हाँड़ी ही तो है-
तब भी थी
अब भी है।
कभी गले में,
कभी कंधे पर।
कभी जोर-जबरदस्ती से,
कभी दिमाग की नसबंदी से।
बाँधते तब भी अपने हाथ से,
आज भी अपने हाथ से।
कभी घोर पीड़ित थे
अभी बड़े प्रसन्न हैं।
कल को जब लेगी हिसाब
तो हाँड़ी के सिवाय क्या
देने को.....?
अभिनव सरोवा
9 अगस्त 2018
विश्व आदिवासी दिवस