चारपाई और सपना-
काठ की स्थूल आकृत्ति ने
खराद पर कसकर, झेलकर पीड़ा
पाया आकार सुंदर पायों का
अब हो गए हैं सुघड़।
बढ़ई ने चार लकड़ियों में
पिरोकर इसे खाका तैयार कर दिया।
बूढ़े दादाजी या ताऊजी ने
कतली को नचाकर
ता ता थैया, ता ता थैया
सूत लिया तैयार कर।
माईं, दावण, ताना-बाना
डालकर पापाजी ने बना दिया माचा,
हाँ! इस दरम्यान हर कड़ी पर रही
उनकी नजर पैनी
कहीं टूट न जाये कड़ी
ये शंका मन में उनके
रही हर बार।
जब वो बनकर हो गया तैयार
वे दिखाते
बड़ी खुशी से
तारीफ की लालसा भी
इसी में समाहित रहती
लोगों ने बैठ-बैठकर काफी सराहा इसे
ऊपर-नीचे, घूम-घूमकर चारों ओर
देखते इसकी बुनावट।
ज्ञात नहीं कितने लोगों ने इस पर
चैन की साँस ली है
नींद भी ली और कमर भी सीधी की है
हमारा सपना भी कुछ इसी तरह
होकर पूरा लोगों को दे आराम
और पापा कहें कि-
इसे मैंने बुना है और उनका गर्व
समेटने में न आए।