Sunday, 25 February 2018

पुरानी यादें

बाल्यावस्था की ऐसी कोई खास बात याद नहीं जो पाठक को प्रभावित कर सके। पता नहीं कब बकरियाँ चराते-चराते दादाजी से गिनती और हिंदी वर्णमाला सीख ली। इसी दौरान उनका निधन हो गया और परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए बुआजी अपने साथ चूरू ले आए। बाल विकास भारती नामक स्कूल में कक्षा 3 में दाखिला मिल गया। ये दाखिला एक टेस्ट के बाद लिया गया जबकि अकादमिक रूप से पहली और दूसरी कक्षा पढ़ने का अवसर ही नहीं मिला। वहाँ टेलीविजन जैसी चीज के पहली बार दर्शन हुए। क्या विचार आया, पता नहीं। दो साल बाद यहाँ से रिहाई हो गई और 5 वीं कक्षा शोभा का बास से की। हमारा खेत और घर बास और हमारे गाँव के बीच मे स्थित होने के कारण यहाँ दाखिला दिलवाया गया। ये सन 1990 की बात है। स्कूल से घर आने के बाद पता चला कि मम्मी का सिर दर्द कर रहा है जो दूसरे दिन सुबह ही जाकर ठीक होता, तो रोटियाँ बनाने के लिए लकड़ियाँ लाने से लेकर झाड़ू निकालने का काम करना और रोटियाँ बनाने का जिम्मा आन पड़ता।  

   चूँकि उस समय गैस का न तो चलन था और न ही खरीदने की स्थिति। स्थिति की क्या कहें किसी ने इस बारे में सोचा भी न होगा। इसलिए पूरे साल भर खेजड़ी की लकड़ियाँ ही जलानी पड़ती थी और वो 12 की बजाय 8 या 10 महीने ही चल पाती थी।

   इस समस्या से निपटने का जिम्मा मेरे ही सिर था। अतः शाम ढलने से पहले ही बलवीर  (हाल रेलवे कार्मिक अहमदाबाद) गाय के सींगों में डालने वाली रस्सी लेकर निकल जाते कांकड़ की ओर। ये वो दौर था जब लोग अपने खेत मे एक बार जरूर आया करते थे। हम दोनों पहले खूब आगे निकल जाते। इस बात की तस्दीक करने कि कोई है तो नहीं। यदि कोई मिलता तो गाय के बारे में पूछते और न मिलता तो वापसी में कांकड़ से लकड़ियों का भरोट ( भारिया) ले आते। ये हमारा नित्य कर्म था। आजकल जिसे नित्यकर्म कहा जाता है उसकी टाळ हो सकती थी पर इसकी नहीं। ये भयंकर लू का समय होता था पर किससे कहूँ दुखवा मोरी सजनी वाली बात थी।

    कक्षा 6 से 10 तक की पढ़ाई लादूसर में की। वहाँ हेमंत नामक मित्र मिला जो आज भी सम्पर्क में हैं। इसके अलावा मुस्तफा भी सम्पर्क में है। बाकी गाँव के साथी भी थे जिनका सम्पर्क में रहना उनके प्यार की बजाय मजबूरी ज्यादा है। न वो गाँव छोड़ सकते हैं और न ही मैं। अतः मजबूरी में ही सही पर परस्पर ढो रहे हैं।

कक्षा में शैतानी भले ही न करूँ पर अध्यापकों की कृपा का सदा ही पात्र रहा हूँ। फिंच्या में लीड़ी मिटती उससे पहले ही अन्य कोई व्यवस्था उनके लिए हो जाती थी। इस मामले में पापाजी का भरपूर योगदान था। उनका कहना था कि बदमाशी करें तो जान से नहीं मारना बाकी आप देख लेना। और मास्टर महोदय इतने दयावान थे कि मुझे तो देख ही लेते थे। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो खुद के बड़बोलेपन को ही इसका दोषी मानता हूँ। वैसे आजकल के अभिभावक न तो इतनी छूट ही दे सकते हैं और न ही मास्टर उस पर खरा उतरने की हिम्मत ही कर सकता है। कारण जो भी हों, पाठक खुद से तय कर लें। ये तो हमारे घरवालों की हिम्मत थी जो इतनी छूट देने की हिम्मत कर सकते थे।

   अभावों का और हमारा तो पेट और पीठ, जीभ और पानी का सा रिश्ता था। जिसने कभी साथ नहीं छोड़ा। 1997 में दसवीं पास करते ही गर्मी की छुटियों में निकल पड़ा था उससे दो-दो हाथ करने।

मुझे भी नहीं पता कि क्या लिखा गया है। आइए साथ-साथ पढ़ते हैं। कोई बंधन भी नहीं है आप न पढ़ना चाहें तो भी कोई दिक्कत नहीं है।

अभिनव सरोवा (अध्यापक)

24 फरवरी 2018

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