेंगे तो यह शनिवार आनंदवार में बदल जाएगा। विद्यालय की भौतिक स्थिति, खेल सामग्री और पुस्तकालय में पुस्तकों की उपलब्धता के आधार पर दिनभर की कार्य योजना बनाई जा सकती है। इस कार्ययोजना के माध्यम से बच्चों में सामाजिकता का विकास किया जाना संभव होगा, उनमें टीम भावना विकसित होगी वह पर्यावरण एवं जीव जंतु की प्रति सहृदय बन सकेंगे, शारीरिक व मानसिक रुप से सशक्त होंगे। समस्याओं की पहचान एवं उनसे निपटने के तरीके स्वयं खोज सकेंगे। देश-दुनिया और स्थानीय गतिविधियों, आयोजनों, समस्याओं और विशेषताओं से रूबरू हो सकेंगे ।ऐसा होना और किया गाना अनिवार्य भी हो जाएगा क्योंकि यदि एक दिन की बात होती तो अलग बात थी लेकिन यह साप्ताहिक आयोजन होगा और सत्रपर्यंत चलेगा। लिहाजा हमें बच्चों संग काम करना ही पड़ेगा।
शेष दिनों की भाँति इस दिन भी समय सारणी के अनुसार कालांश लगाए जाने चाहिए। अध्यापक भी समय सारणी में निश्चित किए गए कालांश के अनुसार अपनी कक्षाएं भी बदलेंगे लेकिन शनिवार के दिन उनकी कार्य योजना और कार्य निष्पादन शेष दिनों से कुछ भिन्न होगा। इसके लिए कालांशवार कार्ययोजना प्रस्तुत है। चूँकि यह कार्य योजना जालोर में पदस्थापित मेरे व्याख्याता साथी श्री संदीप जोशी ने प्रस्तुत की है। कुछ बातें अपनी तरफ से कम-ज्यादा करते हुए इसे प्रस्तुत कर रहा हूँ। हालांकि यह भी सही है कि इसे पूर्णरूपेण लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि समस्त विद्यालयों के संसाधन और भौतिक सुविधाएँ भिन्न होती हैं लेकिन यह कार्ययोजना मददगार अवश्य साबित होगी।
प्रथम कालांश- योग, आसन, व्यायाम और प्राणायाम। सुबह की प्रार्थना सभा के बाद यह कार्य करवाए जा सकते हैं। भारतीय दर्शन की मूल धारणा रही है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क पेज रहता है। योग, व्यायाम, आसन और प्रणायाम वो कार्य हैं जो शरीर को स्वस्थ, चुस्त-दुरुस्त और मजबूत बनाते हैं। इससे बालक शारीरिक रूप से मजबूत बनेगा। शारीरिक रूप से मजबूत बालक मानसिक रूप से भी स्वस्थ और मजबूत होगा। इससे निश्चित ही सीखने की प्रक्रिया को संबलन मिलेगा। यदि बालक इन्हें अपने जीवन में उतार लेते हैं तो वे आजीवन स्वस्थ रहेंगे।
दूसरा कालांश- यह कालांश श्रमदान, स्वच्छता और पर्यावरण को समर्पित किया जा सकता है। कक्षा-कक्ष, विद्यालय परिसर एवं खेल मैदान की स्वच्छता का कार्य किया जा सकता है। वर्षा ऋतु में बच्चों से नए पौधे लगवाए जा सकते हैं और उन्हें उनका मालिकाना हक दिया जा सकता है। (हम खुद अपने विद्यार्थी जीवन मे अपने नाम से पौधे रखते थे।) बाद में साप्ताहिक रुप से उनमें पानी देना, सर्दी एवं पशुओं से सुरक्षा हेतु उनके लिए ढाँचा बनाना और कटाई-छँटाई जैसे कार्य भी करवाए जा सकते हैं।
तीसरा कालांश- इस कालांश में गीत अभ्यास करवाया जा सकता है। क्योंकि संगीत व्यक्ति को मानसिक शांति प्रदान करता है और वह सहज भी रहता है। इस कड़ी में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, देशभक्ति और लोकगीत का अभ्यास करवाया जा सकता है। यदि विद्यालय में वाद्ययंत्र और उसके वादक शिक्षक हों तो बच्चों को सिखाया भी जा सकता है। इसके लिए गाँव या समुदाय से किसी प्रशिक्षित व्यक्ति को बुलाकर भी बच्चों को सिखाया जा सकता है।
