Wednesday, 23 May 2018

वो आएंगे

वो आएँगे
ठीक उसी तरह जैसे
आते हैं
मुंडन के बाद
खोपड़ी पर रोएँ।

एक मियाद जो होती है उनकी
खोपड़ी के रोएँ और
उनके आने में
एक फर्क है
रोएँ अपनी
निश्चित गति, चाल से
आते हैं जबकि
ये इनका आना
आकस्मिक होगा

ऐसे जैसे-
बिजली गरजने से
चचाबड़ी के खेत में
कोई खुम्बी (भूँगी) निकली हो जैसे
चूँकि खुम्बी की चटनी
लजीज होती है।
वैसे ही ये दिखाएंगे तुम्हें
सब्ज-बाग, देंगे नए मुद्दे
यथा- मंदिर, गौ आदि-आदि
पर कोई बात न करेगा
शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य,
फसल की कम कीमत,
महँगे बीज, नकली दवाएँ,
महिला और मानवीय उत्पीड़न की।

हम भूल जाएँगे
अपनी बेरोजगारी
भूल जाएँगे कि
अपने घर में भी कोई
लिखा-पढ़ा
बैठा है
हाथ पर हाथ धरे
हमें चिंता सताएगी मंदिर की,
पाकिस्तान में हिंदुओं की दशा की!

इसी दरम्यान घट जाएगी वो घटना
जिसके लिए 'उन्होंने' ये सब पापड़ बेले हैं
और
और फिर
वो गायब हो जाएंगे
खेत के रांग-जड़ की तरह।

ओ तेरी की.....!
इस बार भी ठगे गए
और मार दी 'करम कै कांकरी'

अभिनव सरोवा (हिंदी अध्यापक)

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