विडम्बना
वो जो खेत में पचता है
परिवार को साथ पचाता है
पसीना बहाता है
पेट को बाँधकर
घुटने पेट में देकर सोता है
वो किसान ही नहीं
अन्नदाता भी कहलाता है।
वो जो सिर पर तगारी ढोता है
ठेकेदार की गालियाँ सुनता है
माथे का पसीना सीमेंट में मिलाता है
बच्चों के सपनों की हत्या करता है
जोड़ायत को भिखारिन तो नहीं पर
उसके दर्जे का बनाता है
वो लोगों के घर बनाता है
पर खुद छप्पर में रहता है
वो मजदूर ही नहीं
निर्माता भी कहलाता है।
ये दोनों भूख से लड़ते हैं
अँधेरे से दो-दो हाथ करते हैं
पसीना अपना पीते हैं
ये किसान-मजदूर कहलाते हैं
जो कर्म को पूजा मानते हैं।
ताकि भर सकें हवेलियों का पेट
रोशन कर सकें कोठियों के रंगीन बल्ब
पिला सकें 'उनके' बच्चों को कोल्ड-ड्रिंक
भर सकें उनका बिजली का बिल
चुका सकें ब्यूटी पार्लर का खर्चा
ये विडम्बना नहीं तो क्या है
जो कमाता है वो अभाव में जीता है
अभाव में ही मर जाता है
छप्पर में उसके अँधेरा ही रहता है
छाछ को भी तरसते हैं।
बस ये किसान-मजदूर ही हैं
जो मोटे पेट वालो की तिजोरी भरते हैं
उनके लिए कमाते हैं
उनके घर रोशन करने को
हाड़ ही नहीं
जी भी अपना जलाते हैं।
हवेली-कोठियों की रंगीन चस-बुझ
बिजली से नहीं
इनके खून-पसीने से जलती और
टिमटमाती हैं।
और ये दोष भाग्य को देते हैं
ये विडंबना नहीं तो क्या है?
अभिनव सरोवा
02 जनवरी 2019
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