चौथा कालांश- यह कालांश खेलों के नाम किया जा सकता है। सर्दी, गर्मी व बरसात के मौसम को देखते हुए खेलों का चयन किया जाना चाहिए। बौद्धिक एवं सामूहिक खेलों को शामिल किया जा सकता है। सामूहिक खेलों से बच्चों में टीम भावना विकसित होती है जो भविष्य में उनके काम आएगी।
पाँचवाँ कालांश- भोजनावकाश के पश्चात का कालांश अभिव्यक्ति कालांश के रुप में परिवर्तित किया जा सकता है। बच्चे कविता, कहानी, भाषण, वाद-विवाद, समूह-चर्चा व अंत्याक्षरी कर सकते हैं। श्यामपट्ट, बरामदे, विद्यालय परिसर में रंग एवं कंकड़-पत्थरों से रंगोली या विभिन्न प्रकार की डिजाइन बना सकते हैं। पेड़ की लकड़ियों व पत्तों से विभिन्न डिजाइन बना सकते हैं। बस ध्यान रहे कि अनावश्यक रुप से पत्तियाँ न तोड़ी जाएँ व लकड़ियां सूखी ही काम में ली जाएँ।
छठा कालांश- यह पुस्तकालय व वाचनालय के नाम किया जा सकता है। कक्षा में जाने से पहले शिक्षक बच्चों के आयुवर्ग, समझ और आवश्यकतानुसार पुस्तकें पुस्तकालय प्रभारी से प्राप्त करें और कक्षा में लेकर जाए। पढ़ने के बाद बच्चों से प्रतिक्रिया प्राप्त की जा सकती हैं। कोई पुस्तक अधूरी रह गई तो उसे घर के लिए दी जा सकती है या अगले शनिवार को बच्चों को फिर से दी जा सकती है।
सात कालांश- यह कालांश मौखिक पहाड़े, गणितीय अभ्यास (इसमें समय, दूरी, ब्याज, चाल और ज्यामितीय आकृतियों के नमूने शामिल हों) कंप्यूटर, मानचित्र अवलोकन (विश्व, भारत व राजस्थान) का अभ्यास करवाया जा सकता है। मानचित्र राजनीतिक और भौगोलिक दोनों होने चाहिए। साहित्य के विद्यार्थियों को रस, छंद, अलंकार जैसे विषयों पर मौखिक वार्ता की जा सकती है। संविधान के अनुच्छेदों की जानकारी की जा सकती है। बच्चों, महिलाओं और शिक्षा से जुड़े उपबंधों पर किसी विशेषज्ञ की कक्षा करवाई जा सकती है।
आठवाँ कालांश- विभाग द्वारा घोषित बाल सभा वाले दिन बाल सभा का आयोजन किया जाए एवं इससे इतर शनिवार को नैतिक शिक्षा, बोध कक्षा, उस सप्ताह आने वाले महापुरुषों के जन्मदिन एवं पुण्यतिथि या आगामी सप्ताह में आने वाले महापुरुषों के जन्मदिन एवं पुण्यतिथि पर चर्चा की जा सकती है। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व से रूबरू करवाया जा सकता है। बड़े बच्चों के लिए जीवन निर्माण (कैरियर गाइडेंस) कक्षाओं का आयोजन किया जा सकता है। विज्ञान एवं भूगोल जैसे प्रायोगिक विषयों के प्रायोगिक कार्य करवाए जा सकते हैं।
दरअसल इस बस्ता मुक्त शनिवार की सफलता विद्यालय में शिक्षक द्वारा कार्ययोजना बनाने, उसका सही दिशा में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ संपादन एवं इच्छाशक्ति पर निर्भर रहेगी। विभाग या कहें कि सरकार द्वारा एक गाइडलाइन जारी हो उसी क्रम में खेल सामग्री, पुस्तकें एवं प्रायोगिक सामग्री की उपलब्धता करवाई जानी चाहिए। यदि ऐसा होता है तो इन बस्ता मुक्त शनिवार के परिणाम रोचक, आनंददायक, रोमांचकारी एवं उत्साहवर्धक होंगे। इससे विद्यालयों में बच्चों के नामांकन एवं ठहराव में भी आशानुकूल परिवर्तन देखने में आएगा। बहरहाल मैं अत्यंत उत्साहित हूँ।
अभिनव सरोवा
शिक्षक
23 फरवरी 2020
Good sir sahrahniya suggestions 👌👌
ReplyDelete