अख़बार...
सिर्फ जुबान रखते हैं
नाक, कान, हाथ
पैरों से विहीन।
आजकल बन रहे
प्रचारक भिन्न-भिन्न उत्पादों के।
कब किसान, मजदूर,
सैनिक, बेटी,
नारी और बेरोजगार की
आवाज बनेंगे?
ये सिर्फ जुबान रखते हैं
बोलना जानते हैं
सिर्फ अपनी
कहते हैं।
चूँकि तुम रहे हो क्रांति के अगुवा
तो फिर से अख्तियार करो
वही रूप पुराना
और बदल डालो
मुझ जैसों की अवधारणा।
तुम जरूर दोगे
साथ हमारा
बनोगे हमारी आवाज।
अभिनव सरोवा
5 जनवरी 2019