आप चाहें तो इन्हें परसाई जी के व्यंग्य का वो किरदार समझ सकते हैं जो फटे जूते से अँगूठे की मानिंद आपको ठेंगा दिखा रहा है या इन्हें गोदान का होरी समझ सकते हैं जो नितांत अभाव में भी गाय पालने और गोबर को दूध पिलाने की तमन्ना रखता है तथा सदा कर्ज के बोझ तले दबे रहकर भी धर्म निभाने की बात करता है या कफ़न के घीसू या माधव में से कोई एक या दोनों सामूहिक रूप से समझ सकते हो। अपनी मर्जी के मुताबिक इन्हें नमक का वो दारोगा समझ सकते हो जो अलोपीदीन जैसे धन्ना सेठ के सामने सीना तान कर खड़ा है। ये भी नहीं तो गबन के रमानाथ की पत्नी जालपा भी कह सकते हो। आपने निर्मला के रूप में महिला के दुःख को बखूबी उकेरा है, भी समझ सकते हो। पंचों के रूप में अलगू या जुम्मन शेख भी समझो तो भी कौन रोकने वाला है! नशा कहानी का 'मैं' समझो तो भी बुराई नहीं है। या फिर 'गुल्ली-डंडा' का गया समझो तो भी कोई रोकने वाला नहीं है। रंगभूमि के गरीब, निरीह और निर्वासन के कगार पर खड़े किसान समझो या सूरदास तो भी कौन कहने वाला है। 'बड़े घर की बेटी' की आनंदी समझो तो भी मुझे किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है।
ईदगाह के हामिद का चिमटा, सद्गति का दुखिया, घासवाली की मूलिया, पूस की रात का हलकू और उसका साथी जबरा, हीरा और मोती नामक दो बैल, जोखू और गंगी के रूप में अपना जीवन यापन करने वाले उस शख्स का जन्मदिवस 31 जुलाई को है।
जी हाँ! आप ठीक समझे हम 20 वीं सदी के महानतम हिंदी लेखक की प्रेमचंद की बात कर रहे हैं। वही प्रेमचंद जिनके कहानी संग्रह 'सोजे वतन' को तात्कालिक अंग्रेजी सरकार द्वारा जब्त कर लिया और आपने मुंशी दयानारायण के कहने से अपने मूल नाम धनपतराय को प्रेमचंद का लिबास पहना डाला। पहनाया भी इस तरह की छूट न पाए।
हम हिंदी साहित्य के रोगी सदा आपकी कलम के ऋणी रहेंगे और जब भी कक्षा-कक्ष में बात चलेगी तो दूर तक जायेगी। बच्चे लोग स्तंभित होकर आपको सुनेंगे और पढ़ने को लालायित भी होंगे गर न हुए तो हम किस मर्ज की दवा हैं, कर देंगे।
कई बार तो मन में विचार आते हैं कि हमसे पढ़ा न जा रहा और आपने लिख डाला! चलो जो भी है; हमें तो आम खाने हैं पेड़ों की नफरी से क्या वास्ता! एक साथ इतने प्रकार की भूमिका में कैसे निभा लेते थे आज तक समझ न पाया।
मास्टर की नौकरी करते पाँच साल हो गए पर आपका जन्मदिन याद जरूर रहा पर कभी मनाने के विषय में विचार नहीं आया। इस विषय में तो manik ji को साधुवाद देना चाहूँगा जिन्होंने इस तरफ ध्यान आकर्षित किया है।
अब हर साल आपका जन्मदिन बच्चों के साथ मनाया जायेगा और आपके विषय में दो-चार बातें की जाएँगी। आपका इस्तेमाल हम बच्चों में साहित्य के प्रति रूचि जागृत करने में करेंगे, बुरा तो न मानोगे?
