गाँव-
गाँव शब्द सुनते ही
एक तस्वीर नाचने लगती है
आँखों के सामने
घुटनों तक धोती बाँधे अधेड़ और बुजुर्ग
घाघरा-लुगड़ी पहने,
घूँघट निकाले महिलाएँ।
सार्वजानिक नल से पानी भरती लड़कियाँ
कंचे खेलते या टायर दौड़ाते लड़के।
कच्ची दीवारों वाले घर
घास-फूस की छत
कच्चे रास्ते या गलियाँ
घर से बाहर कचरे की अकुरड़ी।
लेकिन इन्हें समेटने के बाद भी
कुछ अलग है गाँव
ये भी सच है यहाँ
जाति के नाम पर अभी भी बचा है
कुछ भेदभाव।
कुछ काम भी हैं पुश्तैनी
पड़ोसी के बेटे की सगाई या
बेटी के लिए नौकरी वाला दामाद मिलने पर या
बच्चों के नौकरी लगने पर होती है
थोड़ी जलन।
फिर भी बहुत कुछ जो
सिर्फ बसता है गाँव में-
धोती वाले होते हैं
गाँवभर के अभिभावक और पोषक
रखते हैं ख्याल सबका
भरते हैं पेट सबका।
घाघरे-लुगड़े से
झलकती है एकरूपता
और घूँघट से करती हैं
बड़ों का आदर।
यहाँ सिर्फ अंकल नहीं रहते
यहाँ रहते हैं
चाचा, ताऊ, दादा, बाबा
और
चाची, ताई, दादी और बड़ी माँ।
यहाँ के लड़के टायर और कंचे ही नहीं खेलते
ये करते हैं देश की रक्षा और
भरते हैं देश का पेट
जिन्दा रखते हैं देश की अर्थव्यवस्था।
लडकियाँ सिर्फ नल तक ही सीमित नहीं
बल्कि दुनिया की खूबसूरती समेटे
निर्मल भाव लिए
आँखों में लज्जा और सम्मान संग
आत्मविश्वास लिए वो करती हैं
घरेलू काम और स्कूली प्रश्नों पर बात
और चाची, भाभी या दादी से सिखती हैं
पीहर, ससुराल और ननसार की बातें।
लड़की की शादी पूरे गाँव का
कार्यक्रम होता है।
नौकरी पर जाते समय
आधा गाँव जाता है बस अड्डे तक।
जब जावण, आटा, चाय, चीनी
न हो तो पड़ोसी से कप, टोपिया
भरवाया जाता है।
और जो जुदा करती शहरों से; वो है-
जब किसी की बकरी या भेड़ को
मार देते हैं आवारा कुत्ते
तब आधा गाँव इकट्ठा होता है।
और जब मर जाती है
गाय या भैंस
तो सिर्फ दरी नहीं बिछती
बाकि पूरा गाँव जमा होता है एक जगह।
यही है वो ताकत जो गाँव को
करती है शहर से अलग।
अभिनव सरोवा
04 जनवरी 2019
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