माँ, दादी, चाची, बुआ सब
कहती थीं- कसके बाँधा कर नाड़ा
क्यों?
तो कहतीं- जमाना बड़ा ख़राब है
ये नजर से गाँठ खोलता है।
ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती गई
समझ भी कुछ बनती गई।
अब नजर लोगों की
धारा के विपरीत चलने लगी
आनी तो नीचे थी नाड़े से
पर ऊपर जाती दिख रही है
उभरते वक्ष( जो कि शरीर का हिस्सा मात्र है) पर
नजर गिद्ध की गड़ाए पाती हूँ!
माँ अभी भी नाड़े पर बल देती थी
शायद भूल रही थी बेटी उसकी
अब बड़ी हो रही है
फिर एक दिन
सखि ने कहा- तू जीन क्यों न पहनती
ये मजबूत होती है
सलाह बढ़िया लगी
लगोलग दो-चार जीन खरीद डाली
नहा धोकर जीन टाँगों में डाली
बुद्धि हतप्रभ रह गई
आसमान चकराने लगा
जैसे सब उजड़ रहा है
हुआ यूँ कि मेरी जीन में तो जिप थी
सोचने लगी मेरी जीन में ज़िप का औचित्य?
अब धारा पुनः आ गई
नजर अब ज़िप आ रही है
मैं सिमटती-सिकुड़ती जाती
लगता जैसे भेड़ियों के बीच आ गई हूँ
नजर कटार बन जाती
चीरने को जीन मेरी
अपने फोन में पैटर्न लॉक रखने वाले(जिसे वे कभी नहीं भूलते)
दुआ करते हैं कि
ये अपनी जीन की ज़िप बंद करना कभी क्यों न भूलती!
माँ सच कहती थी-
दुनिया की सबसे धारदार चीज
नजर होती है।
ये न सिर्फ चीर को चीरती है
बल्कि दिल भी चीर देती है
जहाँ थोड़ा बहुत विश्वास शेष होता है
उसे भी नजर से चीरती पाती हूँ।
अभिनव सरोवा
4 सितम्बर 2016
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