हमारे बच्चे अभी केशव और श्यामा की तरह नादान अवश्य हैं पर सुभागी की तरह कोई जिम्मेदारी आन पड़ी तो उसे पूरी करने में कोई कसर भी न रखेंगे।
अब तुम्हें क्या कहें! बस तुम्हारा जन्मदिन मनाने की ठान ली तो बस ठान ली।
पता है जब भी तुम्हारे बारे में बात करते हैं तो लगता है जैसे एक युग को अपने कंधों पर लिए जा रहे एक मुसाफिर से कुछ बतिया रहे हैं और वजन हल्का करने को बोल रहे हैं पर वो राही भी बड़ा 'वो' निकलता है जो हमें अपनी पोटली में से कुछ चीजें तो दे रहा है पर बोरा अपने ही कंधों पर लिए जा रहा है। खुद उकता गया है पर उफ्फ तक न कर रहा है। पता नहीं किस मिट्टी का बना है!
#मुंशीप्रेमचंद का जन्मदिवस
31 जुलाई 1880 उत्तरप्रदेश का लमही गाँव।
अभिनव सरोवा जी की वाल से साभार
ईदगाह के हामिद का चिमटा, सद्गति का दुखिया, घासवाली की मूलिया, पूस की रात का हलकू और उसका साथी जबरा, हीरा और मोती नामक दो बैल, जोखू और गंगी के रूप में अपना जीवन यापन करने वाले उस शख्स का जन्मदिवस 31 जुलाई को है।
जी हाँ! आप ठीक समझे हम 20 वीं सदी के महानतम हिंदी लेखक की प्रेमचंद की बात कर रहे हैं। वही प्रेमचंद जिनके कहानी संग्रह 'सोजे वतन' को तात्कालिक अंग्रेजी सरकार द्वारा जब्त कर लिया और आपने मुंशी दयानारायण के कहने से अपने मूल नाम धनपतराय को प्रेमचंद का लिबास पहना डाला। पहनाया भी इस तरह की छूट न पाए।
हम हिंदी साहित्य के रोगी सदा आपकी कलम के ऋणी रहेंगे और जब भी कक्षा-कक्ष में बात चलेगी तो दूर तक जायेगी। बच्चे लोग स्तंभित होकर आपको सुनेंगे और पढ़ने को लालायित भी होंगे गर न हुए तो हम किस मर्ज की दवा हैं, कर देंगे।
कई बार तो मन में विचार आते हैं कि हमसे पढ़ा न जा रहा और आपने लिख डाला! चलो जो भी है; हमें तो आम खाने हैं पेड़ों की नफरी से क्या वास्ता! एक साथ इतने प्रकार की भूमिका में कैसे निभा लेते थे आज तक समझ न पाया।
मास्टर की नौकरी करते पाँच साल हो गए पर आपका जन्मदिन याद जरूर रहा पर कभी मनाने के विषय में विचार नहीं आया। इस विषय में तो manik ji को साधुवाद देना चाहूँगा जिन्होंने इस तरफ ध्यान आकर्षित किया है।
अब हर साल आपका जन्मदिन बच्चों के साथ मनाया जायेगा और आपके विषय में दो-चार बातें की जाएँगी। आपका इस्तेमाल हम बच्चों में साहित्य के प्रति रूचि जागृत करने में करेंगे, बुरा तो न मानोगे?
हमारे बच्चे अभी केशव और श्यामा की तरह नादान अवश्य हैं पर सुभागी की तरह कोई जिम्मेदारी आन पड़ी तो उसे पूरी करने में कोई कसर भी न रखेंगे।
अब तुम्हें क्या कहें! बस तुम्हारा जन्मदिन मनाने की ठान ली तो बस ठान ली।
पता है जब भी तुम्हारे बारे में बात करते हैं तो लगता है जैसे एक युग को अपने कंधों पर लिए जा रहे एक मुसाफिर से कुछ बतिया रहे हैं और वजन हल्का करने को बोल रहे हैं पर वो राही भी बड़ा 'वो' निकलता है जो हमें अपनी पोटली में से कुछ चीजें तो दे रहा है पर बोरा अपने ही कंधों पर लिए जा रहा है। खुद उकता गया है पर उफ्फ तक न कर रहा है। पता नहीं किस मिट्टी का बना है!
#मुंशीप्रेमचंद का जन्मदिवस
31 जुलाई 1880 उत्तरप्रदेश का लमही गाँव।
अभिनव सरोवा जी की वाल से साभार
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